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अध्याय १५

बृहत्संहिताः - अध्याय १५

’बृहत्संहिता’ ग्रंथात वास्तुविद्या, भवन निर्माण कला, वायुमंडळाची रचना, वृक्ष आयुर्वेद इ. विषय अंतर्भूत आहेत.


नक्षत्रव्यूहाध्यायः

आग्नेये सितकुसुमाहिताग्निमन्त्रज्ञसूत्रभाष्यज्ञाः ॥ आकरिकनापितद्विजघटकारपुरोहिताब्दज्ञाः ॥१॥

रोहिण्यां सुव्रतपण्यभूपधनियोगयुक्तशाकटिकाः ॥ गोवृषजलचरकर्षकशिलोच्चयैश्वर्यसंपन्नाः ॥२॥

मृगशिरसि सुरभिवस्त्राब्जकुसुमफलरत्नवनचरविहंगाः ॥ मृगसोमपीथिगान्धर्वकामुका लेखहाराश्च ॥३॥

रौद्रे वधबन्धानृतपरदारस्तेयशाठ्यभेदरताः ॥ तुषधान्यतीक्ष्णमन्त्राभिचारवेतालकर्मज्ञाः ॥४॥

आदित्ये सत्यौदार्यशौचकुलरूपधीयशोऽर्थयुताः ॥ उत्तमधान्यं वणिजः सेवाभिरताः सशिल्पिजनाः ॥५॥

पुष्ये यवगोधूमाः शालीक्षुवनानि मन्त्रिणो भूपाः ॥ सलिलोपजीविनः साधवश्च यज्ञेष्टिसक्ताश्च ॥६॥

अहिदेवे कृत्रिमकन्दमूलफलकीटपन्नगविषाणि ॥ परधनहरणाभिरताः तुषधान्यं सर्वभिषजश्च ॥७॥

पित्र्ये धनधान्याढ्याः कोष्ठागाराणि पर्वताश्रयिणः ॥ पितृभक्तवणिक्षूराः क्रव्यादाः स्त्रीद्विषो मनुजाः ॥८॥

प्राक्फल्गुनीषु नटयुवतिसुभगगान्धर्वशिल्पिपण्यानि ॥ कर्पासलवणमक्षिक ( माक्षिक) तैलानि कुमारकाश्चापि ॥९॥

आर्यम्णे मार्दवशौचविनयपाखण्डि ( पाषण्डि) दानशास्त्ररताः ॥ शोभनधान्यमहाधनकर्मानुरताः समनुजेन्द्राः ॥१०॥

हस्ते तस्करकुञ्जररथिकमहामात्रशिल्पिपण्यानि ॥ तुषधान्यं श्रुतयुक्ता वणिजः तेजोयुताश्चात्र ॥११॥

त्वाष्ट्रे भूषणमणिरागलेख्यगान्धर्वगन्धयुक्तिज्ञाः ॥ गणितपटुतन्तुवायाः शालाक्या राजधान्यानि ॥१२॥

स्वातौ खगमृगतुरगा वणिजो धान्यानि वातबहुलानि ॥ अस्थिरसौहृदलघुसत्त्वतापसाः पण्यकुशलाश्च ॥१३॥

इन्द्राग्निदैवते रक्तपुष्पफलशाखिनः सतिलमुद्गाः ॥ कर्पासमाषचणकाः पुरन्दरहुताशभक्ताश्च ॥१४॥

मैत्रे शौर्यसमेता गणनायकसाधुगोष्ठियानरताः ॥ ये साधवश्च लोके सर्वं च शरत्समुत्पन्नम् ॥१५॥

पौरन्दरेऽतिशूराः कुलवित्तयशोऽन्विताः परस्वहृतः ॥ विजिगीषवो नरेन्द्राः सेनानां चापि नेतारः ॥१६॥

मूले भेषजभिषजो गणमुख्याः कुसुममूलफलवार्ताः ( वार्त्ताः) ॥ बीजानि अतिधनयुक्ताः फलमूलैः ये च वर्तन्ते ॥१७॥

आप्ये मृदवो जलमार्गगामिनः सत्यशौचधनयुक्ताः ॥ सेतुकरवारिजीवकफलकुसुमानि अंबुजातानि ॥१८॥

विश्वेश्वरे महामात्रमल्लकरितुरगदेवतासक्ताः ( भक्ताः) ॥ स्थावरयोधा भोगान्विताश्च ये तेजसा ( चौजसा) युक्ताः ॥१९॥

श्रवणे मायापटवो नित्योद्युक्ताश्च कर्मसु समर्थाः ॥ उत्साहिनः सधर्मा भागवताः सत्यवचनाश्च ॥२०॥

वसुभे मानोन्मुक्ताः क्लीबा ( क्लीबाः) चलसौहृदाः स्त्रियां द्वेष्याः ( द्वष्याः, द्वेष्याः) ॥ दानाभिरता बहुवित्तसंयुताः शमपराश्च नराः ॥२१॥

वरुणेशे पाशिकमत्स्यबन्धजलजानि जलचराजीवाः ॥ सौकरिकरजकशौण्डिकशाकुनिकाश्चापि वर्गेऽस्मिन् ॥२२॥

आजे तस्करपशुपालहिंस्रकीनाशनीचशठचेष्टाः ॥ धर्मव्रतैः विरहिता नियुद्धकुशलाश्च ये मनुजाः ॥२३॥

आहिर्बुध्न्ये ( आहिर्बुध्न्यु) विप्राः क्रतुदानतपोयुता महाविभवाः ॥ आश्रमिणः पाखण्डा ( पाषण्डा) नरेश्वराः सारधान्यं च ॥२४॥

पौष्णे सलिलजफलकुसुमलवणमणिशंखमौक्तिकाब्जानि ॥ सुरभिकुसुमानि गन्धा वणिजो नौकर्णधाराश्च ॥२५॥

अश्विन्यामश्वहराः सेनापतिवैद्यसेवकाः तुरगाः ॥ तुरगारोहा वणिजो ( तुरगारोहाश्च वनिग्) रूपोपेताः तुरगरक्षाः ॥२६॥

याम्येऽसृक्पिशितभुजः क्रूरा वधबन्धताडनासक्ताः ॥ तुषधान्यं नीचकुलोद्भवा विहीनाश्च सत्त्वेन ॥२७॥

पूर्वात्रयं सानलमग्रजानां राज्ञां तु पुष्येण सहोत्तराणि ॥ सपौष्णमैत्रं पितृदैवतं च प्रजापतेः भं च कृषीवलानाम् ॥२८॥

आदित्यहस्ताभिजिदाश्विनानि वणिग्जनानां प्रवदन्ति तानि ( भानि) ॥ मूलत्रिनेत्रानिलवारुणानि भानि उग्रजातेः प्रभविष्णुतायाः ( तायां) ॥२९॥

सौम्येन्द्रचित्रावसुदैवतानि सेवाजनस्वाम्यमुपागतानि ॥ सार्पं विशाखा श्रवणो भरण्यश्चण्डालजातेः अभिनिर्दिशन्ति ( इति निर्दशन्ति) ॥३०॥

रविरविसुतभोगमागतं क्षितिसुतभेदनवक्रदूषितम् ॥ ग्रहणगतमथौल्कया हतं नियतमुषाकरपीडितं च यत् ॥३१॥

तदुपहतमिति प्रचक्षते प्रकृतिविपर्यययातमेव वा ॥ निगदितपरिवर्गदूषणं कथितविपर्ययगं समुऋद्धये ॥३२॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2012-01-16T20:51:03.8270000

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इक्ष्वाकु

  • n. (सू.) वैवस्वत मनु के दस पुत्रों में से ज्येष्ठ [म.आ.७०.१३];[ भवि. ब्राह्म. ७९] । इसकी उत्पत्ति के संबंध में जानकारी इस प्रकार मिलती हैं । एक बार मनु को छींक आयी । उस छींक के साथ ही यह लडका सम्मुख खडा हुआ । इस पर से इसका नाम इक्ष्वाकु पडा [ह. वं.१.११.दे. भा. ७.८];[ भा. ९.६];[ ब्रह्म. ७.४४];[ विष्णु.४.२.३] । मनु के कहा कि, तुम एक राजवंश के उत्पादक बनो, दंड की सहायता से राज्य करो, तथा व्यर्थ ही किसी को दंड मत दो । अपराधियों को दंड देने से स्वर्गप्राप्ति होती है । इस तरह का उपदेश दे कर, जो कार्य करना होगा उसकी रुपरेखा मनु ने इसे बतायी । मनु ने पृथ्वी के दस भाग बनाये । वसिष्ठ की आज्ञानुसार वे सुद्युम्न को न दे कर, इक्ष्वाकु को दिये [वायु.८५.२०] । मनु ने मित्र तथा वरुण देवताओं के लिये याग किया । इस कारण इक्ष्वाकु तथा अन्य पुत्र प्राप्त हुए, ऐसी कथा है [विष्णु.४.१] । वसिष्ठ इक्ष्वाकु राजा का कुलगुरु था [म.आ.६६.९-१०];[ ब्रह्मांड. ३.४८.२९];[ पद्म. सृ. ८.२१,४४.२३७.];[ विष्णु. ४.३.१८];[ वा.रा.उ.५७] । सूर्यवंश में प्रत्येक राजा के समय, वसिष्ठ के कुलगुरु होने का निर्देश है । इक्ष्वाकु, अयोध्या का पहला राजा था [वा.रा.अयो. ११०] । इसे मध्यदेश मिला था [ह. वं. १.१०];[ लिङ्ग १.६५.२८];[ ब्रह्मांड. ३.६०.२०];[ मत्स्य. १२.१५] । यह क्षुप का पुत्र है ऐसा भी कहीं कहीं उल्लेख हैं । क्षुप ने प्रजापालनार्थ इसे एक खड्‌ग दी थी [म. शां. १६०. ७२];[ म. आश्व. ४.३] । वंशावली में प्रत्यक्ष क्षुप का उल्लेख नही है । एक समय इक्ष्वाकु यात्रा करते हिमालय की तलहटी के पास आया । वहॉं जप करनेवाला कौशिक नाम का ब्राह्मण था । उसका यम, ब्राह्मण, काल तथा मृत्यु के साथ, निष्काम जप के संबंध में संवाद हुआ । उस समय इक्ष्वाकु वहीं था [म.शां.१९२] । इक्ष्वाकु कुल में पैदा हुए व्यक्तियों के लिये भी, इक्ष्वाकु कुलनाम दिया गया है । अलंबुषा के पति का नाम तृणबिंदु न हो कर इक्ष्वाकु था, ऐसा निर्देश है [वायु. ८६.१५];[ वा.रा.बा.४७.११] । इक्ष्वाकु के सौ पुत्र थे [ह. वं. १.११];[ दे. भा. ७.९];[ भा. ९, ६];[ म. अनु.५];[ म. आ. ७५] । इसके ज्येष्ठ पुत्र का विकुक्षि था । इक्ष्वाकु के पश्चात यही अयोध्या का राजा हुआ । विकुक्षि से निमिवंश निर्माण हुआ । इक्ष्वाकु को दंडक नामक एक विद्याविहीन पुत्र भी था । इसी के नाम से दंडकारण्य बना [वा.रा.उ.७९];[ भा. ९.६];[ विष्णु. ४.२] । इसके दसवें पुत्र का नाम दशास्व था । वह माहिष्मती का राजा था [म. अनु. २.६] । विष्णु पुराण में इक्ष्वाकु के एक सौ एक पुत्र होने का निर्देश है [विष्णु. ४.२] । इक्ष्वाकु ने अपना राज्य सौ पुत्रों को बॉंट दिया [म. आश्व.४] । इसने शकुनि प्रभृति ५० पुत्रों को उत्तरभारत तथा शांति प्रभृति ४८ पुत्रों को, दक्षिणभारत का राज्य दिया । अयोध्या में इक्ष्वाकु का राज्य तथा वंश बहुत समय तक रहा । ईक्ष्वाकु वंश में बहुत से महान पुरुष हुए, इस कारण बहुत सारे पुराणों में इनकी वंशावलि मिलती है । पुराणों में दी गयी वंशावालियों में, बहुत साम्य होते हुए भी, रामायण में दी गई वंशावलि से वे भिन्न हैं । पुराणों में इक्ष्वाकु से ले कर, भारतीय युद्ध के बृहद्वल तक भागवतानुसार ८८, विष्णुमतानुसार ९३, तथा वायुमतानुसार ९१, पीढियॉं होती है । रामायणानुसार इनमें संख्या की अपेक्षा व्यक्तियों में अधिक भिन्नता है । संशोधकों के मतानुसार वंशावलि की दृष्टि से पुराणों का वर्णन ही अधिक न्यायसंगत होने की संभावना है । यद्यपि अधिक विस्तार से इसकी वंशावलि उपलब्ध है तथापि प्रमुख पुरुषों की है, सब पुरुषों की नही ऐसा वहॉं निर्देश है । (सुमित्र, राम तथा ऐक्ष्वाक देखिये) । इसकी पत्नी सुदेवा [पद्म. भू.४२] 
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