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श्रीऋद्धिसिद्धिगणपतिस्तुति:

श्रीऋद्धिसिद्धिगणपतिस्तुति:

स्वामि श्री भारतीकृष्णतीर्थ यांनी जी देवदेवतांवी स्तुती केली आहे, अशी क्वचितच् इतरांनी कोणी केली असेल.


श्रीऋद्धिसिद्धिगणपतिस्तुति: [ पादाकुलकं ]
नानारीतिमलीमसपूर्ण -
स्वाशयदुर्लभचरणाम्भोजान् ॥
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे
शुद्धस्वान्त:करणावाप्यान् ॥१॥
त्रिदशालयपतिमुख्यस्वर्गि -
त्रिपुरप्रमुखासुरकलेताङ्घ्रोन् ॥
जारठ्यापमृतिघ्नकटाक्षान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥२॥
वाग्वैखर्यैश्वर्यविलास -
ह्रेपितगुरुशक्रत्वमयन्ते ॥
मूकवराका अपि यत्स्मृत्या
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥३॥
धरणीधारकधरणीधवजा -
स्वान्तह्नादनसक्तमनस्कान् ॥
करुणावरुणालयचेतस्कान् -
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥४॥
वारणावाजिप्रमुखश्रीदा -
न्विघ्ननिवारणपटुपादार्चान् ॥
नतकृतपापाम्भोनिधिघटजान् -
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥५॥
चक्षु:श्रोत्रक्षितिपतिरसना -
व्रातागोचरमहिमपदार्चान् ॥
कनकसुवर्णक्षणदेट्कान्ती ( शरुची ) न्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥६॥
निजमन्त्राक्षरजपमुखलभ्यान्
क्षरपरमात्मज्ञानविभूतेन् ॥
पवनजमुख्यध्यातपदाभान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥७॥
स्वीयपदाम्बुजषड्पदचेत -
श्चेत:स्थाखिलकाङ्क्षापूरान् ॥
आत्मज्ञानस्प्रष्टृनुताङ्घीन् -
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥८॥
फुल्लामृतभवमुखसुमराजी -
राजितमस्तकसंभवगर्भान् ॥
धर्ममुखाखिलकाङ्क्षितदातृन्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥९॥
भूमिभुव:स्वर्मुखलोकाली -
सुतलादितलव्राताध्यक्षान् ॥
नरनाथीकृतचरणविनम्रान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥१०॥
भण्डप्रमुखासुरकृतयुद्धे
साधितललिताविजयविभूतीन् ॥
व्याधिच्रजहरपदसंस्मरणान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥११॥
निर्जितसर्वस्वान्ताविकार -
व्रातसमर्चितपदपाथोजान् ॥
सृणिमुखमण्डितहस्ताम्भोजान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥१२॥
वाग्जननीपतिलक्ष्मीरमण -
क्ष्माधरजाधवपूजितचरणान् ॥
वाणीमोमाकीर्तितविभवान् -
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥१३॥
शममुखषट्कविरक्तिमुमुक्षा -
मुखसंपत्प्रदनैजकाटाक्षान् ॥
श्रमहृतिचुञ्चुस्मृतिचरणाब्जान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥१४॥
यममुखसर्वावयवविराज -
द्योगश्राणपटुधूलिपदान् ॥
नतपापालीमूर्ततितिक्षान्
ऋद्धिं सिद्धिं गणपतिमोडे ॥१५॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T11:55:46.1470000

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अष्टावक्र

  • वि. 
  • या नांवाचा कहोड ऋषीचा मुलगा ; ( गर्भांत असतां बापास अध्ययनांतील चुकीबद्दल यानें हिणविलें म्हणून त्याच्या शापानें हा आठ ठिकाणीं वांकडा झाला . त्यावरुन ) आठ ठिकाणीं वांकडा . 
  • n. कहोल का पुत्र । उद्दालक के सुजाता नामक कन्या का पुत्र, तथा श्वेतकेतु का मामा [म.व.१३८] । कहोल के द्वारा निरंतर किये जानेवाले अध्ययन का इसने गर्भवास में ही मजाक उडाया । तब, शिष्य के समक्ष, तुमने मेरा अपमान किया, इसलिये आठ स्थानों पर तुम टेढे रहोगे, ऐसा शाप कहोल ने इसे दिया । कुछ दिनों के पश्चात्, दशम मास लगने के कारण सुजाता का प्रसवकाल निकट आ गया । आवश्यक धन न होने के कारण, कहोल जनक के पास धनप्राप्ति के लिये गया । परंतु वहॉं, वरुणपुत्र बंदी ने कहोल को वादविवाद में जीत कर, वहॉं के नियमानुसार पानी में डुबो दिया । उद्दालक की इच्छानुसार, यह बात गुप्त रख ने का सब ने निश्चय किया । जन्म के बाद, अष्टावक्र उद्दालक को ही अपना पिता तथा श्वेतकेतु को भाई समझता था । बारह वर्षे का होने के पश्चात्, एक दिन सहजभाव से यह उद्दालक की गोदमें बैठा था । तब, यह तुम्हारे बाप की गोदी नही है, -कह कर श्वेतकेतु ने इसका अपमान किया । तब पूछने पर सुजाता ने इसे पूरी जानकारी दी । तदनंतर, श्वेतकेतु के साथ यह जनक के यज्ञ की ओर गया । वहॉं प्रवेश के लिये बाधा आई । द्वारपाल से सयुक्तिक भाषक कर के इसने सभा में प्रवेश प्राप्त किया, तथा वहॉं बंदी को वाद का आव्हान कर के उसे पराजित किया । बंदी ने जिस जिस व्यक्ति को वाद में जीत कर पानी में डुबोया था, वे सब वरुण के घर के द्वादश वाहिक सत्र में गये थे । वे सब वापस आ रहे है, ऐसा कह कर इसने सब को वापस लाया । कहोल तथ अष्टावक्र का मिलन हुआ । तथापि अन्त में, बंदी को जनक ने सागर में डुबो ही दिया [म.व.१३४] । उपरोक्त अष्टावक्र की कथा, लोमश ने युधिष्ठिर को श्वेतकेतु के आश्रम में बताई है । कहोल ने समंगा नदी में स्नान करने को बता कर, इसका टेढा शरीर सीधा किया [म. व.१३२] आगे चल कर, वदान्य ऋषि की सुप्रभा नामक कन्या से इसका विवाह तय हुआ । परंतु उसने इसे कहा कि, उत्तर दिशा में हिमालय के ऊपरी भाग में, एक वृद्ध स्त्री तपश्चर्या कर रही है । वहॉं तक जा कर आने के बाद ही यह विवाह होगा । अष्टावक्र ने यह शर्त मंजूर की । प्रवास करते करते, उस दिव्य प्रदेश से कुबेर का सत्कार स्वीकार कर यह वृद्ध स्त्री के स्थल पर आया । वहॉं इसे ऐश्वर्य की परमावधि तथा अनेक सुन्दर स्त्रियॉं दिखीं । उन्हें जाने के लिये कह कर, उस वृद्ध स्त्री के पास रहने का इसने निश्चय किया । रात्रि के समय शय्या पर जब यह विश्राम कर रहा था, तब वह वृद्ध स्त्री ठंड से कँपकँपाती हुई, इसके पास आई तथा इसको आलिंगन कर प्रेमयाचना करने लगी । परंतु परस्त्री मान कर अष्टावक्र ने उसकी प्रार्थना अमान्य कर दी । उसकी हर चीज की ओर देख कर, अष्टावक्र के मन में घृणा उत्पन्न होती थी । दूसरा दिन उसी ऐश्वर्य में बिताने के बाद, रात्रि के समय पुनः वही प्रकार हुआ । उस समय, वृद्धा ने यौवनरुप धारण किया था । उसने यह भी कहा कि, वह कुमारिका है । परंतु, मेरा विवाह तय हो गया है, ऐस बता कर इसने उसे निवृत्त किया । तब इसके निग्रही स्वभाव के प्रति संतोष प्रगट कर, वृद्धा ने कहा कि, मैं उत्तरदिग्देवता हूँ । तुम्हारे भावी श्वशुर की इच्छानुसार मैनें तुम्हारी परीक्षा ली [म. अनु.५०-५६२] । तदनंतर सुप्रभा के साथ इसका विवाह हुआ । यह बडा तत्त्वज्ञानी था । इसके नामक पर ‘अष्टावक्रगीता ’ नामक एक ग्रंथ प्रसिद्ध है । वह गीता इसने जनक को बताई । एक बार लोकेश्वर नामक ब्रह्मदेव के समय, व्याध के बाण से हरिहर नामक ब्राह्मण का पैर टूट गया । चक्रतीर्थ में स्नान करने पर, वह पैर उसे पुनः प्राप्त हुआ । चक्रतीर्थ की महत्ता की यह कथा, इसने बताई है [स्कंद.३.१.२४] ‘अष्टावक्रसंहिता; नामक ग्रंथ इसके नाम पर है (C.C.) । इसने अप्सराओं को विष्णु को पतिरुप में प्राप्त करने का वरदान दिया, परंतु पानी से बाहर आने पर अप्सरायें इसका वक्रत्व देख कर हँस पडी । तब इसने उन्हें शाप दिया कि, आभीर तुम्हारा हरण करेंगे [ब्रह्म.२१२.८६] । उसी के अनुसार, कृष्णनिर्याण के पश्चात् अर्जुन जब कृष्णपत्नियों को द्वारका से ले जा रहा था, तब मार्ग में आभीरों ने उनका हरण किया । 
  • ( ल . ) कुरुप ; विद्रूप ; विलक्षण दिसणारा ( इसम , बेढब वस्तु ). 
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Category : Hindu - Traditions
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