सुखमनी साहिब - अष्टपदी ११

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


( गुरु ग्रंथ साहिब पान क्र. २७६ )

श्लोक

करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ।
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥१॥

पद १ ले

करन करावन करनै जोगु ।
जो तिसु भावै सोई होगु ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ।
अंतु नही किछु पारावारा ॥
हुकमे धारि अधर रहावै ।
हुकमे उपजै हुकमि समावै ॥
हुकमे ऊच नीच बिउहार ।
हुकमे अनिक रंग परकार ॥
करि करि देखै अपनी वडिआई ।
नानक सभ महि रहिआ समाई ॥१॥

पद २ रे

प्रभ भावै मानुख गति पावै ।
प्रभ भावै ता पाथर तरावै ॥
प्रभ भावै बिनु सास ते राखै ।
प्रभ भावै ता हरि गुण भाखै ॥
प्रभ भावै ता पतित उधारै ।
आपि करै आपन बीचारै ॥
दुहा सिरिआ का आपि सुआमी ।
खेलै बिगसै अंतरजामी ॥
जो भावै सो कार करावै ।
नानक द्रिसटी अवरु न आवै ॥२॥

पद ३ रे

कहु मानुख ते किआ होइ आवै ।
जो तिसु भावै सोई करावै ॥
इस कै हाथि ता सभु किछु लेइ ।
जो तिसु भावै सोई करेइ ॥
अनजानत बिखिआ महि रचै ।
जे जानत आपन आप बचै ॥
भरमे भूला दह दिसि धावै ।
निमख माहि चारि कुंट फिरि आवै ॥
करि किरपा जिसु अपनी भगति देइ ।
नानक ते जन नामि मिलेइ ॥३॥

पद ४ थे

खिन महि नीच कीट कउ राज ।
पारब्रहम गरीब नवाज ॥
जा का द्रिसटि कछू न आवै ।
तिसु ततकाल दह दिस प्रगटावै ॥
हा कउ अपुनी करै बखसीस ।
ता का लेखा न गनै जगदीस ॥
जीउ पिंडु सभ तिस की रासि ।
घटि घटि पूरन ब्रहम प्रगास ॥
अपनी बणत आपि बनाई ।
नानक जीवै देखि बडाई ॥४॥

पद ५ वे

इस का बलु नाही इसु हाथ ।
करन करावन सरब को नाथ ॥
आगिआकारी बपुरा जीउ ।
जो तिसु भावै सोई फुनि थीउ ॥
कबहू ऊच नीच महि बसै ।
कबहू सोग हरख रंगि हसै ॥
कबहू निंद चिंद बिउहार ।
कबहू ऊभ अकास पइआल ॥
कबहू बेता ब्रहम बीचार ।
नानक आपि मिलावणहार ॥५॥

पद ६ वे

कबहू निरति करै बहु भाति ।
कबहू सोइ रहै दिनु राति ॥
कबहू महा क्रोध बिकराल ।
कबहूं सरव की होत र वाल ॥
कबहू होइ बहै बड राजा ।
कबहू भेखारी नीच का साजा ॥
कबहू अपकीरति महि आवै ।
कबहू भला भला कहावै ॥
जिउ प्रभु राखै तिव ही रहै ।
गुर प्रसादि नानक सचु कहै ॥६॥

पद ७ वे

कबहू होइ पंडितु करे बख्यानु ।
कबहू मोनि धारी लावै धिआनु ॥
कबहू तट तीरथ इसनान ।
कबहू सिध साधिक मुखि गिआन ॥
कबहू कीट हसति पतंग होइ जीआ ।
अनिक जोनि भरमै भरमीआ ॥
नाना रुप जिउ स्वागी दिखावै ।
जिउ प्रभ भावै तिवै नचावै ॥
जो तिसु भावै सोई होइ ।
नानक दूजा अवरु न कोइ ॥७॥

पद ८ वे

कबहू साध संगति इहु पावै ।
उसु असथान ते बहुरी न आवै ॥
अंतरि होइ गिआन परगासु ।
उसु असथान का नही बिनासु ॥
मन तन नामि रते इक रंगि ।
सदा बसहि पारब्रहम कै संगि ॥
जिउ जल महि जलु आइ खटाना ।
तिउ जोती संगि जोति समाना ॥
मिटि गए गवन पाए बिस्त्राम ।
नानक प्रभू कै सद कुरबान ॥८॥

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Last Updated : December 28, 2013

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