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श्रीसच्चिन्मुखनवनृसिंहगुरुस्तुतिः

श्रीसच्चिन्मुखनवनृसिंहगुरुस्तुतिः

स्वामि श्री भारतीकृष्णतीर्थ यांनी जी देवदेवतांवी स्तुती केली आहे, अशी क्वचितच् इतरांनी कोणी केली असेल.


श्रीसच्चिन्मुखनवनृसिंहगुरुस्तुतिः [ आर्या ]
संस्कृतिभीतिप्रमुख्यनाशकरम्
नतजननिर्जरवृक्षं ( जनताकल्पतरुं )
श्रीचन्द्रचूडभक्तं वन्दे सच्चिन्मुखनवनृसिंहगुरुम् ॥१॥
शोणम्भोजस्वपदं शोणाम्बरवेष्टितस्वतनुम् ।
काङ्क्षाधिकदातारं वन्दे.................॥२॥
धनमुखसर्वेप्सितदं भवपाथोराशिपारदातारम् ।
विनताखिलपापहरं वन्दे.................॥३॥
श्राणितनतजनकाभ्यं मोचकविद्याभिकाङ्क्षिजननम्यम् ।
सौम्यान्तरङ्गम्यं वन्दे.................॥४॥
कृतकृत्यत्वदनमनं कृतचरणानतिकृतान्तभयशमनम् ।
कृत्स्नप्राणिकृपाब्धिं वन्दे.................॥५॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:56:10.5530000

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जनक III.

  • n. विदेह देश का राजा । इसकी चार स्त्रियॉं थीं । उनमें सुमति पटरानी थी । बहुत वर्षो तक पुत्रसंतान न होने के कारण, इसने पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया । तब दो पुत्र तथा सीता, नामक कन्या इसे पृथ्वी से प्राप्त हुए । पृथ्वी के कथनानुसार इसने, १६ वर्षो तक नरकासुर का पालन किया । त्रेतायुग के पूर्वार्ध की यह घटना है [कालि.३८] । नारद से अमंगल ब्राह्मण का रुप धारण कर इसका गर्वपरिहार किया [गणेश.१.६५] । जनक के संबंध में बहुत सी कथाएँ हैं । वे किसी एक जनक की न हो कर निमिष में उत्पन्न अन्यान्य लोगों की हैं । उदाहरणार्थ याज्ञवल्क्य के समय दैवराति जनक था । उसके बाद काफी वर्षो के पश्चात्, राम का श्वसुर सीरध्वज जनक हुआ । नरकासुर का पालन करनेवाला जनक, कृष्णसमकालीन बहुलाश्व होगा (दैवराति बहुलाश्व तथा सीरध्वज देखिये) । 
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