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मी किती करूं मनधरणी माझे ...

लावणी ७३ वी - मी किती करूं मनधरणी माझे ...

लावणी म्हणजे गीत, नृत्य आणि अदाकारी यांचा त्रिवेणी संगम. लावणी शृंगाराची खाण आणि महाराष्ट्राची शान आहे.


लावणी ७३ वी
मी किती करूं मनधरणी माझे धणी ? ।
चालवा लळा, दिली या शरीराची हमी ॥धृ०॥
चंदन बटाऊ पहाया जी । उभी राहते ।
लागलां विछेत प्राण प्रियकराच्या हातें ।
अशी लावुन माया जी । सोधुनी पहाते ।
नटदार छबेला पाहुन तरमळते ।
कांही तरी येऊं द्यां माया जी । हजर होते ।
शेजारीं निजा मज कवळुनी एकांतें ।
तुम्ही दगलबाज बेईमान जी । अंत:करणीं ।
वाहिला प्राण म्हणे रत्नाची खाणी ॥१॥
पोषाख करा हिरवा हो आवड माझी ।
पेहरवा मी करिते गुलाब प्याजी ।
अपहस्तें खोवीन मरवा जी । आवड माझी ।
मज घ्या मांडीवर, करा हो इष्कबाजी ।
गुलबदन ज्योत आरवा जी । शरीर पाहा जी ।
आतां गेंद हाताळा चित्तापुन मी राजी ।
घातला इष्क फासा जी । मी हरणी ॥२॥
खुरबान करिन हा प्राण सख्यापाशीं ।
कधीं येतिल माझे गुणराशी ? ।
म्हणे होनाजी बाळा विलासी ।
आले साजण तुझिया मंदिरासी ।
आतां भोगित जा सुखें तयासी ।
काशिराम म्हणे करित जा सेवा ।
नयनीं दावा । कधीं पाहिन मी प्राणविसावा ? ॥३॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T12:54:24.0930000

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प्रवाहण (जैवलि)

  • n. पांचाल देश का एक राज, जो दार्शनिक शास्त्रार्थो में प्रवीण था [बृ.उ.६.१.७, माध्यं, छां.उ.१.८.१,५.३.१] । यह उद्दालक राजा का समकालीन था । सम्भवतः जैमिनीय उपनिषद्‍ ब्राह्मण में निर्दिष्ट ‘जैवलि’ इसीका नामांतर है । जीवल का वंशज होने के कारण, इसे ‘जैवलि’ अथवा ‘जैवल’ उपाधि प्राप्त हुयी होगी । यह परम विद्वान एवं ज्ञानी होने के साथ, तत्त्वज्ञान का महापंडित भी था । एक बार इसने अपने पांचाल राज्य में तत्त्वज्ञान परिषद का आयोजन किया । वहॉं तत्वचर्चा में इसे पराजित करने के उद्देश्य से, श्वेतकेतु आरुणेय उस परिषद में आया । किन्तु राजा के द्वारा पूँछे गये पॉंच प्रश्नों में से एक का भी उत्तर वह न दे सका । पराजित होकर वह अपने घर गया, तथा ज्ञानशिक्षा देनेवाले अपने पिता पर अत्यधिक क्रुद्ध होकर, ब्राह्मण द्वारा पूँछे गये प्रश्नों के उत्तर पूँछने लगा । श्वेतकेतु का पिता उद्दालक आरुणि भी उन प्रश्नों का उत्तर न दे सका । फिर वे दोनों प्रवाहण राजा की शरण में आकर, इससे ‘ब्रह्मविद्या’ की दीक्षा मॉंगने लगे । इसने स्वयं क्षत्रिय हो कर भी उन ब्राह्मणों को दीक्षित किया । अब तक यह ज्ञान क्षत्रियों के ही पास था । यह पहली व्यक्ति है, जिसने यह परमज्ञान ब्राह्मणों को प्रदान किया । उद्‌गीथ की उपासना के सम्बन्ध में इसका ‘शिलक शालावत्य’ एवं ‘चैकितायन दाल्भ्य’ नामक ऋषियों से शास्त्रार्त्र हुआ था [छा.उ.१.८.१];[ बृ.उ.६.२.१] 
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