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मूरख छाड़ वृथा अभिमान ...

विविध - मूरख छाड़ वृथा अभिमान ...

’विविध’ शीर्षकके द्वारा संतोंके अन्यान्य भावोंकी झलक दिखलानेवाली वाणीको प्रस्तुत किया है ।


मूरख छाड़ वृथा अभिमान ।

औसर बीत चल्यो है तेरो, दो दिनको मेहमान ॥ १ ॥

भूप अनेक भये पृथ्वी पर, रुप तेज बलवान ।

कौन बच्यो या काल-व्याल तें, मिट गये नाम निशान ॥ २ ॥

धवल-धाम धन गज रथ सेना, नारी चन्द्र समान ।

अन्त समय सब ही को तज कर, जाय बसे शमशान ॥ ३ ॥

तज सत-संग भ्रमत विषयनमें, जा विधि मरकट श्वान ।

छिन भर बैठि न सुमिरन कीन्यो, जासों हो कल्यान ॥ ४ ॥

रे मन मूढ़ अनत जनि भटकै, मेरो कह्यो अब मान ।

‘नारायण’ ब्रजराज कुँवससों, बेगहिं कर पहिचान ॥ ५ ॥

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Last Updated : January 22, 2014

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