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संसार बाजेगिरी देख । दुरल...

भारूड - संसार बाजेगिरी देख । दुरल...

Bharude is a kind of satirical form of presenting the faults of lay human beings. It was started by Eknath who is revered as a saint.


संसार बाजेगिरी देख । दुरलग आंदेशा आकर देख ।
जो कुच होनारा सो कदा न चुके । वल्ले वस्तादकी पदनामी ।
आखर जमानी । यादी निकसो बुरे हाल होवेगे ।
दुनयामे बडा बडा तमाशा बडे बडे हुन्नेर लगे ।
विद्या अविद्या बोलना एक । वल्ले वर्तणूक अनेक ।
ईस काममें बडे बाजी । जीस अंत न पाया ॥१॥
अरे देख देख देख देख । पीर पैगंबर अवलिया ।
सय्यद सादात बशियाकू झटे । वासना उटे ना हाटे ।
अरे देख देख देख । दौड दौड दौड । जब लग उजाडा तब लग दौड ।
अंधारा पडेगा पिछे कछुरन चले । आपसु आप बाजींदे बुरे सटदेना धंदे ।
हारीदासके प्यारे । रघुनाथके बंदे ।
कह्या न भावे फाड फाड खावे । बांदरामें रान हुवे ॥२॥
तमाशा देख तो अलमसुख होये । दील बांदरा रज्या पाले तो मुखचना बाहेर मैले ।
उठे उठे उठे । बैठे बैठे बैठे । लेटे लेटे लेटे ।
कहुं तो चुपकाची लेटे । दील बांदरा रज्या तलब बाजेगिरी येही खले ।
तो मेरे नामकी पुछेगी बाता । तो मेरे नाम क्या है अजबता ।
अवल मुजे नामचि नथा । दरम्यान पैदा हुवा ।
सलखन सुखाद बैठा । वांहा मुथी उठा नाठा ॥३॥
उसथे बैठा निरखनका मार चलाया । सलेखन उस देखती सलेखन बडे माहाजन ।
राजद्वारीं कहने लगे । सलेखनका तमाशा देख ।
वसले मुजेले नीलखनका तमाशा देख । ज्या हा हा हा हा ।
आ बा बा बा बा । आ ल ल ल ल ।
आ त त त त त । वोही है वोही है । जोर है जोर है ।
लढेगा लढेगा । लढेगा तो पडेगा । पडेगा तो चढेगा ।
हुशार भाई हुशार । भीतरती हुशार तो सुखी ।
बाहेरी ती हुशारी तो बहु हुशारी ॥४॥
गुरु बडा क्या चेला बडा । बाप बडा क्या बेटा बडा ।
बुढा बडा क्या जवान बडा । तो जवान बडा ।
कुत्ती ककवा चिटी चिडी । उदभौकू भौमानें ।
गुरु बडा वा चेला बडा । तो चेला पनामें पडा ।
गुरुके बढाईसे चेला बडा । बाप बडा वा बेटा बडा ।
तो बाप का नाम बेटा धरे । बेटेकी चाकरी बाप करे ।
बापके शीरपर बेटा चढे । उस बद्दल बेटा बडेपना घडे ।
जवान बडा या बुढा बडा । बुढा जागे मर ज्याये ।
जवान बहुत तवाना होय । बुढा पडे जवान चढे ।
ईसबद्दल जवान बडे पनामें पडे ॥५॥
नजर कर नजर कर नजर कर । यारो हो नजर कर ।
नजर करेगा सो जीतेगा । न नजर करेगा सो हरेगा ।
हारीया देना जीता लेना । हुशार भाई हुशार ।
हुशार होकर समाल । मैं कैसी चोंदी ल्यावुंगा ।
मैंने भलेकू चोंदी दिया । मैंने बडे बडेकू बेडाल लाया ॥६॥
देख देख देख तमाशा मेरा । मैंनें विभांडीकू चोंदी दिया ।
वो मुर्गीके चोंदने लाया । ऋषीश्रृंशकू चोंदी दिया ।
वो नाचनीका दुमाल लाया । वो पाराशरकूं चोंदी दिया ।
वो दुर्गंधीका ख्याल लाया । एक घडीमें तप गमाया ।
दुर्गंधासो सुगंधा किया । उसके जगामें व्यास नीफजाया ।
तो महादेवकुंबी चोंदी दिया । वो मोहनी का दुमाला लाया ।
ब्रह्माकु चोंदी दिया । वो आपने बेटीका ख्याल लाया ।
मना कर्ता याद न पाया । वो स्वरस्वतीसे हायीयाल हुवा ।
तुमारे विष्णुकुबी चोंदी दिया । वो वृंदाके स्मशानमें लढाया ।
आयारे नारद । उस नारदकुबी चोंदी दिया ।
आंगूल करते पेट बढाया । साठ बेटेका हुकूम जनाया ।
वो तुमारा अस्सल देव । जिसे नामरुप नहीं ।
उस बडे दुवकुबी बतलाया । वो चोंदीमें जगत्र भुलाया ॥७॥
रहे रहे रहे । चीपरीके रहे जा । आपने जगोमें रहे ज्या ।
जगा छोडकर जायगा तो जान जायगी । तो येतां मार मारुं ।
मारत मारते मारलेडा पडेगा । डांगा उपर पिछ कुटेगा ।
दात निकसकर पसरेगा । डांगा तुमारें पेटमेंकु जावेगा ।
इसबद्दल गुमरपना दूर कर मैंजुदकु याद धर ।
बिशयाकु मुसादलम बीसर । देख देख देख लढूं नको लढूं नको ।
चोंदीके जगा लढूं नको । वाहाली आपडूं नको ।
उस जगा लेंड पडेगा तो कालका फांसा पडेगा ।
आ तुजे कैंव चुप छोडेगा । इसबद्दल विसयाकुं लढूं नको ॥८॥
हमारा दाता कुच देता नहीं । इसबद्दल बिसयाकुं लढत हैं ।
व्हां बडे बडे जन राजद्वार बैठे हैं । कुच देना सो आज दिनेका दिन है ।
दिल चहासो देव । कुच मथी नाम बोलें । दीलकी गांठ खोले ।
आख बतक काम आवेगा । उस खैरात पर हात चले ।
चुप बैठ मुंडी हालावे । कुच काम नहीं ।
जासो दिल देवेगे तो निज मौजक पावेगे ॥९॥
सुख शांति सुख छायेगा । भीस्तीकेती मेवे खावेगा ।
बड्या बड्याली बालै बढाई । ऐसा कुच काम नहीं ।
ऐसा कुच देवोना । चिप बैठे मुंढी हालावे ।
कुच काम नहीं । ऐसा कुच देवो ना जो खात पीत भरे ।
भरीयासो कबहु ना सरे । पोंगड्या टींगड्याकु खाना पुरे ।
सब लिया जमकु बस कर । ऐसा कुच देवोना ।
एक्या देवेगे बिच्यारे । यितला दिया भीक मागनेकु गया ।
उसकी दौलत कही हाकाले लंडानें लिया । ईगानी पर दुगानी ।
दुगानी पर तिगानी । जिसके तिसके घर दुगानी ।
परती रुका । ए क्या देवेगे बिच्यारे ।
तो मेरा दाता कैसा है । हा सा रातसा देखना ।
तो हमारा कुच नहीं । भोजराजा देशका नहीं ।
इंद्र देशका नहीं बुरेर देशका । इतना देवे तो पेट भरा भर लेव ।
ए क्या देवेगे बिचारे ॥१०॥
तो मेरा दाता कैसा है । उनके शतकथमें । मेरा जित मेरब चलता ।
उन्हेथीमें राजना बाक । उसकी खेलता ।
उनकी मेरा जीवता । उनकूं मग नावयाबाता ।
काट सक्या । नजर कर नजर कर । यारोहो नजर करों ।
नजर करे गा सो जितेगा । न नजर करेगा सो हारेगा ।
हारीया देना जीता लेना । अद्दल एक एक के दो ।
दोके तीन । तीनके पांच । पांचके पच्चीस ।
गाफल कहते दस बारा पंधरा बीस ।
वल्ले सही जान पांचके पंचीस । डालीका साप किया ।
भलेभलेकु बडेबडेकु । उन्ने लायी माया ।
बीन लढेगा उन्ने जगत्र भुलाया ॥११॥
गाफल कहते मेरी माया । गुरु बोध ऐसा पाया ।
ऐसी हमारी शांति गाये । वो क्रोध बागकूं खाये ।
अहंकार साप लढेना चढे । मुवा जैसा चीपका चीप पडे ।
पर परका खबुतर । खबुतरकाबी घर ।
ये बाता सबही दूर कर । पंखबिना हौस किया ।
उडे चढे बिन सत्य लोककू गया । सनकादिककी काढी माया ।
मुख्य मूळ ब्रह्म हुषार किया । उन्ने हौसनें बडा तमाशा किया ।
ब्रह्मसनती मूंड मुंडाया । आपबी व्हा छपी खाया ।
हुषार देखे तो नजीक छुपाया । एक एकमो अनेक ।
अनेकमो एक । येही देखनामें हुशारीमें देख ।
वांहा नहीं देखना दुःख । येही खेल खेळे तैं समाधि सुख ।
एका जनार्दनीं जग समस्त । इसके बाजीमें भिस्त दस्त ।
देखो फेरिस्तो अजब बात । पैंगबर कहे सदर आमत ।
येही तमाशा सिद्ध । देखे सो जुदा नहीं देख ।
एका जनार्दनीं । बैसक बाजेगिरी । ऐन लहक ॥१२॥

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Last Updated : November 10, 2013

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