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विनयावली २०६

विनय पत्रिका - विनयावली २०६

विनय पत्रिकामे , भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


राम राय ! बिनु रावरे मेरे को हितु साँचो ?

स्वामी - सहित सबसों कहौं , सुनि - गुनि बिसेषि कोउ रेख दूसरी खाँचो ॥१॥

देह - जीव - जोगके सखा मृषा टाँचन टाँचो ।

किये बिचार सार कदलि ज्यों , मनि कनकसंग लघु लसत बीच बिच काँचो ॥२॥

' बिनय - पत्रिका ' दीनकी , बापु ! आपु ही बाँचो ।

हिये हेरि तुलसी लिखी , सो सुभाय सही करि बहुरि पूँछिये पाँचो ॥३॥

भावार्थः - हे महाराज श्रीरामचन्द्रजी ! आपको छोड़कर मेरा सच्चा हितू और कौन हैं ? मैं अपने स्वामीसहित सभीसे कहता हूँ , उसे सुन - समझकर यदि कोई और बड़ा हो , तो दूसरी लकीर खींच दीजिये ॥१॥

शरीर और जीवात्माके सम्बन्धके जितने सखा या हितू मिलते हैं , वे सब ( असत् ) मिथ्या टाँकोंसे सिले हुए हैं । ( संसारके सभी सम्बन्ध मायिक हैं ) विचार करनेपर ये ' सखा ' केलेके पेड़के सारके समान हैं । ( जैसे केलेके पेड़को छीलनेपर छिलके ही निकलते हैं , वैसे ही संसारके सारे सम्बन्ध भी सारहीन केवल अज्ञानजनित ही हैं ) ये वैसे ही सुन्दर जान पड़ते हैं , जैसे मणि - सुवर्णके संयोगसे बीच - बीच क्षुद्र काँच भी शोभा देता है ॥२॥

हे बापजी ! इस दीनकी लिखी ' विनय - पत्रिका ' को तो आप स्वयं ही पढ़िये । ( किसी दूसरेसे न पढ़वाइये । ) तुलसीने इसमें अपने हदयकी सच्ची बातें ही लिखी हैं , इसपर पहले आप अपने ( दयालु ) स्वभावसे ' सही ' बना दीजिये । फिर पीछे पंचोंसे पूछिये ॥३॥

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Last Updated : November 13, 2010

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