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विनयावली ८४

विनय पत्रिका - विनयावली ८४

विनय पत्रिकामे, भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


देव ! दूसरो कौन दीनको दयालु ।
सीलानिधान सुजान - सिरोमनि, सरनागत - प्रिये प्रनत - पालु ॥१॥
को समरथ सरबग्य सकल प्रभु, सिव - सनेह - मानस मरालु ।
को साहिब किये मीत प्रीतिबस खग निसिचर कपि भील भालु ॥२॥
नाथ हाथ माया - प्रपंच सब, जीव - दोष - गुन - करम - कालु ।
तुलसिदास भलो पोच रावरो, नेकु निरखि कीजिये निहालु ॥३॥

भावार्थः- हे देव ! ( आपके सिवा ) दीनोंपर दया करनेवाला दूसरा कौन है ? आप शीलके भण्डार, ज्ञानियोंके शिरोमणि, शरणागतोंके प्यारे और आश्रितोंके रक्षक हैं ॥१॥
आपके समान समर्थ कौन है ? आप सब जाननेवाले हैं, सारे चराचरके स्वामी हैं, और शिवजीके प्रेमरुपी मानसरोवरमें ( विहार करनेवाले ) हंस हैं । ( दूसरा ) कौन ऐसा स्वामी है जिसने प्रेमके वश होकर पक्षी ( जटायु ), राक्षस ( विभीषण ), बंदर, भील ( निषाद ) और भालुओंको अपना मित्र बनाया है ? ॥२॥
हे नाथ ! मायाका सारा प्रपंच एवं जीवोंके दोष, गुण, कर्म और काल सब आपके ही हाथ हैं । यह तुलसीदास, भला हो या बुरा, आपका ही है । तनिक इसकी और कृपादृष्टि कर इसे निहाल कर दीजिये ॥३॥

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Last Updated : November 11, 2010

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