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अध्याय १०१

उत्तर पर्व - अध्याय १०१

भविष्यपुराणांत धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष अणि आयुर्वेद शास्त्र वगैरे विषयांचा अद्भुत संग्रह आहे.


अध्याय १०१

युधिष्ठिर उवाच ॥

पुनर्मे ब्रूहि देवेश त्वद्भक्त्या भावितामनः । कथ्वमानमिहेच्छामि शुभधसंपदं महत ‍ ॥१॥

यव्राण्वपि नरैर्द्दत्तं जप्तं वा सुमहद्भवेत ‍ ॥२॥

श्रीकृष्ण उवाच । शृणु पांण्डव ते वच्मिरहस्यं देवनिर्मितम् ‍ । यन्मया कस्यचिन्नोक्तं सुप्रियस्यापि भारत ॥३॥

वैशाखमासस्यतुयातृतीयानवस्यसौकार्तिकसुक्लपक्षे । नभस्यमासाय तु कृष्णपक्षे व्रयोदशीं पञ्चदशीं च माघे ॥४॥

वैशाखस्त्रतृतीया तु समा कृतयुगेन तु । नवमी कार्तिकयो तु व्रेतायुगसमावुभौ ॥५॥

व्रयोदशी नभस्ये तु दापरेण समा गता । माधे पञ्चदशी राजन्कलिकालदिरुच्यते ॥६॥

एताश्वतम्रो राजेन्द्र युगानां प्रभवाद्यथा । युगादयश्व कथ्यंते तेनैताः सर्वसूरिभिः ॥७॥

उपवासस्तपोदानं जप होमकियास्तथा । यद्यत्तु क्रियते किंचित्सर्वं कोटिगुणं भवेत् ‍ ॥८॥

वैशाखस्य तृतीयायां श्रीसमेतं जगद्नरुम् ‍ । नारायणे पूजयेथाः पुष्पधूपविलेपनैः ॥९॥

वस्त्रालंकारसंभारैनैंवेद्यौर्विविधैस्तथा । ततस्तस्याग्रतोधेनुर्लवणस्याढकेन तु ॥१०॥

कार्या कुरुकुलश्रेष्ट चतुर्भागेण वत्सकम् ‍ । अविचर्मोपरिस्थाप्य कल्पयित्वा विधानतः ॥११॥

शास्त्रोक्तकमयोगेन ब्राह्मणायोपपादयेत् ‍ । श्रीधरः श्रीपतिः श्रीमाञ्छ्रीशः संप्रीयतामिति ॥१२॥

अनेन विधिना दत्वा धेनुं विप्राय भारत । गोसहस्त्रं दशगुणं प्रान्पोतीह न संशयः ॥१३॥

तथैव कार्तिके मासि नवम्यां नक्तभुङनरः । स्त्रात्वा नदीतडागेषु देवखातेषु वा पुनः ॥१४॥

उमासहायं वरदं नीलकंठमथार्चयेत् ‍ । पुष्पधूपादिनैवेद्यैरनिन्द्यैः शंकरं शिवम् ‍ ॥१५॥

धेनुं तिलमथीं दद्यात्पुरणोक्तविधानतः । अष्टमूर्तिनींलकंठः प्रीयतामिति चिंतयेत् ‍ ॥१६॥

यदव्र प्राप्यते पुण्यं पार्थ तत्केन वर्ण्यते । दत्वा तिलमर्यी धेनुं शिवलोकमवान्पुयात् ‍ ॥१७॥

व्रयोदशी नभसि या कृष्णमस्यां समर्चयेत् ‍ । पितृन्पायसदानेन मधुना च घृतेन तु ॥१८॥

भांजयेद्राह्मणान्भक्त्या वेदबेदाङ्गपारगान् ‍ । पितृनुद्दिश्य दातव्या सवत्सा कां यदोहनी ॥१९॥

प्रत्यक्षा गौर्महाराज तरुणी सुपयस्विनी । पिता पितामहश्वैव तथैव प्रपितामहः ॥२०॥

प्रीयतां गोप्रदानेन इति द्त्वा विसर्जयेत् ‍ । कृतेनानेन राजेन्द्र यत्पुण्यं प्राप्यते नृभिः ॥२१॥

तत्केन वर्णितुं याति वर्षकोटिशतैरपि । पुव्रान्पौव्रान्प्रपौव्रांश्व धनं च महदीप्सितम् ‍ ॥२२॥

इह चान्पोति पुरुषः परव्र च शुभांगतिम् ‍ । पश्वदश्यां च माघस्य पूजयित्वा पितामहम् ‍ ॥२३॥

गायव्या सहितं देबं वेदवेदाङ्गभुषितम् ‍ । नवनीतमयीं धेनुं फलैर्नानाविधैर्युताम् ‍ ॥२४॥

सहिरण्यां सवत्सां च ब्राह्मणाय निवेदयेत् ‍ । कीर्तयेत्प्रीयतामव्र पद्मयोनिः पितामहः ॥२५॥

यत्स्वर्गे यच्च पाताले यच्च मर्त्ये सुदुर्ल्लमम् ‍ । तदवान्पोत्यसंदिग्धं पद्मयोनिप्रसादतः ॥२६॥

यानि चान्यानि दानानि दत्तानि सुबहून्यपि । युगादिषु महाराज अक्षयानि भवंति हि ॥२७॥

अल्पमल्पं हि यःकश्वित्प्रदद्यान्निर्द्धनोपि सन् ‍ । तदक्षयं भवेत्सर्वं युगादिषु न संशयः ॥२८॥

वितानुसारं स्वं ज्ञात्वा वित्तवात्पार्थिवोऽपि वा । अनुसारेण वित्तस्य असाध्येन समा धिना ॥२९॥

भूहिरण्यं गृहं वासः शयनान्यासनानिच । छव्रोपानहयुग्मानि प्रदेयानि द्विजातिषु ॥३०॥

एवं दत्त्वा यथाशक्त्या भोजयित्वा द्विजानपि । पश्वाद्भुञ्जीत सुमना वाग्यतः स्वजनैः सह ॥३१॥

यन्किञ्चिन्मानसं पापं कायिकं वाचिकं तथा । तत्सर्वं नाशमायाति युगादितिथिपुजनात् ‍ ॥३२॥

उद्नीयमानो गन्धर्वैः स्तॄयमानः सुरासुरैः । तत्सर्वं नाशमायाति युगादितिथिपूजनात् ‍ ॥३३॥

यद्दीयते किमपि कोटिगुणं तदाहुः स्नानं जपो नियममक्षयमेव सर्वम् ‍ । स्यादक्षयासु युगपूर्वतिथीषु राजन्व्यासादयो मुनिवराः समुदाहरंति ॥३४॥ [ ४२६६ ]

इति श्रीभविष्ये महापुराणे उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिस्संवादे युगादितिथिव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामैकाधिकशततमोऽध्यायः ॥१०१॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:52:26.4130000

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माल्यवत्

  • n. एक राक्षस, जो सुकेश राक्षस का ज्येष्ठ पुत्र था । इसकी माता का नाम देववती था । इसके दो छोटे भाइयों के नाम सुमालि एवं मालि थे । यह रावण का मातामह था । आगे चल कर सुकेश के तीनों पुत्रों की शादियॉं नर्मदा नामक गंधर्वी की तीन कन्याओं से हुयी । उनमें से सुन्दरी नामक कन्या की शादी माल्यवत् से हुयी थी । 
  • तपस्या n. अपने पिता के तपःसामर्थ्य एवं ऐश्वर्य को प्राप्त कर, यह अपने भाइयों के साथ घोर तपस्या करने लगा । शीघ्र ही इसने अपनी तपस्या से ब्रह्मदेव को प्रसन्न कर उससे वर प्राप्त किया, एवं त्रिकूट पर्वत के शिखर पर, सौ योजन लम्बी एवं बीस योजन चौडी सुवर्णमंडित लंका नामक नगरी प्राप्त की । पश्चात् यह सपरिवार वहॉं जा कर रहने लगा । 
  • विष्णु से युद्ध n. कालोपरांत यह तथा इसके भाई गर्व में उन्मत्त हो कर देवादि को विभिन्न प्रकार से कष्ट देने लगे । उन कष्टों से ऊब कर सारे देव शंकर के निर्देश पर विष्णु के पास गये । तब इन राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा कर के विष्णु ने देवों को भय से मुक्त किया । जैसे ही माल्यवत् को विष्णु की यह प्रतिज्ञा ज्ञात हुयी, यह बहुत घबराया, एवं विष्णु के द्वारा की गयी प्रतिज्ञा इसने अपने भाइयों से कह सुनायी । भाइयों ने इसको धीरज धराया, एवं देवों से युद्ध करने का निश्चय किया । इस युद्ध में विष्णु ने अन्य देवों के साथ इससे घोर संग्राम करते हुए, इसके भाई मालि का वध किया । तब विष्णु के पराक्रम से डर कर, यह अपने भाई सुमाली के साथ पाताल लोक में जाकर रहने लगा । 
  • लंकाप्रवेश n. इधर लंका में वैश्रवण नामक कुबेर निवास करता रहा । कुछ समयोपरांत एक दिन यह अपने पातालपुरी से निकल कर मृत्युलोक जा रहा था कि, इसने वैश्रवण एवं उसके पिता विश्रवस को पुष्पक विमान में बैठ क जाते हुए देखा । उसके वैभव को देख कर यह आश्चर्यचकित हो उठा, एवं उस प्रकार के ऐश्वर्य के भोगलालसा की कामना से इसने अपनी कन्या कैकसी वैश्रवण को दी । कालोपरांत इसी कैकसी से रावण इत्यादि पुत्र हुए (सुमालि देखिये) । बाद, में जब रावण लंका का राजा हुआ, तब माल्यवत् अपने भाई सुमालि तथा अपने परिवार के अन्य राक्षसों के साथ, लंकापुरी में आकर रहने लगा [वा.रा.उ.११] । बाद में रावण के द्वारा सीता का हरण किया जाने पर, इसने उसे सीता को तुरन्त राम के पास लौटा देने के लिए कहा था [वा.रा.यु.३५.९-१०] । उस समय इसने व्याकुलता से परिपूरित हो कर भावनापूर्ण उपदेश रावण को दिया था । 
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