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विनयावली ३६

विनय पत्रिका - विनयावली ३६

विनय पत्रिकामे, भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


राग रामकली

महाराज रामादरयो धन्य सोई ।

गरुअ, गुनरासि, सरबग्य, सुकृती, सूर, सील - निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥१॥

उपल, केवट, कीस, भालु, निसिचर, सबरि, गीध सम - दम - दया - दान - हीने ।

नाम लिये राम किये परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥२॥

ब्याध अपराधकी साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई ।

कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥३॥

पांडु - सुत, गोपिका, बिदुर, कुबरी, सबरि, सुद्ध किये सुद्धता लेस कैसो ।

प्रेम लखि कृस्न किये आपने तिनहुको, सुजस संसार हरिहरको जैसो ॥४॥

कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि, नीच ह्वै ऊँच पद को न पायो ।

दीन - दुख - दवन श्रीरवन करुना - भवन, पतित - पावन विरद बेद गायो ॥५॥

मंदमति, कुटिल, खल - तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँ लोक तिहुँ काल कोऊ ।

नामकी कानि पहिचानि पन आपनो, ग्रसित कलि - ब्याल राख्यो सरन सोऊ ॥६॥

भावार्थः- महाराज श्रीरामचन्द्रजीने जिसका आदर किया वही धन्य है । वही भारी यानी महिमान्वित, गुणोंका भण्डार, सर्वज्ञ, पुण्यवान, वीर, सुशील और साधु है, उसके समान कोई भी नहीं है ॥१॥

पाषाणकी अहल्या, निषाद, बंदर, रीछ, राक्षस, शबरी, जटायु - ये सब शम, दम, दया और दान आदि गुणोंसे बिलकुल हीन थे; परन्तु श्रीराम - नाम स्मरण करनेसे श्रीरामजीने इस सबको ऐसा परम पवित्र बना दिया कि ( आज ) उनके गुणोंका गान करनेसे मनुष्य संसार - सागरसे पार हो जाते हैं ॥२॥

वाल्मीकि व्याधने कौन - से पापकी इच्छा बाकी रखी थी ? पिंगला वेश्याने अपनी बुद्धि भक्तिमें कब लगायी थी ? अजामिल पापीने कौन - सा सोमयज्ञ किया था ? और गजराज कहाँका अश्वमेध करनेवाला था ? ॥३॥

पाण्डवों, गोपियों, विदुर और कुब्जामें पवित्राका लेश भी कहाँ था; परन्तु आपने इन सबको पवित्र कर लिया, प्रेम देखकर श्रीकृष्णरुप अपने इनको अपना लिया, जिससे इनका सुन्दर यश ( आज ) संसारमें विष्णु और शिवके यशके समान छा रहा है ॥४॥

कोल, खस, भील और यवनादि दुष्टोंमें ऐसा कौन है जिसने रामनाम उच्चारण करनेपर नीच होकर भी ऊँचे - से - ऊँचा पद न पाया हो ? दीनोंके दुःखका नाश करनेवाले, लक्ष्मीजीके पति, करुणाके मन्दिर, पतितोंको पावन करनेवाले श्रीरामजीका यश वेदोंने गाया है ॥५॥

( औरोंकी बात जाने दीजिये ) तीनों लोकों और तीनों कालोंमें तुलसी - सरीखा मन्दबुद्धि, कुटिल और दुष्ट - शिरोमणि कोई नहीं हुआ; परन्तु अपने नामकी मर्यादा रखनेके लिये अपने ( पतितपावन ) प्रणको स्मरण करके इस कलिकालरुपी सर्पसे डसे हुएको भी श्रीरामने अपनी शरणमें ले लिया ॥६॥

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Last Updated : September 11, 2009

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