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मराठी मुख्य सूची|मराठी पुस्तके|श्रीज्ञानेश्वरांची गाथा|
अभंग ३३८ ते ३३९

पांडुरंग प्रसाद - अभंग ३३८ ते ३३९

श्रीज्ञानेश्वर महाराजांची गाथा म्हणजे विठ्ठल प्राप्तीचा एक सोपा मार्ग. यात विठ्ठ्लाच्या सगुणनिर्गुण रूपाचे मोहक वर्णन केलेले आहे.


पांडुरंग प्रसाद

३३८

सर्वगत निर्धारितां आत्मा एक

चराचरीं तेथें तंव नाहीं दुजेयाची परी ।

चारी खाणी चारी वाणी चौर्‍यांयशीं

लक्ष योनी मी अपत्य तुमचें अवधारी ॥

तुझिया भेटीलागी रोडेलों दातारा हे

तनु होतसे संकीर्ण भारी ।

जवळीच असतां भेटि कां नेदिसी

थोर सिणविलो वोरबारी रया ॥१॥

तुजविण मी कष्टलों दातारा

कष्टोनि खेदक्षीण जालों ।

संसारश्रम त्रिविधतमें मार्ग

सिध्दचि चुकलों ॥

उपजोनियां बुध्दी येऊं पाहे तुझे

शुध्दी तंव द्वैतसंगें भांबवलों रय ॥ध्रु०॥

मागील कष्ट सांगतां दुर्घट नको

नको ते आठवण ।

सुखदु:खें प्राण पिडला गा बापा

गुणत्रयें ओझें जडपण ।

भव विभव निरय आपदा ऐसें

ऐकिलें आनेआन ।

तूं हे जीव तरी भोगितां हे कवण

हें आकळीतां वाटे विंदान रया ॥२॥

वेळोवेळ भावाभाव बोलतां अवचिता

चोरटा काम उठी ।

तुज देखतां अनादि वाटपाडे वधापरि

धैर्य धांवणे न करिसी गोष्ठी ॥

तुझियें दृष्टी शरीर काळ फाडफाडूं खातो

कवण काकुलती तया ना तुज नुठी

ऐसें विपरीत नवल वाटे ये सृष्टी रया ॥३॥

ऐसें न कळतां भरंवसा मी हिंडे दिशा

हें तंव मन जालेंसें पिसें ।

असोयी जातां अपायी पडिजे श्वास

उश्वास पाळती सरिसे ॥

वय वित्ताचा अंत घेउनि नाडळेपण

परत्र पंथ नकळे भरवसें ।

कर्म वाटे आड गर्वे रिगतां तंव

विघ्नचि उदैलें अपैसें रया ॥४॥

ऐसी माया मोहाची भुलवाणी घालुनि

कीं बापा लाविलें अविचार कामा ।

उपाधि वळसा नथिला धिंवसा

जड केला शुध्द आत्मा ॥

मी तूं कवणाचें विंदान न कळेचि

ऐसी नित निगुति सीमा ।

तर्कबीज कैसें सांपडले वर्म मा

हाचि भावो कल्पिला आम्हा रया ॥५॥

ऐसा वाउगाचि सोसु पुरला गा

बापा परि तूं न पडसी ठाउका ।

साही दर्शनां अठारा पुराणां वेवादु

नाहीं खुंटला ॥

आपुलाला स्वमार्गु संपादिता केउतां

जासी गांवींचा गांवी ।

विश्वास नाहीं चित्ता ये देहीं

ऐसियासी कीजे कायि रया ॥६॥

ऐसा जन्मोनि का उबगलासी मायबापा

कवण कां सांडिली ऐसी ।

रंका काळाचेनि धाकें सत्कर्मे

अनेकें विश्रांति नाहीं या जीवासी ॥

समर्थपणें वेगळें घातलें तरि दैन्य

दारिद्र्य कां भोगवितासी ।

आपुलें म्हणतां न लाजसी देवा

तरि सांगपां माव आहे ते कैसी रया ॥७॥

समुद्रीचें जळ घेऊनि मेघ वरुषती मेदिनी

तें कां मागुतें मिळे सागरीं ।

आकाशा पासाव उत्पत्ति वायु

हिंडे दशदिशीं ।

परि तें ठायींच्या ठायीं राहणें जालें ।

जळींहुनि तरंग अनेक उमटती

परि ते जळींचे जळीं निमाले ॥

स्वप्नसंगें परदेशा गेले तरी

जागृति ठायीं संचले रया ॥८॥

ऐसा तुज पासाव सगुण स्वरुप

जन्मलो गा देवा आतां

कैसोनि वेगळा निवडे ।

लवण पडिलें जळीं कीं कर्पूरासि

नुरे काजळीं तैसे भावार्थ प्रेम चोखडें ॥

ज्ञानदेव म्हणे रुक्मिणीरमणा देई

क्षेम वर्म न बोले फुडें ।

निवृत्तिप्रसादें खुंटला अनुवाद फिटलें

सकळही सांकडें रया ॥९॥

३३९

तो आपुलिया चाडा कोटिगर्भवासां येतां

श्लोघिजे तुझिया गोमटेपणा पकडलो दातारा ।

हें बोलणें बोलतां लाजिजेजी सुंदरा ॥१॥

तुमतें देखिलिया हें मन

मागुतें मोहरेना ।

वज्र द्रवे परि मन न द्रवे

हाचि विस्मो पुढतु पुढती सुंदरा ॥२॥

ऐसें स्थावर जंगम व्यापिलें कीं आपुलें

वालभ केलें तूंत देखिल्या त्रिगुणुपरे ऐसें

कोणे निष्ठुरें घडविलेजी सुंदरा म्हणौनि तुज

माजी विरावें कीं देवा

तूंचि होऊनि राहावें ।

बापरखुमादेविवरा न बोलावे परि

बोले हें स्वभावेंजी सुंदरा ॥४॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2010-02-25T21:50:49.3800000

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वसिष्ठ (मैत्रावरुणि)

  • n. एक ऋषि, जो उत्तरपांचाल के सुविख्यात सम्राट् पैजवन सुदास राजा का पुरोहित था । वैदिक परंपरा के सर्वाधिक प्रसिद्ध पुरोहित में से यह एक माना जाता है । ऋग्वेद के सातघे मंडल के प्रणयन का श्रेय इसे दिया गया है [ऋ. ७.१८.३३] । ऋग्वेद सर्वानुक्रमणी में, ऋग्वेद के नवम मंडलारंगत सत्तानवे सूक्त के प्रणयन का श्रेय भी वसिष्ठ एवं उसके वंशजो को दिया गया है । इस ग्रंथ के अनुसार, इस सूक्त की पहली तीन ऋचाओं का प्रणयन स्वयं वसिष्ठ ने किया, एवं इस सूक्त के चार से तीस तक की ऋचाओं का प्रणयन, वसिष्ठ ऋषि के कु ल में उत्पन्न निम्नलिखित नौ वसिष्ठों के द्वारा किया गया थाः- इंद्रप्रमति-ऋचा ४-६; वृषगण-ऋचा ७-९; मन्यु-ऋचा १०-१२; उपमन्यु-ऋचा १३-१५; व्याघ्रपाद - ऋचा १६-१८; शक्ति-ऋचा १९-२१; कर्णश्रुत-ऋचा २२-२३; मृलीक - ऋचा २५-२७; वसुक्र-ऋचा २८-३) । इस सूक्त में से ३१-४४ ऋचाओं की रचना पराशर शाक्त्य (शक्ति पुत्र) के द्वारा की गई थी, जो स्वयं वसिष्ठपुत्र शक्ति का ही पुत्र था । किन्तु पार्गिटर के अनुसार, इन अंतिम ऋचाओं की रचना वसिष्ठकुलोत्पन्न पराशर के द्वारा नही, बल्कि शंतनु राजा के समकालीन किसी अन्य पराशर के द्वारा हुई होगी [पार्गि. पृ. २१३] 
  • जन्म n. ऋग्वेद में वसिष्ठ ऋषि को वरुण एवं उर्वशी अप्सरा का पुत्र कहा गया है [ऋ. ७.३३.११] । ऋग्वेद के इसी सूक्त में इसे मित्र एवं वरुण के पुत्र अर्थ से ‘मैत्रा वरुण’ अथवा ‘मैत्रावरुणि’ कहा गया है । एक बार मित्र एवं वरुण ने उर्वशी अप्सरा को देखा, जिसे देखते ही उनका रेत स्खलित हुआ। उन्होंनें उसे एक कुंभ में रख दिया, जिससे आगे चल कर वसिष्ठ एवं अगत्स्य ऋषिओं का जन्म हुआ [ऋ. ७.३३.१३] । इसी कारण, इन दोनों को ‘कुंभयोनि’ उपाधि प्राप्त हुई, एवं उनके वंशजो को ‘कुण्डिन’, ‘कुण्डिनेय’ एवं ‘कौण्डिन्य’ नाम प्राप्त हुए [ऋ. सर्वानुक्रमणी. १,१६६];[ नि. ५.१३] । ऋग्वेद में अन्यत्र वसिष्ठ का जन्म कुंभ में नही, बल्कि उर्वशी के गर्भ से होने का निर्देश प्राप्त होता है [ऋ. ७.३३.१२] । पार्गिटर के अनुसार, ‘मैत्रावरुण’ वसिष्ठ का पैतृक नाम न हो कर, उसका व्यक्तिनाम था, जो मित्रावरुण का ही अपभ्रष्ट रूप था [पार्गि. पृ. २१६];[ बृहद्दे. ४.८२] । हसी कारण, वसिष्ठ के ‘मैत्रावरुण’ पैतृक नाम का स्पष्टीकरण देने के लिए, इसकी जो जन्मकथा ऋग्वेद में प्राप्त है, वह कल्पनारम्य प्रतीत होती है । वसिष्ठ मित्रावरुण का पुत्र कैसे हुआ इसके संबंध में, अपनी पूर्वजन्म में इसने विदेह के निमि राजा के साथ किये संघर्ष की जो कथा बृहद्देवता एवं पुराणों में प्राप्त है, वह भी कल्पनारम्य है [बृहद्दे.५.१५६];[ मत्स्य. २०१.१७-२२]; निमि विदेह देखिये । 
  • विश्र्वामित्र से विरोध n. वसिष्ठ ऋषि का विश्र्वामित्र के प्रति विरोध का स्पष्ट निर्देश ऋग्वेद में प्राप्त है । वसिष्ठ ऋषि के पूर्व सुदास का पुरोहित विश्र्वामित्र था [ऋ. ३.३३.५३] । किन्तु उसके इस पद से भ्रष्ट होने के पश्र्चात्, वसिष्ठ भरत राजवंश का एवं सुदास राजा का पुरोहित बन गया। तदोपरान्त विश्र्वामित्र ऋषि सुदास के शत्रुपक्ष में शामिल हुआ, एवं उसने सुदास के विरुद्ध दाशराज्ञ युद्ध में भाग लिया था । गेल्डनर के अनुसार, ऋग्वेद में वसिष्ठ एवं विश्र्वामित्र के शत्रुत्व का नहीं, बल्कि वसिष्ठपुत्र शक्ति के साथ हुए विश्र्वामित्र के संघर्ष का निर्देश प्राप्त है । ऋग्वेद के तृतीय मंडल में ‘वसिष्ठ द्वेषिण्य;’ नामक वसिष्ठविरोधी मंत्र प्राप्त है, जो वसिष्ठपुत्र शक्ति को ही संकेत कर रचायें गये थे [ऋ. ३.५३.२१-२४] । कालोपरांत शक्ति से प्रतिशोध लेने के लिए, विश्र्वामित्र ने सुदास राजा के सेवकों के द्वारा उसका वध किया [तै. सं. ७.४.७.१];[ पं. ब्रा. ४.७.३];[ ऋ. सर्वानुक्रमणी ७.३२] । किंतु उपर्युक्त सारी कथाओं में, वसिष्ठ का सुदास राजा के साथ विरोध होने का निर्देश कहॉं भी प्राप्त नहीं है । ऐतरेय ब्राह्मण में, वसिष्ठ को सुदास राजा का पुरोहित एवं अभिषेकर्ता कहा गया है [ऐ. ब्रा. ७.३४.९] । फिर भी सुदास राजा की मृत्यु के पश्र्चात्, विश्र्वामित्र पुनः एक बार सुदास के वंशजो (सौदासों) का पुरोहित बन गया [नि. २.२४];[ सां. श्रौ. २६.१२.१३] । तत्पश्र्चात् अपने पुत्र के वध का प्रतिशोध लेने के लिए, वसिष्ठ ने सौदासों को परास्त कर पुनः एक बार अपना श्रेष्ठत्व स्थापित किया। किंतु सौदासों के साथ वसिष्ठ का यह शुत्रुत्त्व स्थायी स्वरूप में न रहा। भरत राजकुल एवं राज्य का कुलपरंपरागत पुरोहित पद वसिष्ठवंश में ही रहा, जिसके अनेकानेक निर्देश ब्राह्मणग्रंथों में प्राप्त हैं [पं. ब्रा. १५.४.२४];[ तै. सं. ३.५.२.१] 
  • यज्ञकर्ता आचार्य n. शतपथ ब्राह्मण में एक यज्ञकर्ता आचार्य के नाते वसिष्ठ का निर्देश अनेकबार प्राप्त है । यज्ञ के समय, यज्ञकर्ता पुरोहित ने ‘ब्रह्मन् के रूप में कार्य करना चाहिए’ यह सिद्धांन्त वसिष्ठ के द्वारा ही सर्वप्रथम प्रस्थापित किया गया। शुनःशेप के यज्ञ में वसिष्ठ ब्रह्मन् बना था [ऐ. ब्रा. ७.१६];[ सां. श्रौ. १५.२१.४] । एक समय, केवल वसिष्ठगण ही ‘ब्रह्मन्’ के रूप में कार्य करनेवाले पुरोहित थे, किन्तु बाद में अन्य सारे पुरोहितगण भी इस रूप में कार्य करने लगे [श. ब्रा. १२.६.१.४१] 
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