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भारती स्तुतिः

स्तुतिः - भारती स्तुतिः

देवी देवतांची स्तुति केल्यास, ते प्रसन्न होऊन इच्छित फल प्राप्त होते.


भारती स्तुतिः

श्रीगणेशाय नमः ॥

विहाय वाचं मुनिवर्यजुष्टां दैवी बुधां ब्रह्म विबोधयित्रीम् ॥

भुवोऽखिलं वाङ्‌मयमप्यधीत्य किं भारतं भारतमद्य भूयात् ॥१॥

तमोवृतेऽन्तःकरणे नराणां मोहाद्यलं भीषणतस्कराणाम् ॥

दिव्यप्रकाशेन निरोध्य वृत्ति त्रायेत सर्वस्वविनाशतो या ॥२॥

नवं नवं याऽर्पयतेऽभिधानमनन्तयाऽन्तर्हितया स्वशक्त्या ॥

उपेक्ष्य तां शश्वदभीष्टदोहां किं भारतं भारतमद्य भूयात् ॥३॥

यस्यास्तु विज्ञानबलोपपन्नैः शब्दैरभिव्यक्ततरीक्रियन्ते ॥

साधु स्ववाच्यान्तरिता गुणास्तामुपेक्ष्य राजेत न राष्ट्रमेतत् ॥४॥

या श्रौतसिद्धान्तसुवादसिक्तमार्यत्वबीजं वहते चिराय ॥

आलम्बनी भारतसंस्कृतेस्तामुपेक्ष्य नो भारतमद्य भूयात् ॥५॥

वन्द्यामभीक्ष्णं सुमहत्तमानां भुवोऽखिलाया विदुषामपेक्ष्याम् ॥

षट्‌त्रिंशतां कोटिभिरर्हिताया जनैर्जनित्रीमथ हिन्दुजातेः ॥६॥

सुसंस्कृतान्तःकरणप्रदात्रीमनर्थसार्थोपशमं विधात्रीम् ॥

संबृहणैः श्रौतवचःप्रवाहैरुपेक्ष्य तां भारतमार्तिमीयात् ॥७॥

ह्म्सस्य हंसत्वमथो पिकत्वं पिकत्वं सिंहस्य च सिंहभावः ॥

व्यज्येत तत्तद्वचसैव नूनं तथार्थताऽऽर्यस्य गिरैव दैव्या ॥८॥

समूलमुन्मूल्य जगद्धिताय या या म्लेच्छता सन्ततमार्यभावम् ॥

लोकेष्वलं वर्धयते समन्तात्तामेव लब्ध्वा सुकृती जनः स्यात् ॥९॥

यां मूलतो वंशपरम्पराभिः प्राप्तामनेकैश्च समासहस्त्रैः ॥

अद्यापि सर्वत्र समप्रचारामार्याः प्रमोदेन मिथः प्रयुज्य ॥१०॥

विभिन्नदिक्कालकृतं प्रभेदं प्रान्ताद्युपाधिप्रथितञ्च भेदम् ॥

विस्मृत्य सद्योऽनुभवन्ति सर्वे समन्ततः सोदरबन्धुभावम् ॥११॥

तानैक्यसन्देशविधानदक्षामच्छां गिरं कष्टमधो विधाय ॥

अभेदभावाभिनिवेशजुष्ट विपद्यते राष्ट्रमिदं समन्तात् ॥१२॥

इति श्रीगौरीशंकरशास्त्रिकृता भारतीस्मृतिः सम्पूर्णा ।

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2008-02-27T21:26:42.5000000

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तिमिध्वज

  • n. वैजयन्त नगरी का राजा । यह शंबर नाम से भी प्रसिद्ध था । इसका राज्य दक्षिण भारत में दंडकारण्य के पास था । डॉ. भांडारकरजी के मत में, आधुनिक कालीन विजयदुर्ग ही प्राचीन वैजयन्त नगरी है । डे के मत में, आधुनिक वनवासी शहर का वह प्राचीन नाम है । देवासुर युद्ध चालू था । यह असुरों के पक्ष में मिल कर, इंद्र से युद्ध करने लगा । इन्द्र ने अयोध्या से दशरथ राजा को बुलाया । परंतु युद्ध करते समय, घायल हो कर दशरथ बेहोश हो गया । तब सारथ्य करनेवाली कैकयी ने बडे चातुर्य से रथ बाजू में ले कर दशरथ की रक्षा की । बाद में तिमिध्वज का क्या हुआ इसके बारे में कुछ उल्लेख नहीं है [वा.रा.अयो.९];[ ब्रह्म.१२३] 
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