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विनयावली ६३

विनय पत्रिका - विनयावली ६३

विनय पत्रिकामे, भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


तोसो हौं फिरि फिरि हित, प्रिय, पुनीत सत्य बचन कहत ।

सुनि मन, गुनि, समुझि, क्यों न सुगम सुमग गहत ॥१॥

छोटो बड़ो, खोटो खरो, जग जो जहँ रहत ।

अपनो अपनेको भलो कहहु, को न चहत ॥२॥

बिधि लगि लघु कीट अवधि सुख सुखी, दुख दहत ।

पसु लौं पसुपाल ईस बाँधत छोरत नहत ॥३॥

बिषय मुद निहार भार सिर काँधे ज्यों बहत ।

योंही जिय जानि, मानि सठ ! तू साँसति सहत ॥४॥

पायो केहि घृत बिचारु, हरिन - बारि महत ।

तुलसी तकु ताहि सरन, जाते सब लहत ॥५॥

भावार्थः- अरे जीव ! मैं तुझझे बार - बार हितकारी, प्रिय, पवित्र और सत्य वचन कहता हूँ, इन्हें सुनकर, मनमें विचारकर और समझकर भी तू सुगम और सुन्दर रास्ता क्यों नहीं पकड़ता ? अर्थात श्रीरामकी शरण क्यों नहीं हो जाता ? ॥१॥

छोटा - बड़ा, खोटा - खरा, जो जहाँ संसारमें रहता हैं, उनमें बता, ऐसा कौन है, जो अपना भला न चाहता हो ? ॥२॥

ब्रह्मासे लेकर छोटे - छोटें कीडेतक सुखसे सुखी होते हैं और दुःखसे जलते हैं, पशुपालक ग्वालेकी तरह परमात्मा जीवरुपी पशुओंको ( ज्ञानसे ) खोलता और उन्हें ( कर्मोंमें ) जोतता है ॥३॥

विषयोंके सुखोंको देख । वे तो सि के बोझेको कन्धेपर रखनेके समान हैं । अर्थात् विषय - सुखमें सुख है ही नहीं, इस तरह मनमें समझकर मान जा । अरे मूर्ख ! क्यों कष्ट सह रहा है ? ॥४॥

तनिक विचार तो कर, मृगतृष्णाके जलको मथकर किसने घी पाया है ? अर्थात् असत् संसारके काल्पनिक पदार्थोंमें सच्चा सुख कैसे मिल सकता है ? हे तुलसी ! तू तो उसी प्रभुकी शरणमें जा, जिससे सब कुछ प्राप्त होता है ॥५॥

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Last Updated : March 22, 2010

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