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नारद उवाच अनायासेन लोकोऽय...

अश्वत्थस्तोत्रम् - नारद उवाच अनायासेन लोकोऽय...

देवी देवतांची स्तुती करताना म्हणावयाच्या रचना म्हणजेच स्तोत्रे. स्तोत्रे स्तुतीपर असल्याने, त्यांना कोणतेही वैदिक नियम नाहीत. स्तोत्रांचे पठण केल्याने इच्छित फल प्राप्त होते.
In Hinduism, a Stotra is a hymn of praise, that praise aspects of Devi and Devtas. Stotras are invariably uttered aloud and consist of chanting verses conveying the glory and attributes of God.


अश्वत्थस्तोत्रम्
नारद उवाच
अनायासेन लोकोऽयं सर्वान्कामानवाप्नुयात् ।
सर्वदेवात्मकं चैकं तन्मे ब्रूहि पितामह! ॥१॥
ब्रह्मा उवाच-
शृणु देवमुनेऽश्वत्थं शुद्धं सर्वात्मकं तरुम् ।
यत्प्रदक्षिणतो लोकः सर्वान्कामान्समश्नुते ॥२॥
अश्वत्थाद्दक्षिणे रुद्रः पश्चिमे विष्णुरास्थितः ।
ब्रह्माचोत्तरदेशस्थः पूर्वेत्विन्द्रादिदेवताः ॥३॥
स्कन्धोपस्कन्धपत्रेषु गोविप्रमुनयस्तथा ।
मूलं वेदाः पयो यज्ञाः संस्थिता मुनिपुङ्गव ॥४॥
पूर्वादिदिक्षुसंयाता नदीनदसरोब्धयः ।
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ह्यश्वत्थं संश्रयेद्बुधः ॥५॥
त्वं क्षीर्यफलकश्चैव शीतलश्च वनस्पते ।
त्वामाराध्य नरो विन्द्यादैहिकामुष्मिकं फलम् ॥६॥
चलद्दलाय वृक्षाय सर्वदाश्रितविष्णवे ।
बोधितत्त्वाय वेदाय ह्यश्वत्थाय नमोनमः ॥७ ॥
अश्वत्थ यस्मात्त्वयि वृक्षराज नारायणस्तिष्ठति सर्वकाले ।
अतः श्रुतस्त्वं सततं तरूणां धन्योऽसि चारिष्टविनाशकोऽपि ॥८॥
क्षीरदस्त्वं च येनेह नेयश्रीस्त्वां निषेवते ।
सत्येन तेन वृक्षेन्द्र मामपि श्रीर्निषेवताम् ॥९॥
एकादशात्मरुद्रोऽसि वसुनाथ शिरोमणिः ।
नारायणोऽसि देवानां वृक्षराजोऽसि पिप्पलि ॥१०॥
अग्निगर्भः शमीगर्भो देवगर्भः प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भो भूगर्भो यज्ञगर्भो नमोऽस्तु ते ॥११॥
आयुर्बलं यशो वर्चः प्रजाः पशुवसूनि च ।
ब्रह्मप्रज्ञां च मेधां च त्वं नो देहि वनस्पते ॥१२॥
सततं वरुणो रक्षेत् त्वामाराद्वृष्टिमाश्रयेत् ।
परितस्त्वां निषेवन्तां तृणानि सुखमस्तु ते ॥१३॥
अक्षिस्पन्दं भुजस्पन्दं दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तनम् ।
शत्रूणां च समुत्थानं ह्यश्वत्थ शमय प्रभो ॥१४॥
अश्वत्थाय वरेण्याय सर्वैश्वर्यप्रदायिने ।
नमो दुःस्वप्ननाशाय सुस्वप्नफलदायिने ॥१५॥
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः ॥१६॥
यं दृष्ट्वा मुच्यते रोगैः स्पृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते ।
यदाश्रयाच्छिरञ्जीवी तमश्वत्थं नमाम्यहम् ॥१७॥
अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन! ।
इष्टान्कामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ॥१८॥
आयुः प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसंपदम् ।
देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गतः ॥१९॥
ऋग्यजुस्साममन्त्रात्मा सर्वरूपी परात्परः।
अश्वत्थो वेदमूलोऽसावृषिभिः प्रोच्यते सदा ॥२०॥
ब्रह्महा गुरुहा चैव दरिद्रो व्यधिपीडितः ।
आवृत्य लक्षसंख्यं तत् स्तोत्रमेतत् सुखी भवेत् ॥२१॥
ब्रह्मचारी हविष्याशी त्वधःशायी जितेन्द्रियः ।
पापोहतचित्तोऽपि व्रतमेतत् समाचरेत् ॥२२॥
एकहस्तं द्विहस्तं वा कुर्यात् गोमयलेपनम् ।
अर्चेत् पूरुषसूक्तेन प्रणवेन विशषतः ॥२३॥
मौनिः प्रदक्षिणं कुर्यात् प्रागुक्तफलभाग्भवेत् ।
विष्णोर्नामसहस्रेण ह्यच्युतस्यापि कीर्तनात् ॥२४॥
पदेपदान्तरं गत्वा करचेष्टाविवर्जितः ।
वाचा स्तोत्रं मनो ध्याने चतुरंगं प्रदक्षिणम् ॥२५॥
अश्वत्थ स्थापितो येन तत्कुलं स्थापितं ततः ।
धनायुषां समृद्धिस्तु नरकात्तारयेत् पितॄन् ॥२६॥
अश्वत्थमूलमाश्रित्य जपहोमसुरार्चनात् ।
अक्षयं फलमाप्नोति ब्रह्मणो वचनं तथा ॥२७॥
अश्वत्थमूलमाश्रित्य शाकान्नोदकदानतः ।
एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिब्राह्मणभोजनम् ॥२८॥
एवमाश्वासितोऽश्वत्थः सदाश्वासाय कल्पते ।
यज्ञार्थछेदितेऽश्वत्थे ह्यक्षयं फलमाप्नुयात् ॥२९॥
छिन्नो येन वृथाश्वत्थः छेदिता पितृदेवताः ।
अश्वत्थः पूजितो यत्र पूजिताः सर्वदेवताः ॥३०॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2018-02-17T04:09:09.9770000

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वसिष्ठ

  • n. एक ऋषि, जो स्वायंभुव मन्वंतर में उत्पन्न हुए ब्रह्मा के दस मानसपुत्रों में से एक माना जाता है । वसिष्ठ नामक सुविख्यात ब्राह्मणवंश का मूलपुरुष भी यही कहलाता है । यह ब्राह्मणवंश सदियों तक अयोध्या के इक्ष्वाकु राजवंश का पौराहित्य करता रहा। 
  • जन्म n. यह ब्रह्मा के प्राणवायु (समान) से उत्पन्न हुआ था [भा.३.१२.२३] । दक्ष प्रजापति की कन्या ऊर्जा इसकी पत्नी थी । इस प्रकार यह दक्ष प्रजापति का जमाई एवं शिव का साढ़ू था । दक्षयज्ञ के समय दक्ष के द्वारा शिव का अपमान हुआ, जिस कारण क्रुद होकर शिव ने दक्ष के साथ इसका भी वध किया। 
  • विश्र्वामित्र से शत्रुत्व n. वसिष्ठवंश के सारे इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना के नाते, इन लोगों का विश्र्वामित्र वंश के लोगों के साथ निर्माण हुए शत्रुत्व की अखंड परंपरा का निर्देश किया जा सकता है । देवराज वसिष्ठ से ले कर मैत्रावरुण वसिष्ठ के काल तक, प्राचीन भारत के इन दो श्रेष्ठ ब्राह्मण वंशों में वैर एवं प्रतिशोध का अग्नि सदियों तक सुलगता रहा। प्राचीन भारतीय राजवंशो में भार्गव वंश (परशुराम जामदग्न्य) एवं हैहयों का, तथा द्रुपद एवं द्रोण का शत्रुत्व इतिहासप्रसिद्ध माना जाता है । उन्हीके समान पिढीयों तक चलनेवाला ज्वलंत वैर, वसिष्ठ एवं विश्र्वामित्र इन दो ब्राह्मणवंशो में प्रतीत होता है । 
  • परिवार n. इसकी कुल दो पत्नियॉं थीः---१. ऊर्जा, जो दक्ष प्रजापति की कन्या थी; २. अरुन्धती, जो कर्दम प्रजापति के नौ कन्याओं में से आठवी कन्या थी । इनके अतिरिक्त इसकी शतरूपा नामक अन्य एक पत्नी भी थी, जो स्वयं इसकी ही ‘अयोनिसंभवा’ कन्या थी । (१) ऊर्जा की संतति---ऊर्जा से इसे पुंडरिका नामक एक कन्या, एवं ‘सप्तर्षि’ संज्ञके निम्नलिखित सात पुत्र उत्पन्न हुए थेः - दक्ष (रत्न), गर्त, ऊर्ध्वबाहु, सवन, पवन, सुतपस्, एवं शंकु। भागवत में ऊर्जा के पुत्रों के नाम चित्रकेतु आदि बताये गये है [भा. ४.१.४१] । इसकी कन्या पुंडरिका का विवाह प्राण से हुआ था, जिसकी वह पटरानी थी । प्राण से उसे द्युतिमत् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । इसके पुत्र ‘रत्न’ का विवाह मार्कंडेयी से हुआ था, जिससे उसे पश्र्चिम दिशा का अधिपति केतुमत् ‘प्रजापति’ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । [ब्रह्मांड. २.१२.३९-४३] । इनके अतिरिक्त इसे हवीद्र आदि सात पुत्र उत्पन्न हुए थे । सुकात आदि पितर भी इसीके ही पुत्र कहलाते है । २) शतरूपा की संतति---इसकी ‘अयोनिसंभवा’ कन्या शतरूपा से इसे वीर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था । वीर का विवाह कर्दम प्रजापति की कन्या काम्या से हुआ था, जिससे उसे प्रियव्रत एवं उत्तानपाद नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए थे । इनमें से प्रियव्रत को अपनी माता काम्या से ही सम्राट, कुक्षि, विराट एवं प्रभु नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए। उत्तानपाद को अत्रि ऋषि ने गोद में लिया था [ह.वं १.२] 
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