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अध्याय ७८

उत्तर पर्व - अध्याय ७८

भविष्यपुराणांत धर्म, सदाचार, नीति, उपदेश, अनेक आख्यान, व्रत, तीर्थ, दान, ज्योतिष अणि आयुर्वेद शास्त्र वगैरे विषयांचा अद्भुत संग्रह आहे.


अध्याय ७८

श्रीकृष्ण उवाच ॥

तथान्यामपि ते वच्मि गोविन्दद्वादशीं शृणु । तस्याः सम्यगनुष्ठानात्प्रान्पोत्यभिमतं फलप ॥१॥

पौषे मासे सिते पक्षे द्वादश्यां समुपोषितः । सम्यक्संपूज्य गोविन्दनान्मा देवमधोक्षजम् ‍ ॥२॥

धूपपुष्पोपचारैश्व नैवेद्यैश्व समाहितः । गोविन्देति जपेन्नाम पुनस्तद्नतमानसः ॥३॥

विप्राय दक्षिणां दद्याद्यथाशाक्त्या तराधिप । स्वयं विबुद्भस्तुलितो गोविन्द्रेति च कीर्तयेत् ‍ ॥४॥

पाखण्डिभिर्विकर्मस्थैरालपांश्व विवर्जयेत् ‍ गोमूव्रं गोमयं वापि दधिक्षीरमथापि वा ॥५॥

गोदोहतः समुद्भतं प्राश्नीतात्मविशुद्धये । द्दितीयेऽह्रि पुनः स्त्रानं तथैवाभ्यर्च्य केशवम् ‍ ॥६॥

तेनैव नान्मा संपूज्य दत्त्वा विप्रस्य द्वक्षिणाम् ‍ । ततो भुञ्जीत गोदोहं संभूतेन समुद्भुवम् ‍ ॥७॥

एवमेदाखिलान्मासानुपोष्य प्रयतः शुचिः । दद्याद्नवाह्रिकं विद्वान्प्रतिमासं तु शक्तितः ॥८॥

पारिते च पुनर्बर्षे गोविन्दं पद्मया सह । गोविन्दः प्रीतिमायात व्रतेनानेत मे सदा ॥९॥

विशेषतः पुनर्दद्यात्तस्मिन्नह्रि गवाह्रिकम् ‍ । भक्त्या परमया राजञ्छृणु यत्फलमान्पुयात् ‍ ॥१०॥

स्वर्णशृङ्गं रौप्यखुरं गोशतं वृषभं वरम् ‍ । प्रतिमासं द्विजातिभ्यो दत्वा यत्फलमश्नुते ॥११॥

तदान्पोत्यखिलं सम्यग्व्रतमेतदुपोषितः । तं च लोकमवान्पोति गोविन्दो यव्र तिष्ठति ॥१२॥

गोविन्दद्वादशीमेतामुपोष्यन्ति विधानतः । विद्योतमाना द्दश्यन्ते लोकेऽद्यापि शशाङ्कवत् ‍ ॥१३॥

गोविन्दमर्चयति गोरसभोजनस्तु गावो विनोदयति तद्वद्नवाह्रिकश्व । यो द्वादशीषु कुरुराज कृतोपवासः प्रान्पोत्यसौ सुरभिलोकमपेतशोकम् ‍ ॥१४॥ [ ३२४६ ]

इति श्रीभविष्ये महापुराण उत्तरपर्वणि श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादगोविन्दव्रतवर्णनं नामाष्टसप्ततीतमोऽष्यायः ॥७८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T11:52:25.1630000

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बालधि

  • n. एक शक्तिशाली ऋषि, जिसने पुत्रप्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी । इसकी तपस्या से प्रसन्न हो कर देवों ने इसे वर मॉंगने के लिये कहा । किन्तु इसके द्वारा अमरपुत्र की मॉंग की जाने पर देवों ने इसे कहा, ‘इस सृष्टि की हर एक वस्तु नश्वर है, इसी कारण अमर पुत्र की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है’। फिर सामने दिखाई देनेवाले पर्वत की ओर निर्देश करते हुए इसने देवताओं से कहा, ‘यह पर्वत जितने वर्ष रह सकेगा उतनी वायु का पुत्र आप मुझे प्रदान करे’। इसकी प्रार्थना के अनुसार, देवों ने इसे एक पुत्र प्रदान किया जिसका नाम मेधावी था । उसे यह बडे लाडप्यार से ‘पर्वतायु’ कहता था । बडा होने पर पर्वतायु देवों के वर का आश्रय ले कर अत्यंत उद्दण्ड बन गया । एक बार उसने धनुषाक्ष नामक महर्षि का बिना किसी कारण अपमान किया । उस समय महर्षि ने पर्वतायु को शाप दिया, ‘तुम भस्म हो जाओंगे’। महर्षि के इस शाप का पर्वतायु पर कोई भी असर न हुआ, एवं वह जीवित ही रहा । अपना शाप विफल हुआ यह देख कर धनुषाक्ष ऋषि को अत्यंत आश्चर्य हुआ । पश्चात् दिव्यदृष्टि से उसने पर्वतायु के बर का रहस्य जान लिया, एवं अपने तपोबल से एक भैंसा निर्माण कर उसके द्वारा वह पर्वत खुदवा डाल, जिसके उपर पर्वतायु की आयु निर्भर थी । उसी क्षण पर्वतायु की मृत्यु हो गयी [म.व.१३४] । अपने प्रिय पुत्र की मृत्यु पर बालधि ऋषि ने काफी विलाप किया । 
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