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महाभूतविवेक प्रकरणम् - श्लोक ७६ ते ८०

वामन नरहरी शेष उर्फ वामन पंडित (इ.स.१६३६ ते १६९५) हे १७ व्या शतकात होऊन गेलेले प्रख्यात मराठी कवी होते.


श्लोक ७६ ते ८०
वासनायां प्रवृद्धायां वियत्सत्यत्ववादिनम् ॥
सन्मात्राबोधयुक्तं च द्दष्ट्वा विस्मयते बुध: ॥७६॥

वादी - बरें वियत् असत् ठरलें ॥ तुमचें सतचि सर्वत भरलें ॥
तरि आकाशीं सत्यत्व मानिलें ॥ तेणें काय होतें ॥३८७॥
सि० - ज्ञात्याचे समे माझारि ॥ मूर्खपणा येतो आंगावरी ॥
विस्मय करिती वरचे वरी ॥ मूढ म्हणोनी ॥३८८॥
आपणचि आपणा भुलला ॥ त्याला किती म्हणावा खुळा ॥
वासनाविशिष्ट जीवाला ॥ सद्बोधकैंचा ॥३८९॥
म्हणोनी सज्जन तिरस्कारिती ॥ बाल जाणूनी तुच्छमानिती ॥
स्मृती शास्त्रेंही डावलती ॥ द्विपदपशु म्हणोनी ॥३९०॥

एवमाकाशमिथ्यात्वे सत्सत्यत्वे च वासिते ॥
न्यायेनानेन वाय्वादे: सद्वस्तु प्रविविच्यताम् ॥७७॥

एवं ऐसें झालें सिद्ध ॥ तुटला सकलही वाद ॥
सत सत्य निर्विवाद ॥ आकाश मिथ्या ॥३९१॥
येणेंचि न्यायें करून ॥ वाय्वादिकांचें करावें विवरण ॥
सत् असत् निवडोन ॥ सतचि घ्यावे ॥३९२॥

सद्वस्तुन्येकदेशस्था माया तत्रैकदेशगम् ॥
वियत्तत्राप्येकदेशगतो वायु: प्रकल्पित: ॥७८॥

सद्वस्तुचे एकदेशीं ॥ माया आहे ऐसें जरि मानसी ॥
तरी तियेच्या ही एकदेशीं ॥ वियत् असे ॥३९३॥
तया वियताचे एकदेशीं ॥ वायु कल्पनाये जन्मासी ॥
एवं परंपर भूताशीं ॥ संबंध असे ॥३९४॥
परंपरेच्याही संबंधें ॥ सद्वस्तु कधींही न बाधे ॥
येच विषयीं प्रतिपादे ॥ मुनिवर्य पुढारी ॥३९५॥

शोषस्पर्शौ गतिर्वेगो वायुधर्मा इमेमता: ॥
त्रय:स्वभावा: सन्मायाव्योम्नां ये तेऽपि वायुगा: ॥७९॥

शोष, स्पर्श, वेग, गति ॥ हे वायुचे धर्म असती ॥
जे निरंतर राहती ॥ तया जवळी ॥३९६॥
सत्ता माया आणि आकाश ॥ हयाही त्रय धरी स्वभावास ॥
ते ही दाऊं प्रत्ययास ॥ पूढारी आतां ॥३९७॥

वायुरस्तीति सद्भाव: सतो वायौ पृथक्कृते ॥
निस्तत्त्वरूपता मायास्वभावो व्योमगो ध्वनि: ॥८०॥

वायुचा जो अस्तित्व भाव ॥ तोचि सत्तेचा स्वभाव ॥
तो पृथक्क केलियाही वाव ॥ वायु निस्तत्व ॥३९८॥
निस्तत्व स्वभाव मायेचा ॥ ध्वनि तो आकाशाचा ॥
एवं त्रय स्वभाव गुणाचा ॥ वायु झाला ॥३९९॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T12:53:45.1400000

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कालनिर्णयकोश II. - युगगणनापद्धति

  • n. जो सत्य, त्रेता, द्वापर, कलि आदि युगों की कल्पना पर अधिष्ठित है। 
  • युगगणनापद्धति n. पौराणिक साहित्य में प्राप्त युगगणना पद्धति के अनुसार, ब्रह्मा का एक दिन एक हजार पर्यायों में विभाजित किया गया है, जिनमें से हर एक पर्याय निम्नलिखित चार युगों से बनता है : - 
  • एक उपपत्ति n. सुप्रसिद्ध इतिहासकार जयचंद्र विद्यालंकार के अनुसार, यद्यपि पौराणिक साहित्य में निर्दिष्ट युगों की कल्पना शास्त्रीय एवं ऐतिहासिक है, फिर भी वहाँ दी गयी हर युग की कालमर्यादा अतिशयोक्तिपूर्ण है । इसी कारण जयचंद्रजी ने कृतयुग, त्रेतायुग, एवं द्वापरयुग के पौराणिक कालविभाजन की समीक्षा राजनैतिक दृष्टि से करने का सफल प्रयत्न किया है । इस समीक्षा में उन्होंने वैवस्वत मनु से ले कर भारतीय युद्ध तक ९४ पीढीयों का परिगणन करनेवाले पार्गिटर के सिद्धान्त को ग्राह्य माना है, एवं उसी सिद्धान्त को भारतीय युद्ध तक कृत, त्रेता एवं द्वापरयुग समाप्त होने के जनश्रुति से मिलाने का प्रयत्न उन्होंने किया है । इन दोनों सिद्धान्तों को एकत्रित कर वे सगर राजा (४० वीं पीढी) के साथ कृतयुग की समाप्ति, राम दाशरथि (६५ वीं पीढी) के साथ त्रेतायुग का अंत, एवं कृष्ण (९५ वीं पीढी) के देहावसान के साथ द्वापरयुग की समाप्ति ग्राह्य मानते हैं । [वायु. ९९ - ४२९] । उनका यहीं सिद्धांत निम्नलिखित तालिका में ग्रथित किया गया है : -
    युग - कृतयुग
    पीढीयाँ - १ - ४० पीढीयाँ
    ऐतिहासिक कालमर्यादा - प्रारंभ से सगर राजा तक
    कालमर्यादा - ४० x १६ = ६४० वर्ष

    युग - त्रेतायुग
    पीढीयाँ - ४१ - ६५ पीढीयाँ
    ऐतिहासिक कालमर्यादा - सगर राजा से राम दाशरथि तक
    कालमर्यादा - २५ x १६ = ४०० वर्ष

    युग - द्वापरयुग
    पीढीयाँ - ६६ - ९५ पीढीयाँ
    ऐतिहासिक कालमर्यादा - रामदशरथि से कृष्ण तक
    कालमर्यादा - ३० x १६ = ४८० वर्ष

    युग - कलियुग
    पीढीयाँ - -
    ऐतिहासिक कालमर्यादा - भारतीय युद्ध के पश्चात्‍
    कालमर्यादा - (१०५० वर्ष)

    कुल पीढीयाँ - ९५
    पहले तीन युगों की कालमर्यादा - १,५२० वर्ष

    जयचन्द्रजी के अनुसार, कृत, त्रता एवं द्वापर युगों की कुल कालावधि क्रमशः ६५०, ४००, एवं ४७५ साल मानी गयी है । भारतीय युद्ध का काल १४२० ई. पू. निर्धारित करते हुए वे कृतयुग, त्रेतायुग, एवं द्वापरयुग का कालनिर्णय निम्नप्रकार करते हैं : -
    कृतयुग - २९५० ई. पू. - ५३०० ई. पू.
    त्रेतायुग - २३०० ई. पू. - १९०० ई. पू.
    द्वापारयुग - १९०० ई. पू. - १४२५ ई. पू.
    पौराणिक साहित्य में निर्दिष्ट वंशावलियाँ संपूर्ण न हो कर उनमें केवल प्रमुख राजा ही समाविष्ट किये गये हैं । इस बात पर ध्यान देते हुए, केवल उपलब्ध राजाओं के पीढीयों के परिगणन के आधार पर कालनिर्णय का कौनसा भी सिद्धांत व्यक्त करना अशास्त्रीय प्रतीत होता है । फिर भी पौराणिक जानकारी को तर्कशुद्ध एवं ऐतिहासिक चौखट में बिठाने का एक प्रयत्न इस नाते जयचंद्रजी का उपर्युक्त सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है ।
     
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