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मैं तो हूँ संतन को द...

विविध - मैं तो हूँ संतन को द...

’विविध’ शीर्षकके द्वारा संतोंके अन्यान्य भावोंकी झलक दिखलानेवाली वाणीको प्रस्तुत किया है ।


मैं तो हूँ संतन को दास, जिन्होंने मन मार लिया ॥ टेर॥

मन मार् या तन बस किया रे, हुआ भरम सब दूर ।

बाहिर तो कछु दीखत नाहीं भीतर चमके नूर ॥१॥

काम क्रोध मद लोभ मारके, मिटी जगत की आस ।

बलिहारी उन संत की रे, प्रकट किया प्रकास ॥२॥

आपो त्याग जगत में बैठे, नहीं किसीसे काम ।

उनमें तो कछु अन्तर नाँहीं, संत कहौ चाहे राम ॥३॥

नरसीजी के सतगुरु स्वामी, दिया अमीरस पाय ।

एक बूँद सागर में मिल गई, क्या तो करेगा जमराज ॥४॥

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Last Updated : January 22, 2014

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