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अध्यायः १६३

आचारकाण्डः - अध्यायः १६३

विष्णू पुराणाचा एक भाग असलेल्या गरूड पुराणात मृत्यूनंतरच्या स्थितीबद्दलची चर्चा आहे, शिवाय श्रद्धाळू हिंदू धर्मीयांमध्ये मृत्यूनंतर जी विविध क्रिया कर्मे केली जातात, त्याला गरूडपुराणाची पार्श्वभूमी आहे.


अध्यायः १६३
धन्वन्तीररुवाच ।
विसर्पादिनिदानन्ते वक्ष्ये सुश्रुत तच्छृणु ।
स्याद्विसर्पो विघातात्तु दोषैर्दुष्टैश्च शोथवत् ॥१॥

अधिष्ठानञ्च तं प्राहुर्बाह्यं तत्र भयाच्छ्रमात् ।
यथात्तरञ्च दुः साध्यस्तत्र दोषो यथायथम् ॥२॥

प्रकोपनैः प्रकुपिता विशेषेण विदाहिभिः ।
देहे शीघ्रं विशन्तीह तेऽन्तरे हि स्थिता बहिः ॥३॥

तृष्णाभियोगाद्वेगानां विषमाच्च प्रवर्तनात् ।
आशु चाग्निबलभ्रंशादतो बाह्यं विसर्पयेत् ॥४॥

तत्र वातात्स वीसर्पो वातज्वरसमव्यथः ।
शोथस्फुरणनिस्तोदभेदायासार्तिहर्षवान् ॥५॥

पित्ताद्द्रुतगतिः पित्तज्वरलिङ्गोऽतिलोहितः ।
कफात्कण्डूयुतः स्निग्धः कफज्वरसमानरुक् ॥६॥

सन्निपातसमुत्थाश्च सर्वलिङ्गसमन्विताः ।
स्वदोषलिङ्गैश्चीयन्ते सर्वैः स्फोटैरुपेक्षिताः ।
तेऽपि स्वेदान्विमुञ्चति बिभ्रतो व्रणलक्षणम् ॥७॥

वातपित्ताज्ज्वरच्छर्दिमूर्छातीसारतृड्भ्रमैः ।
गन्थिभेदाग्निसदनतमकारोचकैर्युतः ॥८॥

करोति सर्वमङ्गञ्च दीप्ताङ्गारावकीर्णवत् ।
यंयं देशं विसर्पश्च विसर्पति भवेत्ससः ॥९॥

शान्ताङ्गारासितो नीलो रक्तो वासु च चीयते ।
अग्निदग्ध इव स्फोटैः शीघ्रगत्वाद्द्रुतं स च ॥१०॥

मर्मानुसारी वीसर्पः स्याद्वातोऽतिबलस्ततः ।
व्यथतेऽङ्गं हरेत्संज्ञां निद्राञ्च श्वासमीरयेत् ॥११॥

हिक्काञ्च स गतोऽवस्थामीदृशीं लभते नरः ।
क्वचिन्मर्मारतिग्रस्तो भूमिशय्यासनादिषु ॥१२॥

चेष्टमानस्ततः क्लिष्टो मनोदेहप्रमोहवान् ।
दुष्प्रबोधोऽश्नुते निद्रां सोऽग्निवीसर्प उच्यते ॥१३॥

कफेन रुद्धः पवनो भित्त्वातं बहुधा कफम् ।
रक्तं वा वृद्धरक्तस्य त्वक्छिरास्नायुमांसगम् ॥१४॥

दूषयित्वा तु दीर्घानुवृत्तस्थूलखरात्मिकाम् ।
ग्रन्थीनां कुरुते मालां सरक्तान्तीव्ररुग्ज्वराम् ॥१५॥

श्वासकासातिसारास्यशोषहिक्कावमिभ्रमैः ।
मोहवैवर्ण्यमूर्छाङ्गभङ्गग्निसदनैर्युताम् ।
इत्ययं ग्रन्थिवीसर्पः कफमारुतकोपजः ॥१६॥

कफपित्ताज्ज्वरः स्तम्भो निद्रा तन्द्रा शिरोरुजा ।
अङ्गावसादविक्षेंपौ प्रलापारोचकभ्रमाः ॥१७॥

मूर्छाग्निहानिर्भेदोऽस्थ्नां पिपासेन्द्रियगौरवम् ।
आमोपवेशनं लेपः स्रोतसां स च सर्पति ॥१८॥

प्रायेणामाशयं गृह्णन्नेकदेशं न चातिरुक् ।
पीडकैरवकीर्णोऽतिपीतलोहितपाण्डुरैः ॥१९॥

स्निध्नोऽसितो मेचकाभो मलिनः शोथवान्गुरुः ।
गम्भीरपाकः प्रायोष्मस्पृष्टः क्लिन्नोंऽवदीर्यते ॥२०॥

पक्ववच्छीर्णमांसश्च स्पष्टस्नायुशिरागणः ।
सर्वगो लक्षणैः सर्वेः सर्वगत्वक्समर्पणः ।
शवगन्धी च वीसर्पः कर्दमाख्यमुशन्ति तम् ॥२१॥

बाह्यहेतोः क्षतात्क्रुद्ध्वः सरक्तं पित्तमीरयन् ।
वीसर्पं मारुतः कुर्यात्कुलत्थसदृशैश्चितम् ॥२२॥

स्फोटैः शोथज्वररुजादाहाढ्यं श्यावशोणितम् ।
पथग्दोषैस्त्रयः साध्या द्वन्द्वजाश्चानुपद्रवाः ॥२३॥

असाध्याः कृतसर्वोत्थाः सर्वे चाक्रान्तमर्मणः ।
शीर्णस्नायुशिरामांसाः क्लिन्नाश्चशवगन्धयः ॥२४॥

इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे वीसर्पनिदानं नाम त्रिपष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:53:08.5830000

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मत्स्यावतार

  • n. पृथ्वी पर मत्स्यावतार किस प्रकार हुआ, इसकी सब से प्राचीनतम प्रमाणित कथा शतपथ ब्राह्मण में प्राप्त है । एक बार, आदिपुरुष वैवस्वत मनु प्रातःकाल के समय तर्पण कर रहा था, कि अर्ध्य देते समय उसकी अंजलि में एक ‘मत्स्य’ आ गया । ‘मत्स्य’ ने राजा मनु से सृष्टिसंहार के आगमन की सूचना से अवगत कराते हुए आश्वासन दिया कि, आपत्ति के पूर्व ही यह मनु को सुरक्षित रुप से उत्तरगिरि पर्वत पर पहुँचा देगा, जहॉं प्रलय के प्रभाव की कोई सम्भावना नहीं । इसके साथ ही इसने यह भी प्रार्थना की कि, जबतक यह बडा न हो तब तक मनु इसकी रक्षा करें । यह ‘मत्स्य’ जब बडा हुआ, तब मनु ने उसे महासागर में छोड दिया । पृथ्वी पर जलप्रलय होने पर समस्त प्राणिमात्र बह गये । एकाएक मनु के द्वाराबचया हुआ मत्स्य प्रकट हुआ, एवं इसने मनु को नौका में बैठाकर उसे हिमालय पर्वत की उत्तरगिरे शिखर पर सुरक्षित पहुँचा दिया । आगे चलकर मनु ने अपनी पत्नी इडा के द्वारा नयी मानव जाति का निर्माण किया [श.ब्रा.१.८.१.१]; मनु वैवस्वत देखिये । 
  • पुराणों में n. पद्म में मत्स्यावतार की यह कथा कुछ अलग ढंग से दी गयी है । कश्यप ऋषि को दिति नामक पत्नी से उत्पन्न मकर नामक दैत्य ने ब्रह्मा को धोखा देकर वेदों का हरण किया, एवं इन वेदों को लेकर वह पाताल में भाग गया । वेदों के हरण हो जाने के कारण, सारे विश्व में अनाचार फैलने लगा, जिससे पीडित होकर ब्रह्मा ने विष्णु की शरण में आकर उसे वेदों की रक्षा की प्रार्थना की । तब विष्णु ने मत्स्य का अवतार लेकर मकरासुर का वध किया एवं उससे वेद लेकर ब्रह्मा को दिये । आगे चलकर एक बार फिर मकर दैत्य ने वेदों के हरण किया, जिससे विष्णु को मत्स्य का अवतार लेकर पुनः वेदों का संरक्षण करना पडा [पद्म.उ.२३०] 
  • मत्स्यपुराण में मत्स्यावतार की कथा निम्न प्रकार से दी गयी हैः n. पच्चीसबें कल्प के अन्त में ब्रह्मदेव की रात्रि का आरम्भ हुआ । जिस समय वह नींद में था, उसी समय प्रलय हुआ, जिससे स्वर्ग, पृथ्वी आदि लोग डूब गये । निद्रावत्स्था में ब्रह्मदेव के मुख से वेद नीचे गिरे, तथा हयग्रीव नामक दैत्य ने उनका हरण किया । इसीसे हयग्रीव नामक दैत्य ने उनका हरण किया । इसीसे हयग्रीव नामक दैत्य क अनाश करने के लिए भगवान् विष्णु ने सूक्ष्म मत्स्य का रुप धारण किया, तथा वह कृपमाला नदी में उचित समय के प्रतीक्षा करने लगा । इसी नदी के किनारे वैवस्वत मनु तप कर रहा था । एक दिन तर्पण करते समय उसकी अंजलि में एक छोटासा मत्स्य आया । वह इसे पानी मे छोडने लगा कि, मत्स्य ने उससे अपनी रक्षा के लिए प्रार्थना की । तब दयालु मनु ने इसे कलश में रक्खा । यह मत्स्य उत्तरोत्तर बढता रहा, अन्त में मनु ने इसे सरोवर में छोड दिया । तथापि इसका बढना बन्द न हुअ अ। त्रस्त होकर मनु इसे समुद्र में छोडने लगा, तब इसने उससे प्रार्थना की, ‘मुझे वहॉं अन्य जलचर प्राणी खा डालेंगे, अतएव तुम मुझे वहॉं न छोड कर मेरी रक्षा करो’। तब मनु ने आश्चर्यचकित होकर इससे कहा, ‘तुम्हारे समान सामर्थ्यवान् जलचर मैंने आजतक न देखा है, तथा न सुना है ।तुम एक दिन में सऔ योजन लंबेचौडे हो गये हो, अवश्य ही तुम कोई अपूर्व प्राणी हो । तुम परमेश्वर हो, तथ तुमने जनकल्याण हेतु ही जन्म लिया होगा’। यह सुनकर मत्स्य ने कहा, ‘आज से सातवें दिन सर्वत्र प्रलय होगी, तथा सारा संसार जलमग्न हो जायेगा । इसलिए नौका में सप्तर्षि, दवाइयॉं, बीज इत्यादि लेकर बैठ जाओ । अगर नौका हिलने लगे तो वासुकि की रस्सी बनाकर मेरे सींग में बॉंध दो’। प्रलय आने पर मनु ने वैसा ही किउया, एवं मत्स्य की सहायता के द्वार वह प्रलय से बचाया गया [मत्स्य.१-२,२९०] । भागवत में मत्स्यद्वारा बचाये गये राजा का नाम वैवस्वत मनु न देकर दक्षिण देशाधिपति सत्यव्रत दिया गया है । उस ग्रन्थ के अनुसार, प्रलय के पश्चात् मत्स्यावतारी विष्णु ने सत्यव्रत राजा को मन्वन्तराधिपति प्रजापति बनने का आशीर्वाद दिया, एवं उसे मत्स्यपुराण संहिता का उपदेश भी दिया [भा.१.३.१५, ८.२४];[ मत्स्य.१.३३-३४] । उस आशीर्वाद के अनुसार, सत्यव्रत राजा वैवस्वत मन्वनंतर में से कृतयुग का मनु बन गया । विष्णुधर्म के अनुसार, प्रलय के पश्चात् केवल सप्तर्षि जीवित रहे, जिन्हे मत्स्यरुपधारी विष्णु ने श्रुंगी बनकर हिमालय के शिखर पर पहुँचा दिया, एवं उनकी जान बचायी [विष्णुधर्म.१.७७. म.व.१८५] 
  • मत्स्यकथा का अन्वयार्थ n. मनु का निवासस्थान समुद्र के किनारे था । आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि से, समुद्र में बाढ आने के पूर्व समुद्र की सारी मछलियों तट की ओर भाग क्र किनारे आ लगती है, क्योंकि बाढ के समय उन्हे गन्दे जल में स्वच्छ प्राण वायु नहीं प्राप्त हो पाती । सम्भव यही है कि, पृथ्वी में जलप्लावन के पूर्व समुद्र से सारी मछलियों तट की ओर भगने लगी हों, तथा उनमें से एक मछली मनु के सन्ध्या करते समय अंजलि में आ गयी हो । इससे ही मनु ने समझ लिया होगा कि, बहुत बढी बाढ आनेवाली है,म क्यों कि सारी मछलियॉं किनारे आ लगी है । इस संकेत से ही पूर्वतैयारी करके उसने अपने को जलप्लावन से बचाया हो । इसी कारण प्रलयोपरांत मनु को वह मछली साक्षात् विष्णु प्रतीत हुयी हो । बहुत सम्भव है कि, मत्स्यावतार की कल्पना इसी से की गयी हो । 
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Category : Hindu - Beliefs
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