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ईश्वर उवाच मातर्जगद्रचन- ...

धाराह्यनुग्रहाष्टकम् - ईश्वर उवाच मातर्जगद्रचन- ...

देवी देवतांची अष्टके आजारपण किंवा कांही घरगुती त्रास होत असल्यास घरीच देवासमोर म्हणण्याची ईश्वराची स्तुती  होय.
Traditionally,the ashtakam is recited in homes, when some one has health or any domestic problems.

धाराह्यनुग्रहाष्टकम्

ईश्वर उवाच मातर्जगद्रचन- नाटक- सूत्रधार स्त्वद्रूपमाकलयितुं परमार्थतोऽयम् ।
ईशोऽप्यमीश्वरपदं समुपैति तादृक् कोऽन्यः स्तवं किमिव तावकमादधातु ॥ १ ॥
नामानि किन्तु गृणतस्तव लोकतुण्डे नाडम्बरं स्पृशति दण्डधरस्य दण्डः ।
यल्लेशलम्बित- भवाम्बुनिधिर्यतो यत् त्वन्नामसंसृतिरियं ननु नः स्तुतिस्ते ॥ २ ॥
त्वच्चिन्तनादर- समुल्लसदप्रमेया- ऽऽनन्दोदयात् समुदितः स्फुटरामहर्षः ।
मातर्नमामि सुदिनानि सदेत्यमुं त्वा- मभ्यर्थयेऽर्थमिति पूरयताद् दयालो ॥ ३ ॥
इन्द्रेन्दुमौलि- विजि- केशवमौलिरत्न- रोचिश्चयोज्ज्वलित पादसरोजयुग्मे ।
चेतो मतौ मम सदा प्रतिविम्बिता त्वं भूया भवानि विदधातु सदोरुहारे ॥ ४ ॥
लीलोद्धृतक्षितितलस्य वराहमूर्ते- र्वाराहमूर्तिरखिलार्थकरी त्वमेव ।
प्रालेयरश्मिसुकलोल्लसितावतंसा त्वं देवि वामतनुभागहरा रहस्य ॥ ५ ॥
त्वामम्ब तप्तकन कोज्ज्वलकान्तिमन्त- र्ये चिन्तयन्ति युवतीतनुमागलान्ताम् ।
चक्रायुधत्रिनयनाम्बरपोतृवक्त्रां तेषां पदाम्बुजयुगं प्रणमन्ति देवाः ॥ ६ ॥
त्वत्सेवनस्खलित पापचयस्य घास- र्मोक्षोऽपि यत्र न सतां गणनानुफैति ।
देवासुरोरगनृपालनमस्य पाद- स्तत्र श्रियः पटुगिरः कियषेवमस्तु ॥ ७ ॥
किं दुष्करं त्वयि मनोविषयं गतायां किं दुर्लभं त्वयि विधानवदर्चितायाम् ।
किं दुष्करं त्वयि सकृत्स्मृतिमागतायां किं दुर्जयं त्वयि कृतस्तुतिवादपुसाम् ॥ ८ ॥
इति श्री धाराह्यनुग्रहाष्टकं सम्पूर्णम्
Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-07-11T03:50:19.9030000

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बुध VIII.

  • n. गौड देश में रहनेवाला एक ब्राह्मण, जो दुर्व एवं शाकिनी का पुत्र था । यह अत्यंत दुराचारी, दुर्व्यसनी एवं पाशविक वृत्तियों का था । एक बार शराब पी कर वेश्यागमन के हेतु यह एक वेश्या के यहॉं आ कर रातभर वहीं पडा रहा । इसके घर वापस न लौटने पर, इसका पिता ढूंढता हुआ इसके पास पहुँचा, एवं इसकी निर्भत्सना की । उसके इस प्रकार कहने पर, इसने तत्काल अपने पिता को लात से मार कर उसका वध किया । बाद को जब यह घर आया, तब इसको माता ने अपनी बुरी आदतों को छोडने के लिये इसे समझाया । इसने उस बेचारी का भी वध किया । कालांतर में इस हत्यारे ने अपनी पत्नी को भी न छोडा, तथा उसे भी मार कर खतम कर दिया । एक दिन इसने कालभी ऋषि की सूलभा, नामक पत्नी को देखा, तथा तुरंत ही उसका हरण कर उसके साथ बलात्कार किया । इससे क्रुद्ध हो कर ऋषिपत्नी ने शाप दिया, ‘तुम कोढी हो जाओं’। फिर यह कोढी हो कर इधर उधर घूमने लगा । घूमते घूमतें यह शूरसेन राजा के नगर आ पहुँचा, जहॉं वह अपनी संपूर्ण नगरी के साथ विमान में बैठकर स्वर्ग जाने की तैयारी में था । विमान चालके ने लाख प्रयत्न किया, लेकिन वह उड न सका । तब देवदूतों ने कोढी बुध को दूर भगा देने के लिये शूरसेन से प्रार्थना की, क्यों कि, इस हत्यारे की पापछाया के ही कारण विमान पृथ्वी से खिसक न सका । शूरसेन दयालु प्रकृति का धर्मज्ञ शासक था । अतएव उसने बुध को देखा, एवं गजानन नामक चतुरक्षरी मंत्र से इसके कोढ को समाप्त कर, इसे भी स्वानंदापुर ले जाने की व्यवस्था की [गणेश.१.७६] 
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Category : Hindu - Traditions
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