हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|पुस्तक|विनय पत्रिका|
विनयावली १७३

विनय पत्रिका - विनयावली १७३

विनय पत्रिकामे , भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


याहि ते मैं हरि ग्यान गँवायो ।

परिहरि हदय - कमल रघुनाथहि , बाहर फिरत बिकल भयो धायो ॥१॥

ज्यों कुरंग निज अंग रुचिर मद अति मतिहीन मरम नहिं पायो ।

खोजत गिरि , तरु , लता , भूमि , बिल परम सुगंध कहाँ तें आयो ॥२॥

ज्यों सर बिमल बारि परिपूजन , ऊपर कछु सिवार तृन छायो ।

जारत हियो ताहि तजि हौं सठ , चाहत यहि बिधि तृषा बुझायो ॥३॥

ब्यापत त्रिबिध ताप तनु दारुन , तापर दुसह दरिद्र सतायो ।

अपनेहि धाम नाम - सुरतरु तजि बिषय - बबूर - बाग मन लायो ॥४॥

तुम - सम ग्यान - निधान , मोहि सम मूढ़ न आन पुराननि गायो ।

तुलसिदास प्रभु ! यह बिचारि जिय कीजै नाथ उचित मन भायो ॥५॥

भावार्थः - हे हरे ! मैंने इसी कारण ज्ञानको खो दिया कि जो मैं अपने हदयकमलमें विराजित आपको छोड़कर ( सुखके लिये ) व्याकुल होकर बाहर इधर - उधरके अनेक साधनोंमें भटकता फिरा ॥१॥

जैसे अत्यन्त बुद्धिहीन हरिण अपने ही शरीरमें सुन्दर कस्तूरी होनेपर भी उसका भेद नहीं जानता और पहाड़ , पेड़ , लता , पृथ्वी और बिलोमें ढूँढता फिरता है कि यह श्रेष्ठ सुगन्ध कहाँसे आ रही है ( वही हालत मेरी है । सुखस्वरुप स्वामीके हदयमें रहनेपर भी मैं बाहर ढूँढ़ रहा हूँ ) ॥२॥

तालाब निर्मल पानीसे लबालब भरा है , किन्तु ऊपरसे कुछ काई और घास छायी है । इसीसे ( भ्रमवश ) उस ( तालाबके स्वच्छ ) जलको छोड़कर मैं दुष्ट अपना हदय जला रहा हूँ , और इस प्रकार अपनी प्यास बुझाना चाहता हूँ । ( हदय - सरोवरमें सच्चिदानन्दघन परमात्मारुपी अनन्त शीतल जल भरा है , परन्तु अज्ञानकी काई आ जानेसे मैं मृगजलरुपी सांसारिक भोगोंको प्राप्त करके उनसे परमसुखकी तृष्णा मिटाना चाहता हूँ ओर फलस्वरुप त्रितापस्से जल रहा हूँ ) ॥३॥

एक तो वैसे ही शरीरमें दारुण त्रिविध ताप व्याप रहे हैं , तिसपर यह ( साधन - धनके अभावकी ) असहनीय दरिद्रता सता रही है । ( मैं कैसा महान् मूर्ख हूँ कि ) अपने ही ( हदयरुपी ) घरमें भगवन्नामरुपी ( मनचाहा फल देनेवाला ) जो कल्पवृक्ष है उसे छोड़कर मैंने विषयरुपी बबूलके बागमें अपना मन लगा रखा है । ( बबूलके बागमें दुःखरुप काँटोंके सिवा और क्या मिल सकता है ? ) ॥४॥

आपके समान तो कोई ज्ञान - निधान नहीं है और मेरे समान और कोई मूर्ख नहीं है , यह बात पुराणोंने कही है । इस बातको विचारकर हे नाथ ! आपको जो उचित प्रतीत हो इस तुलसीदासके लिये वही कीजिये ॥५॥

N/A

References : N/A
Last Updated : November 13, 2010

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP