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श्रीसच्चित्सुखशिवनवनृसिंहस्तोत्रम्

श्रीसच्चित्सुखशिवनवनृसिंहस्तोत्रम्

स्वामि श्री भारतीकृष्णतीर्थ यांनी जी देवदेवतांवी स्तुती केली आहे, अशी क्वचितच् इतरांनी कोणी केली असेल.


श्रीसच्चित्सुखशिवनवनृसिंहस्तोत्रम् [ आर्या ]
भव्यदकटाक्षकणिकान्सच्चित्सुखशिवनवनरसिंहगुरून् ।
भक्तामरधात्रीजान्भजामि भवभीतिभेदिपदविनतीन् ॥१॥
वरततिदाननिषक्तान्सच्चित्सुख.....................
करनिर्जितपाथोजानरणीसुरुचिपटान्कलये ॥२॥
कनकाभगात्राकान्तीन्सच्चित्सुख.......................
नृपगणकोटीरगमणिनीराजितपादपयसिजान्वन्दे ॥३॥
नयसन्ततिपारीणान्सच्चित्सुख....................
वरदानसक्तचित्तान्भवसागरपारदान्वन्दे ॥४॥
दापितकनकादीष्टान्सच्चित्सुख.................
विनताघहरान्वनजजविनताजगशंकरकृतीन्वन्दे ॥५॥
हरिणाङ्कजिष्णुवदनान्सच्चित्सुख...................
त्रैलोक्यार्च्यपदाब्जान्कलये गौतमकणादमुखनयदान् ॥६॥
तनुवाडमतिकृतिरम्यान्सच्चित्सुख.....................
श्राणितकाम्यान्सौम्यान्कलये मस्करिवतंसगणनम्यान् ॥७॥
अथवा.........
निगमान्तसारदातृन्सच्चित्सुख
आकृतिधिषणासौम्यान्वन्दे श्राणितसमस्तनतकाम्यान् ॥८॥
कृमित: सर्वकृपाब्धी ( कृत्स्नजनव्रजतुल्या ) न्सच्चित्सुख......
कृत्स्नात्मकत्वधीदान्कृत्तकृतान्तादिसाध्वसान्कलये ॥९॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:56:10.6000000

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श्र्वेत XV.

  • n. ५. एक पापी राजा, जो अगस्त्य ऋषि के दर्शन से मुक्त हुआ था । यह सुदेव राजा का ज्येष्ठ पुत्र था । इसने अपनी उत्तर आयु में कठोर तपस्या की, किन्तु अन्नदान का पुण्य कहीं भी संपादन नहीं किया । इस कारण यद्यपि इसे स्वर्गप्राप्ति हुई, फिर भी यह सदैव क्षुधा एवं तृषा से तड़पता रहा। यहॉं तक कि, अपनी ही माँस खाने लगा। अन्त में ब्रह्मा ने इसे मुक्ति का मार्ग बताते हुए पुनः एक बार पृथ्वीलोक पर जाने के लिए कहा, एवं अगस्त्य ऋषि के दर्शन से मुक्ति प्राप्त करने की आज्ञा दी। तदनुसार यह पृथ्वीलोक में आया, एवं इसने अगस्त्य ऋषि के दर्शन से मुक्ति प्राप्त की [वा. रा. उ. ७८];[ पद्म. सृ. ३४] 
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