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द्वितीयोऽध्यायः

हरिवंश पर्व - द्वितीयोऽध्यायः

महर्षी व्यासांनी रचलेला हा महाभारताचा पुरवणी ग्रंथ आहे.


द्वितीयोऽध्यायः
वैशम्पायन उवाच
स सृष्टासु प्रजास्वेवमापवो वै प्रजापतिः ।
लेभे वै पुरुषः पत्नीं शतरूपामयोनिजाम् ॥१॥
आपवस्य महिम्ना तु दिवमावृत्य तिष्ठतः ।
धर्मेणैव महाराज शतरूपा व्यजायत ॥२॥
सा तु वर्षायुतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् ।
भर्तारं दीप्ततपसं पुरुषं प्रत्यपद्यत ॥३॥
स वै स्वायम्भुवस्तात पुरुषो मनुरुच्यते ।
तस्यैकसप्ततियुगं मन्वन्तरमिहोच्यते ॥४॥
वैराजात् पुरुषाद् वीरं शतरूपा व्यजायत ।
प्रियव्रतोत्तानपादौ वीरात् काम्या व्यजायत ॥५॥
काम्या नाम महाबाहो कर्दमस्य प्रजापतेः ।
काम्यापुत्रास्तु चत्त्वारः सम्राट्कुक्षिर्विराट् प्रभुः ।
प्रियव्रतं समासाद्य पतिं सा सुषुवे सुतान् ॥६॥
उत्तानपादं जग्राह पुत्रमत्रिः प्रजापतिः ।
उत्तानपादाच्चतुरः सूनृताजनयत् सुतान् ॥७॥
धर्मस्य कन्या सुश्रोणी सूनृता नाम विश्रुता ।
उत्पन्ना वाजिमेधेन ध्रुवस्य जननी शुभा ॥८॥
ध्रुवं व कीर्तिमन्तं च शिवं शान्तमयस्पतिम् ।
उत्तानपादोऽजनवॉय्त् सूनृतायां प्रजापतिः ॥९॥
ध्रुवो वर्षसहस्त्राणि त्रीणि दिव्यानि भारत ।
तपस्तेपे महाराज प्रार्थयन् सुमहद् यशः ॥१०॥
तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतः स्थानमप्रतिमं भुवि ।
अचलं चैव पुरतः सप्तर्षीणां प्रजापतिः ॥११॥
तस्यातिमात्रामृद्धिं च महिमानं निरीक्ष्य च ।
देवासुराणामाचार्यः श्लोकमप्युशना जगौ ॥१२॥
अहोऽस्य तपसो वीर्यमहो श्रुतमहो बलम् ।
यदेनं पुरतः कृत्वा भुवं सप्तर्षयः स्थिताः ॥१३॥
तस्माच्छ्लिष्टिं च भव्यं च ध्रुवाच्छम्भुर्व्यजायत ।
श्लिष्टेराधत्त सुच्छाया पञ्च पुत्रानकल्मषान् ॥१४॥
रिपुं रिपुञ्जयं पुण्यं वृकलं वृकतेजसम् ।
रिपोराधत्त बृहती चाक्षुषं सर्वतेजसम्॥१५॥
अजीजनत् पुष्करिण्यां वीरण्यां चाक्षुषो मनुम् ।
प्रजापतेरात्मजायामरण्यस्य महात्मनः ॥१६॥
मनोरजायन्त दश नड्वलायां महौजसः ।
कन्यायामभवञ्छ्रेष्ठा वैराजस्य प्रजापतेः ॥१७॥
ऊरुः पुरुः शतद्युम्नस्तस्तपस्वी सत्यवान् कविः ।
अग्निष्टुदतिरात्रश्च सुद्युम्नश्चेति ते नव ॥१८॥
अभिमन्युश्च दशमो नड्वलायाः सुताः स्मृताः ।
ऊरोरजनयत् पुत्रान् षडाग्नेयी महाप्रभान् ।
अङ्गं सुमनसं ख्यातिं क्रतुमङ्गिरसं गयम् ॥१९॥
अङ्गात् सुनीथापत्यं वै वेनमेकमजायत ।
अपचारात्तु वेनस्य प्रकोपः सुमहानभूत् ॥२०॥
प्रजार्थमृषयो यस्य ममन्थुर्दक्षिणं करम् ।
वेनस्य पाणौ मथिते बभूव मुनिभिः पृथुः ॥२१॥
तं दृष्ट्वा ऋषयः प्राहुरेष वै मुदिताः प्रजाः ।
करिष्यति महातेजा यशश्च प्राप्स्यते महत् ॥२२॥
स धन्वी कवची खड्गी तेजसा निर्दहन्निव ।
पृथुर्वैन्यस्तदा चेमां ररक्ष क्षत्रपूर्वजः ॥२३॥
राजसूयाभिषिक्तानामाद्यः स वसुधाधिपः ।
तस्माच्चैव समुत्पन्नौ निपुणौ सुतमागधौ ॥२४॥
तेनेयं गौर्महाराज दुग्धा सस्यानि भारत ।
प्रजानां वृत्तिकामेन देवैः सर्षिगणैः सह ॥२५॥
पितृभिर्दानवैश्चैव गन्धर्वैः साप्सरोगणैः ।
सर्पैः पुण्यजनैश्चैव वीरुद्भिः पर्वतैस्तथा ॥२६
तेषु तेषु च पाशेषु दुह्यमाना वसुन्धरा ।
प्रादाद् यथेप्सितं क्षीरं तेन प्राणानधारयन् ॥२७॥
पृथुपुत्रौ तु धर्मज्ञौ जज्ञातेऽन्तर्द्धिपालितौ ।
शिखण्डिनी हविर्धानमन्तर्धानाद व्यजायत॥२८॥
हविर्धानात्षडाग्नेयी धिषणाजनयत्सुतान् ।
प्राचीनबर्हिषं शुक्लं गयं कृष्णं व्रजाजिनौ ॥२९॥
प्राचीनबर्हिर्भगवान् महानासीत्प्रजापतिः ।
हविर्धानान्महाराज येन संवर्द्धिता प्रजाः ॥३०॥
प्राचीनाग्राः कुशास्तस्य पृथिव्यां जनमेजय ।
प्राचीनबर्हिर्भगवान् पृथिवीतलचारिणः ॥३१॥
समुद्रतनयायां तु कृतदारोऽभवत्प्रभुः ।
महतस्तपसः पारे सवर्णायां महीपतिः ॥३२॥
सवर्णाऽऽधत्त सामुद्री दश प्राचीनबर्हिषः ।
सर्वे प्रचेतसो नाम धनुर्वेदस्य पारगाः ॥३३॥
अपृथग्धर्मचरणास्तेऽतप्यन्त महत्तपः ।
दशवर्षसहस्राणि समुद्रसलिलेशयाः ॥३४॥
तपश्चरत्सु पृथिवीं प्रचेतस्सु महीरुहाः ।
अरक्ष्यमाणामावव्रुर्बभूवाथ प्रजाक्षयः ॥३५॥
नाशकन्मारुतो वातुं वृतं खमभवद् द्रुमैः ।
दशवर्षसहस्राणि न शेकुश्चेष्टितुं प्रजाः ॥३६॥
तदुपश्रुत्य तपसा युक्ताः सर्वे प्रचेतसः ।
मुखेभ्यो वायुमग्निं च तेऽसृजञ्जातमन्यवः ॥३७॥
उन्मूलानथ तान्कृत्वा वृक्षान्वायुरशोषयत् ।
तानग्निरदहद्घोरं एवमासीद् द्रुमक्षयः ॥३८॥
द्रुमक्षयमथो बुद्ध्वा किंचिच्छिष्टेषु शाखिषु ।
उपगम्याब्रवीदेतान् राजा सोमः प्रजापतीन् ॥३९॥
कोपं यच्छत राजानः सर्वे प्राचीनबर्हिषः ।
वृक्षशून्या कृता पृथ्वी शाम्येतामग्निमारुतौ ॥४०॥
रत्नभूता च कन्येयं वृक्षाणां वरवर्णिनी ।
भविष्यं जानता तत्त्वं धृता गर्भेण वै मया ॥४१॥
मारिषा नाम कन्येयं वृक्षाणामिति निर्मिता ।
भार्या वोऽस्तु महाभागाः सोमवंशविवर्द्धिनी ॥४२॥
युष्माकं तेजसोऽर्द्धेन मम चार्द्धेन तेजसः ।
अस्यामुत्पत्स्यते पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः ॥४३॥
य इमां दग्धभूयिष्ठां युष्मत्तेजोमयेन वै ।
अग्निनाग्निसमो भूयः प्रजाः संवर्धयिष्यति॥४४॥
ततः सोमस्य वचनाज्जगृहुस्ते प्रचेतसः ।
संहृत्य कोपं वृक्षेभ्यः पत्नीं धर्मेण मारिषाम् ॥४५॥
मारिषायां ततस्ते वै मनसा गर्भमादधुः ।
दशभ्यस्तु प्रचेतोभ्यो मारिषायां प्रजापतिः ।
दक्षो जज्ञे महातेजाः सोमस्यांशेन भारत ॥४६॥
पुत्रानुत्पादयामास सोमवंशविवर्धनान् ।
अचरांश्च चरांश्चैव द्विपदोऽथ चतुष्पदः ।
स दृष्ट्वा मनसा दक्षः पश्चादप्यसृजत् स्त्रियः ॥४७॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
शिष्टाः सोमाय राज्ञेऽथ नक्षत्राख्या ददौ प्रभुः॥४८॥
तासु देवाः खगा नागा गावो दितिजदानवाः ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव जज्ञिरेऽन्याश्च जातयः ॥४९॥
ततः प्रभृति राजेन्द्र प्रजा मैथुनसम्भवाः ।
संकल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते ॥५०॥
जनमेजय उवाच
देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम् ।
सम्भवः कथितः पूर्वं दक्षस्य च महात्मनः ॥५१॥
अङ्गुष्ठाद् ब्रह्मणो जातो दक्षः प्रोक्तस्त्वयानघ ।
वामाङ्गुष्ठात् तथा चैव तस्य पत्नी व्यजायत ॥५२॥
कथं प्राचेतसत्वं स पुनर्लेभे महातपाः ।
एतन्मे संशयं विप्र सम्यगाख्यातुमर्हसि ।
दौहित्रश्चैव सोमस्य कथं श्वशुरतां गतः ॥५३॥
वैशम्पायन उवाच
उत्पत्तिश्च निरोधश्च नित्यौ भूतेषु पार्थिव ।
ऋषयोऽत्र न मुह्यन्ति विद्वांसश्चैव ये जनाः ॥५४॥
युगे युगे भवन्त्येते सर्वे दक्षादयो नृप ।
पुनश्चैव निरुध्यन्ते विद्वांस्तत्र न मुह्यति ॥५५ ।
ज्यैष्ठ्यं कानिष्ठ्यमप्येषां पूर्वे नासीज्जनाधिप ।
तप एव गरीयोऽभूत्प्रभावश्चैव कारणम् ॥५६॥
इमां विसृष्टिं दक्षस्य यो विद्यात्सचराचराम् ।
प्रजावानापदुत्तीर्णः स्वर्गलोके महीयते ॥५७॥
इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि प्रजासर्गे दक्षोत्पत्तिकथने द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2018-07-10T13:01:50.1430000

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चंन्द्रहास

  • n. केरलाधिपति सुधार्मिक राजा का पुत्र । इसका जन्म मूल नक्षत्र पर हुआ था । इसके अतिरिक्त, दारिद्य्रदर्शक छठवीं अंगुलि इसके बायें पैर को थी । इस अशुभ चिन्ह के कारण, इसका जन्म होते ही, शत्रुओं ने इसके पिता का वध किया । इसकी माता ने सहगमन किया । इस प्रकार यह अनाथ हो गया । एक दाई ने इसको सम्हाला । वह इसे कौंतलकापुरी ले गई । वहॉं तीन वर्षो तक मजदूरी कर के उसने इसका भरण पोषण किया । कुछ दिनों के बाद वह मृत हुई । भिक्षान्न सेवन कर के इसने दिन बताये । बाद में कुछ स्त्रियों ने इसका पालन किया । यह पॉंच साल का हुआ, तब अन्य लडकों में खेलने लगा । इसे बहुत स्त्रियों ने नहला धुला कर खाना खिलाया । एक दिन सहजवश यह धृष्टबुद्धि प्रधान के घर गया । वहॉं ब्राह्मणभोजन चालू था । वहॉं निमंत्रित योगीश्वर तथा मुनियों को चन्द्रहास को देख कर, अत्यंत विस्मय हुआ । उन्होने इसे आशीर्वाद दिया कि, यह राजा बनेगा । उसी प्रकार उन्होने धृष्टबुद्धि से कहा, ‘तुम्हारी संपत्ति की रक्षा भी यही करेगा । ’ इससे क्रुद्ध हो कर तथा मन में शंका आ कर, उसने इस बालक को जल्लादों के हाथों में सौंप दिया । फिर भी यह पूरे समय हास्यवदन ही था । मार्ग में मिला हुआ शालिग्राम, इसने बडी भक्ति से अपने मुख में रखा था । जल्लादों ने तीक्ष्ण शस्त्र उठाये । इसने उनकी स्तुति की । इससे जल्लादों के मन में इसके प्रति पूज्य बुद्धि उत्पन्न हुई । उन्होंने इसका वध न कर के, केवल छठंवी अंगुलि काट ली । वही अंगुलि धृष्टबुद्धि प्रधान को दे कर इनाम प्राप्त किया । जल्लादों द्वारा वन में छोडे जाने के बाद, यह अरण्य में इधर घूमने लगा । इस समय कुलिंद देश का राजा, मृगया के हेतु से इसी अरण्य में आया था । इस बालक को देख कर, राजा का मन द्रवित हुआ । उसने इसकी पूछताछ की । पश्चात् चंदनावती नगरी में इसे अपने साथ ले जार कर, उसे रानी मेधावती को सौंप दिया । राजा ने इसका नाम चन्द्रहास रखा । सब विद्याएँ भी इसे सिखायी । चन्द्रहास के कारण कुलिंद में सर्वत्र आनंद फल गया । शिक्षाप्राति के समय, चन्द्रहास केवल ‘हरि’ शब्द का ही उच्चारण करता था । इससे कुपित हो कर गुरु ने इसकी शिकायत राजा, के पास की । परंतु, राजा ने कहा, ‘इसकी इच्छा के अनुसर इसे व्यवहार करने दो ।’ आठ वर्ष की आयु में इसका वतबंध हुआ । तदनंतर इसने वेदाध्ययन किया । बाद में यह धनुर्विद्या में भी प्रवीण हो गया । पंद्रह वर्ष की आयु होते ही इसने दिग्विजय करने की इच्छा दर्शाई । परंतु कुलिंद ने कहा, ‘अपनेसे बलवान राजाओं को भला तुम किस प्रकार जीत सकोगे? जान की इच्छा हो, तो जाओ । कौंतल राजा के दुश्मन मुझे हमेशा त्रस्त करते है । क्योकि मैं उसका अंकित हूँ’। यह सुन कर चन्द्रहास दिग्विजय करने गया । इसने सब राजाओं को जीत लिया । इस प्रकार विजयी हो कर तथा अपरंपार संपत्ति ले कर यह चंदनावती लौटा । यह सुन कर कुलिंद इसका स्वागत करने आया । बाद में कुलिंद के कथनानुसार, चन्द्रहास ने अपने सेवकों द्वारा कौंतल राजा को करभार भेजा । सेवकों ने उसे बताया, ‘कुलिंद राजा सुखी है । उसके पुत्र चन्द्रहास ने दिग्विजय कर के यह संपत्ति भेजी है’। इससे विस्मयाभिभूत हो कर कौंतल चन्द्रहास को देखने चंदनावती आया । कुलिंद से मिल कर उसने कहा, ‘पुत्रजन्म का वृत्त तुमने हमें क्यों नहीं सूचित किया’। चंद्रहास का सारा जन्मवृत्तांत कुलिंद ने उसे बताया । इससे कौंतल ने चन्द्रहास को पहचान लिया, तथा मन ही मन कुछ शंकित हुआ । पुनः चन्द्रहास का वध करने के विचार उसके मन में आये । इस संबंध में एक पत्र अपने पुत्र मदन को लिख कर, वह ले जाने के लिये चन्द्रहास से कहा । चन्द्रहास कुंतल नगरी के लिये रवाना हुआ । राह में एक रम्य स्थान पर यह सोया था । उस स्थान पर राजकन्या चंपकमालिनी अपनी सखियों के साथ आई । उसके साथ धृष्टबुद्धि प्रधान की कन्या विषया भी थी । उसने चन्द्रहास को सरोवर के किनारे निद्रामग्न अवस्था में देखा । अपने पैरों से नूपुर निकाल कर धीरे-धीरे वह उसके पास गई । वहॉं उसने एक पत्र देखा । उसने वह पत्र पढा । उस पत्र में चन्द्रहास के लिये विषप्रयोग की सूचना थी । इससे उसका प्रेमी हृदय भग्न हो गया । उसने पत्र के ‘विषमस्मै’ शब्द के बदले आम के गोंद से ‘विषयास्मै’ लिखा । पश्चात् पत्र बंद कर वहीं रख दिया । इस प्रकर धृष्टबुद्धि से इसकी रक्षा हुई । बाद में यह पत्र ले कर चन्द्रहास, मदन के पास गया । यह पत्र पढ कर मदन को अत्यंत आनंद हुआ । इधर विषया ने भी देवी की, ‘यही पति मुझे प्राप्त हो’ इस इच्छा से उत्कट आराधना की । तदनंतर योग्य मुहूर्त पर मदन से चन्दहास तथा विषया को विवाहबद्ध कर दिया । इसी समय, धृष्टबुद्धि ने चंदनावती में कुलिंद को बद्ध कर के, प्रजा पर अनन्वित अत्याचार किये । इस प्रकार अत्याचार से प्राप्त धन ले कर वह कुंतलपुर आया । वहॉं वाद्यों का वादन हो रहा था । मदन ने चन्दहास को विषया दी, यह उसे मालूम हुआ । वह अत्यंत संतप्त हुआ तथा मदन क्रोधित हुआ । परंतु बाद में मदन ने उसे समझाया । फिर भी चन्द्रहासवध की कल्पना उसके मन से नहीं हटी । देवी के दर्शन के लिये जाने की आज्ञा, धृष्टबुद्धि ने चन्द्रहास को दी । वहॉं उसने इसके वध के लिये दो अंत्यज रखे । परंतु इस समय भी धृष्टबुद्धि के दुर्दैव से चन्द्रहास के बदले मदन का वध हुआ । इसके पूर्व ही कौंतल ने अपनी कन्या चंपकमालिनी तथा सब राज्य चन्द्रहास को दिया । पश्चात् वह स्वयं अरण्य में चला गया । चन्द्रहास राजा बन गया, ऐसा सुन कर धृष्टबुद्धि क्रोध से पागल सा हो गया । चंडिकादर्शन के लिये न जा कर, चन्द्रहास ने कुलप्रथा तोड दी, यह सुन कर भी इसे अत्यंत क्रोध आया । वह तुरंत चंडिकामंदिर में गया । वहॉं मदन मृत पडा हुआ था । इस समय कृतवर्म का उसे अत्यंत पश्चात्ताप हुआ । उसका अमन कहने लगा, ‘विष्णवों से द्रोह करने का यह दुष्परिणाम है’। अंत में पुत्रशोक अनावर हो कर स्तंभ पर सिर पटक कर उसने प्राण दिये । यह वृत्त सुन कर चन्द्रहास को अत्यंत दुःख हुआ । अपने मांस का होम कर के इसने देवी को प्रसन्न किया । देवी ने इसे दो वरदान दिये । इन वरों से मदन तथा धृष्टबुद्धि जीवित हो गये । कुलिंद राजा कौंतल के अत्याचारों से त्रस्त हो कर पत्नी समेत अग्निप्रवेश कर रहा था । इतने में धृष्टबुद्धि ने चन्द्रहास का वृत्त उसे कथन किया । बाद में चन्दहास अपने पिता के आज्ञानुसार राज्य करने लगा । युधिष्ठिर के अश्वमेध यज्ञ मे समय, इसने उसकी अश्वमेधीय अश्व पकड लिया था । परंतु श्रीकृष्ण की आज्ञानुसार अर्जुन ने इसके साथ संधि कर ली । इस कारण, चन्द्रहास ने अश्वमेध में काफी सहायता की । चन्द्रहास को विषया मकराक्ष तथा चंपकमालिनी से पद्माक्षनामक दो पुत्र हुए [जै.अ.५०-५९] । चन्द्रहास की राजधानी चंदनावती कौंतलापुर से छः योजन दूर थी [जै.अ.५२] । चंदनावती बडोदा का प्राचीन नाम है । परंतु कुंतलपूर वर्तमान खेडा जिला का सरनाल ग्राम हैं । इसलिये बडोदा को चंदनावती नहीं कह सकते । कनिंगहँम ने लिखा है कि, कुंतलपुर ग्वालियर प्रांत में है । 
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