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सुखमनी साहिब - अष्टपदी ६

हे पवित्र काव्य म्हणजे शिखांचे पांचवे धर्मगुरू श्री गुरू अरजनदेवजी ह्यांची ही रचना.
दहा ओळींचे एक पद, आठ पदांची एक अष्टपदी व चोविस अष्टपदींचे सुखमनी साहिब हे काव्य बनलेले आहे.


अष्टपदी ६
( गुरु ग्रंथ साहिब पान क्र. २६९ )

श्लोक

काम क्रोध अरु लोभ मोह बिनसि जाइ अहंमेव ।
नानक प्रभ सरणागती करि प्रसादु गुरदेव ॥१॥

पद १ ले

जिह प्रसादि छतीह अंम्रित खाहि ।
तिसु ठाकुर कउ रखु मन माहि ॥
जिह प्रसादि सुगंधत तनि लावहि ।
तिस कउ सिमरत परम गति पावहि ॥
जिह प्रसादि बसहि सुख मंदरि ।
तिसहि धिआइ सदा मन अंदरि ॥
जिह प्रसादि ग्रिह संगि सुख बसना ।
आठ पहर सिमरहु तिसु रसना ॥
जिह प्रसादि रंग रस भोग ।
नानक सदा धिआईऐ धिआवन जोग ॥१॥

पद २ रे

जिह प्रसादि पाट पटंबर हढावहि ।
तिसहि तिआगि कत अवर लुभावहि ॥
जिह प्रसादि सुखि सेज सोईजै ।
मन आठ पहर ता का जसु गावीजै ॥
जिह प्रसादि तुझु सभु कोऊ मानै ।
मुखि ता को जसु रसन बखानै ॥
जिह प्रसादि तेरो रहता धरमु ।
मन सदा धिआइ केवल पारब्रहमु ॥
प्रभ जी जपत दरगह मानु पावहि ।
नानक पति सेती घरि जावहि ॥२॥

पद ३ रे

जिह प्रसादि आरोग कंचन देही ।
लिव लावहु तिसु राम सनेही ॥
जिह प्रसादि तेरा ओला रहत ।
मन सुखु पावहि हरि हरि जसु कहत ॥
जिह प्रसादि तेरे सगल छिद्र ढाके ।
मन सरनी परु ठाकुर प्रभ ता कै ॥
जिह प्रसादि तुझु को न पहूचै ।
मन सासि सासि सिमरहु प्रभ ऊचे ॥
जिह प्रसादि पाई दुलभ देह ।
नानक ता की भगति करेह ॥३॥

पद ४ थे

जिह प्रसादि आभूखन पहिरीजै ।
मन तिसु सिमरत किउ आलसु कीजै ॥
जिह प्रसादि अस्व हसति असवारी ।
मन तिसु प्रभ कउ कबहू न बिसारी ॥
जिह प्रसादि बाग मिलख धना ।
राखु परोइ प्रभु अपुने मना ॥
जिनि तेरी मन बनत बनाई ।
ऊठत बैठत सद तिसहि धिआई ॥
तिसहि धिआइ जो एक अलखै ।
ईहा ऊहा नानक तेरी रखै ॥४॥

पद ५ वे

जिह प्रसादि करहि पुंन बहु दान ।
मन आठ पहर करि तिस का धिआन ॥
जिह प्रसादि तू आचार बिउहारी ।
तिसु प्रभ कउ सासि सासि चितारी ॥
जिह प्रसाहि तेरा सुंदर रुपु ।
सो प्रभु सिमरहु सदा अनूपु ॥
जिह प्रसादि तेरा सुंदर रुपु ।
सो प्रभु सिमरि सदा दिन राति ॥
जिह प्रसादि तेरी पति रहै ।
गुर प्रसादि नानक जसु कहै ॥५॥

पद ६ वे

जिह प्रसादि सुनहि करन नाद ।
जिह प्रसादि पेखहि बिसमाद ॥
जिह प्रसादि बोलहि अंम्रित रसना ।
जिह प्रसादि सुखि सजजे बसना ॥
जिह प्रसादि हसत कर चलहि ।
जिह प्रसादि संपूरन फलहि ॥
जिह प्रसादि परम गति पावहि ।
जिह प्रसादि सुखि सहजि समावहि ॥
ऐसा प्रभु तिआगि अवर कत लागहु ।
गुर प्रसादि नानक मनि जागहु ॥६॥

पद ७ वे

जिह प्रसादि तूं प्रगटु संसारि ।
तिसु प्रभ कउ मूलि न मनहु बिसरि ॥
जिह प्रसादि तेरा परतापु ।
रे मन मूड़ तू ता कउ जापु ॥
जिह प्रसादि तेते कारज पूरे ।
तिसहि जानु मन सदा हजूरे ॥
जिह प्रसादि तूं पावहि साचु ।
रे मन मेरे तूं ता सिउ राचु ॥
जिह प्रसादि सभ की गति होइ ।
नानक जापु जपै जपु सोइ ॥७॥

पद ८ वे

आपि जपाए जपै सो नाउ ।
आपि गावाए सु हरि गुन गाउ ॥
प्रभ किरपा ते होइ प्रगासु ।
प्रभू दइआ ते कमल बिगासु ॥
प्रभ सुप्रसंन बसै मनि सोइ ।
प्रभ दइआ ते मति ऊतम होइ ॥
सरब निधान प्रभ तेरी मइआ ।
आपहु कछू न किनहू लइआ ॥
जितु जितु लावहु तितु लगहि हिर नाथ ।
नानक इन कै कछू न हाथ ॥८॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2013-12-28T22:54:39.5270000

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विरजा III.

  • n. एक राक्षसी, जिसने अदितिपुत्र महोत्कट का वेष धारण किये हुए श्रीगणेश को भक्षण किया। महोत्कटरूपी श्रीगणेश इसका उदर विदिर्ण कर बाहर आया। अन्त में उसीके ही स्पर्श से इसे मुक्ति प्राप्त हुई। 
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अतिथी व अतिथीसत्कार याबद्दल माहिती द्यावी.
Category : Hindu - Traditions
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