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अध्याय ५ - अष्टोत्तरीदशाक्रमः

मानसागरी - अध्याय ५ - अष्टोत्तरीदशाक्रमः

सृष्टीचमत्काराची कारणे समजून घेण्याची जिज्ञासा तृप्त करण्यासाठी प्राचीन भारतातील बुद्धिमान ऋषीमुनी, महर्षींनी नानाविध शास्त्रे जगाला उपलब्ध करून दिली आहेत, त्यापैकीच एक ज्योतिषशास्त्र होय.

The horoscope is a stylized map of the planets including sun and moon over a specific location at a particular moment in time, in the sky.


अष्टोत्तरीदशाक्रमः

चत्वारि भानि पापेषु शुभेषु त्रीणि योजयेत् । रौद्रादिमृगपर्यन्तं लिखेदभिजिता सह ॥१॥

षडादित्ये च वर्षाणि चन्द्रे पञ्चदशैव च । मङ्गले चाष्टवर्षानि बुधे सप्तदशैव च ॥२॥

शनौ च दशवर्षाणि गुरावेकोनविंशतिः । राहौ द्वादशवर्षाणि शुक्रस्याप्येकविंशतिः ॥३॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2009-04-03T04:33:24.7470000

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सुवर्चला

  • n. देवल ऋषि की ब्रह्मचारी कन्या । अपने, पिता के द्वारा अयोजित किये गये स्वयंवर में, इसने श्र्वेतकेतु औद्दालकि का वरण किया । इस स्वयंवर के समय इसका श्र्वेतकेतु के साथ किया तत्त्वज्ञान पर संवाद, महाभारत में ‘श्र्वेतकेतु सुवर्चला संवाद’ नाम से प्राप्त है [म. शां. ३०४, २२८.२२९] । यह संवाद महाभारत के केवल कुंभकोणम् संस्करण में भी प्राप्त है; भांडारकर संहिता में वह परिशिष्ट में दिया गया है । 
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