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विनयावली २००

विनय पत्रिका - विनयावली २००

विनय पत्रिकामे , भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


जैसो हौं तैसो राम रावरो जन , जनि परिहरिये ।

कृपासिंधु , कोसलधनी ! सरनागत - पालक , ढरनि आपनी ढरिये ॥१॥

हौं तौ बिगरायल और को , बिगरो न बिगारिये ।

तुम सुधारि आये सदा सबकी सबही बिधि , अब मेरियो सुधरिये ॥२॥

जग हँसिहै मेरे संग्रहे , कत इहि डर डरिये ।

कपि - केवट कीन्हे सखा जेहि सील , सरल चित , तेही सुभाउ अनुसरिये ॥३॥

अपराधी तउ आपनो , तुलसी न बिसरिये ।

दृटियो बाँह गरे परै फुटेहु बिलोचन पीर होत हित कीरिये ॥४॥

भावार्थः - हे श्रीरामजी ! मैं ( भला - बुरा ) कैसा भी हूँ , पर हूँ तो आपका दास ही , इससे मुझे त्यागिये नहीं । हे कोसलनाथ ! आप कृपाके समुद्र और शरणागतोंका पालन करनेवाले हैं । अपनी इस शरणागतवत्सलताकी रीतिपर ही चलिये ॥१॥

मैं तो ( काम , क्रोध आदि ) दूसरोंके द्वारा पहले ही बिगाड़ा हुआ हूँ , इस बिगड़े हुएको ( शरणमें न रखकर और ) न बिगाड़िये । आप तो सदा ही सबकी सब तरहसे सुधारते आये हैं , अब मेरी भी सुधार दीजिये ॥२॥

मुझे अपनानेमें जगत् आपकी हँसी करेगा , आप इस डरसे क्यों डर रहे हैं ? ( आपका तो सदासे यह बाना ही है । ) आपने अपने जिस शील और सरल चित्तसे बंदरों और केवटको अपना मित्र बनाया था , मेरे साथ भी उसी स्वभावके अनुसार बर्ताव कीजिये ॥३॥

यद्यपि मैं अपराधी हूँ , पर हूँ तो आपका ही । इसलिये तुलसीको आप न भुलाइये । ( अपना ) टूटा हुआ भी हाथ गले बँध जाता है और फूटी हुई आँखमें भी जब दर्द होता है , तब उसके अच्छे करानेकी चेष्टा की ही जाती है । ( इसी प्रकार मैं भी यद्यपि टूटी बाँह और फूटी आँखके समान किसी कामका नहीं हूँ तथापि आपका ही हूँ , इसलिये आप मुझे कैसे छोड़ सकते हैं ? ) ॥४॥

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Last Updated : November 13, 2010

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