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विनयावली १८२

विनय पत्रिका - विनयावली १८२

विनय पत्रिकामे , भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


राम ! राखिये सरन , राखि आये सब दिन ।

बिदित त्रिलोक तिहुँ काल न दयालु दूजो ,

आरत - प्रनत - पाल को है प्रभु बिन ॥१॥

लाले पाले , पोषे तोषे आलसी - अभागी - अघी ,

नाथ ! पै अनाथनिसों भये न उरिन ।

स्वामी समरथ ऐसो , हौं तिहारो जैसो - तैसो

काल - चाल हेरि होति हिये घनी घिन ॥२॥

खीझि - रीझि , बिहँसि - अनख , क्यों हूँ एक बार

' तुलसी तू मेरो ', बलि , कहियत किन ?

जाहिं सूल निरमूल , होहिं सुख अनुकूल ,

महाराज राम ! रावरी सौं , तेहि छिन ॥३॥

भावार्थः - हे श्रीरामजी ! मुझे अपने ही शरणमें रखिये , क्योंकि ( मुझे सरीखोंको ) सदासे आप ही अपनाते आये हैं । यह सभी जानते हैं कि तीनी लोकों और तीनों कालोंमें आपके समान दयालु दूसरा कोई नहीं है । हे नाथ ! आर्त शरणागतोंकी रक्षा करनेवाला आपके सिवा दूसरा कौन है ? ॥१॥

आपने ही आलसी , अभागे और पापी लोगोंको लालन - पालन किया , उन्हें पाला - पोसा और प्रसन्न रखा ; तिसपर भी हे नाथ ! आप उनसे कभी उऋण नहीं हुए । हे स्वामी ! आप तो समर्थ हैं ; पर मैं ( भला - बुरा ) जैसा कुछ हूँ , आपहीका हूँ । कलिकालकी चालें देखकर मेरे हदयमें बड़ी घिन हो रही है ( यह शंका है कि कहीं यह दुष्ट आपके चरणोंकी ओरसे मेरे मनको फेर न दे । ) ॥२॥

बलिहारी ! एक बार नाराजीसे अथवा राजीसे , मुसकराकर या अनखाकर किसी भी तरह इतना क्यों नहीं कह देते कि ' तुलसी ! तू मेरा है ' इतना कह देनेमात्रसे ही , हे महाराज रामचन्द्रजी ! मैं आपकी शपथ खाकर कहता हूँ , उसी क्षण मेरा सारा दुःख जड़से नष्ट हो जायगा और समस्त सुख मेरे अनुकूल हो जायँगे ॥३॥

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Last Updated : November 13, 2010

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