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अध्याय १७

बृहत्संहिताः - अध्याय १७

’बृहत्संहिता’ ग्रंथात वास्तुविद्या, भवन निर्माण कला, वायुमंडळाची रचना, वृक्ष आयुर्वेद इ. विषय अंतर्भूत आहेत.


ग्रहयुद्धाध्यायः

युद्धं यथा यदा वा भविष्यं ( भविष्यद्) आदिश्यते त्रिकालज्ञैः ॥ तद्विज्ञानं करणे मया कृतं सूर्यसिद्धान्ते ( सिद्धान्तात्) ॥१॥

वियति चरतां ग्रहाणामुपर्युपर्यात्ममार्गसंस्थानाम् ॥ अतिदूराद् दृग्विषये समतामिव संप्रयातानाम् ॥२॥

आसन्नक्रमयोगाद् भेदौल्लेखांशुमर्दनासव्यैः ( सव्यः) ॥ युद्धं चतुष्प्रकारं पराशराद्यैः मुनिभिरुक्तम् ॥३॥

भेदे वृष्टिविनाशो भेदः सुहृदां महाकुलानां च ॥ उल्लेखे शस्त्रभयं मन्त्रिविरोधः प्रियान्नत्वम् ॥४॥

अंशुविरोधे युद्धानि भूभृतां शस्त्ररुक्क्षुदवमर्दाः ॥ युद्धे चाप्यपसव्ये भवन्ति युद्धानि भूपानाम् ॥५॥

रविः आक्रन्दो मध्ये पौरः पूर्वेऽपरे स्थितो यायी ॥ पौरा बुधगुरुरविजा नित्यं शीतांशुः आक्रन्दः ( आक्रन्द्रः) ॥६॥

केतुकुजराहुशुक्रा यायिन एते हता घ्नन्ति ( ग्रहा हन्युः) ॥ आक्रन्दयायिपौरान् जयिनो जयदाः ( जयदा) स्ववर्गस्य ॥७॥

पौरे पौरेण हते पौराः पौरान् नृपान् विनिघ्नन्ति ॥ एवं याय्याक्रन्दा ( याय्याक्रन्दौ) नागरयायिग्रहाश्चैव ॥८॥

दक्षिणदिक्स्थः परुषो वेपथुः अप्राप्य सन्निवृत्तोऽणुः ॥ अधिरूढो विकृतो निष्प्रभो विवर्णश्च यः स जितः ॥९॥

उक्तविपरीतलक्षणसंपन्नो जयगतो विनिर्देश्यः ( विनिर्दिष्टः) विपुलः ॥ स्निग्धो द्युतिमान् दक्षिणदिक्स्थोऽपि जययुक्तः ॥१०॥

द्वावपि मयूखयुक्तौ विपुलौ स्निग्धौ समागमे भवतः ॥ तत्र अन्योन्यं प्रीतिः ( अन्योन्यप्रीतिः) विपरीतावात्मपक्षघ्नौ ॥११॥

युद्धं समागमो वा यद्यव्यक्तौ स्वलक्षणैः ( तु लक्षणैः) भवतः ॥ भुवि भूभृतामपि तथा फलमव्यक्तं विनिर्देश्यम् ॥१२॥

गुरुणा जितेऽवनिसुते बाह्लीका यायिनोऽग्निवार्ताश्च ( अग्निवार्त्ताश्च) ॥ शशिजेन शूरसेनाः कलिंगशाल्वाः ( साल्वाः) च पीड्यन्ते ॥१३॥

सौरेणारे विजिते जयन्ति पौराः प्रजाश्च सीदन्ति ॥ कोष्ठागार ( कोष्ठागार) म्लेच्छक्षत्रियतापश्च शुक्रजिते ॥१४॥

भौमेन हते शशिजे वृक्षसरित्तापसाश्मकनरेन्द्राः ॥ उत्तरदिक्स्थाः क्रतुदीक्षिताश्च सन्तापमायान्ति ॥१५॥

गुरुणा जिते बुधे ( बुधे जिते) म्लेच्छशूद्रचौरार्थयुक्तपौरजनाः ॥ त्रैगर्तपार्वतीयाः पीड्यन्ते कंपते च मही ॥१६॥

रविजेन बुधे ध्वस्ते नाविकयोधाब्जसधनगर्भिण्यः ॥ भृगुणा जितेऽग्निकोपः सस्यांबुदयायिविध्वंसः ॥१७॥

जीवे शुक्राभिहते कुलूतगान्धारकैकया मद्राः ॥ शाल्वा ( साल्वा) वत्सा वंगा गावः सस्यानि पीड्यन्ते ( नश्यन्ति) ॥१८॥

भौमेन हते जीवे मध्यो देशो नरेश्वरा गावः ॥ सौरेण चार्जुनायनवसातियौधेयशिबिविप्राः ॥१९॥

शशितनयेनापि जिते बृहस्पतौ म्लेच्छसत्यशस्त्रभृतः ॥ उपयान्ति मध्यदेशश्च संक्षयं यग भक्तिफलम् ॥२०॥

शुक्रे बृहस्पतिजिते ( हते) यायी श्रेष्ठो विनाशमुपयाति ॥ ब्रह्मक्षत्रविरोधः सलिलं च न वासवः त्यजति ॥२१॥

कोशलकलिंगवंगा वत्सा मत्स्याश्च मध्यदेशयुताः ॥ महतीं व्रजन्ति पीडां नपुंसकाः शूरसेनाश्च ॥२२॥

कुजविजिते भृगुतनये बलमुख्यवधो नरेन्द्रसंग्रामाः ॥ सौम्येन पार्वतीयाः क्षीरविनाशोऽल्पवृष्टिश्च ॥२३॥

रविजेन सिते विजिते गुणमुख्याः शस्त्रजीविनः क्षत्रम् ॥ जलजाश्च निपीड्यन्ते सामान्यं भक्तिफलमन्यत् ॥२४॥

असिते सितेन निहतेऽर्घवृद्धिः अहिविहगमानिनां पीडा ॥ क्षितिजेन तंगणान्ध्रौड्रकाशिबाह्लीकदेशानाम् ॥२५॥

सौम्येन पराभूते मन्दे अंगवणिग्विहंगपशुनागाः ॥ सन्ताप्यन्ते गुरुणा स्त्रीबहुला महिषकशकाश्च ॥२६॥

अयं विशेषोऽभिहितो हतानां कुजज्ञवागीशसितासितानाम् ॥ फलं तु वाच्यं ग्रहभक्तितो ऽन्यद् यथा तथा घ्नन्ति हताः स्वभक्तीः ॥२७॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2012-01-16T20:51:04.8900000

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उपमन्यु (वासिष्ठ)

  • n. मंत्रदृष्टा [ऋ.९.९७.१३-१५] । वसिष्ठकुलोत्पन्न व्याघ्रपाद का पुत्र । इसका कनिष्ठ बंधु धौम्य । इसका आश्रम हिमालय पर्वत पर था । इसकी माता का नाम अंबा था । उपमन्यु आपोद (आयोद) धौम्य ऋषि का शिष्य । धौम्य ने उपमन्यु के उदर्निर्वाह के साधन भिक्षा, दूध, फेन आदि बंद किया । अंत में प्राण के अत्यंत व्याकुल होने पर इसने अरकवृक्ष के पत्तों का भक्षण किया । जिसके कारण वह अंधा हुआ तथा कुएँ में गिर पडा । गुरुजी शिष्य को ढूंढने के लिये निकले, तथा वन में आकर उपमन्यु को कई बार पुकारा । गुरुजी के शब्द पहचान कर उपमन्यु ने अपना सारा वृत्तांत कहा । तब गुरुजी ने इसे अश्विनीकुमारों की स्तुति करने को कहा । स्तुति करते ही अश्विनीकुमारों ने प्रसन्न हो कर इसे एक अपूप भक्षण करने दिया । परंतु इसने गुरु को प्रथम अर्पण किये बिना उसे भक्षण करना अस्वीकार कर दिया । उपमन्यु को किसी भी प्रकार के मोह के वश न होते देख, वे उस पर बहुत संतुष्ट हुए । अश्विनीकुमारों ने उसे उत्तम दृष्टि दी । गुरु भीं उस पर प्रसन्न हुए [म.आ.३.३२-८४] । बचपन में एक बार उपमन्यु दूसरे मुनि के आश्रम में खेलने गया । वहा इसने गाय का दूध निकालते हुए देखा । बचपन में एक बार इसके पिता एक यज्ञ में उसे ले गये, जहॉं इसे दुग्धप्राशन करने मिला था । इस कारण इसे दूध का गुण तथा उसकी मिठास मालूम थी [म. अनु. .१४. ११७-१२०] । लिंग एवं शिव पुराण में ऐसा दिया है कि, जब वह मामा के घर गय था, तब इसे दुग्धप्राशन करने मिला था [लिंग. १.१०७];[ शिव. वाय. १.३४.३५] । घर आ कर उपमन्यु माता से दूध मांगने लगा । मां ने आटा पानी में घोल कर दिया जिस कारण उसे बहुत खराब लगा । मां ने स्नेहपूर्वक उपमन्यु पर हात फेरते हुए कहा कि, पूर्वजन्म में शंकर की आराधना न करने के कारण, दूध मिलने इतना दैव अपने अनुकूल नहीं है । शंकर कैसा है, उसका ध्यान किस तरह करना चाहिये, इत्यादि जानकारी उसने माता से पूछी । माता को प्रणाम कर वह तपस्या करने चला गया । वहां दुस्तर तपस्या कर शंकर को उसने प्रसन्न किया । प्रथम शंकर ने इंद्र के स्वरुप में आ कर कहा कि, मेरी आराधना करो; परंतु उसे शंकर के अभाव में देहत्याग की तैयारी करते देख शंकर ने प्रगट हो उसे अनेक वर दिये । क्षीरसागर, दिया तथा गणों का अधिपति नियुक्त किया । उसने शंकर पर अनेक स्तोत्र रचे । उसने आठ ईटों का मंदिर बना कर मिट्टी के शिवलिंग की आराधना की, तथा पिशाचों द्वारा लाये गये विघ्नों पर भी उसने तप को भंग नहीं होने दिया [शिव. वाय. १.३४] । यह शैव था । इसने कृष्ण को शिवसहस्त्रनाम बताया [म. अनु. १७] । तथा पुत्रप्राप्ति के लिये तप करने जब कृष्ण आया, तब उसे शैवी दीक्षा दी । हिमवान् पर्वत के आश्रम में अंत में यह अत्यंत जीर्णवस्त्र ओढ कर रहता था । इसने जटा भी धारण की थी । यह कुतयुग में हुआ था [म. अनु. १४-१७];[ शिव. उमा.१] । शंकर के बताये अत्यंत विस्तृत शैवसिद्धांत को इसने ऊरु, दधीच तथा अगस्त्य इनके साथ संक्षेप में कर समाज में प्रसिद्ध किया [शिव. वाय. ३२] 
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