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विनयावली १८९

विनय पत्रिका - विनयावली १८९

विनय पत्रिकामे , भगवान् श्रीराम के अनन्य भक्त तुलसीदास भगवान् की भक्तवत्सलता व दयालुता का दर्शन करा रहे हैं।


साहिब उदास भये दास खास खीस होत

मेरी कहा चली ? हौं बजाय जाय रह्यो हौं ।

लोकमें न ठाउँ , परलोकको भरोसो कौन ?

हौं तो , बलि जाउँ , रामनाम ही ते लह्यो हौं ॥१॥

करम , सुभाउ , काल , काम , कोह , लोभ , मोह

ग्राह अति गहनि गरीबी गाढ़े गह्यो हौं ।

छोरिबेको महाराज , बाँधिबेको कोटि भट ,

पाहि प्रभु ! पाहि , तिहुँ ताप - पाप दह्यो हौं ॥२॥

रीझि - बूझि सबकी प्रतीति - प्रीति एही द्वार ,

दूधको जर्यो पियत फूँकि फूँकि मह्यो हौं ।

रटत - रटत लट्यो , जाति - पाँति - भाँति घट्यो ,

जूठनिको लालची चहौं न दूध - नह्यो हौं ॥३॥

अनत चह्यो न भलो , सुपथ सुचाल चल्यो

नीके जिय जानि इहाँ भलो अनचह्यो हौं ।

तुलसी समुझि समुझायो मन बार बार ,

अपनो सो नाथ हू सों कहि निरबह्यो हौं ॥४॥

भावार्थः - जब मालिक उदासीन हो जाता है तब खास नौकर भी बरबाद हो जाता है , फिर मेरी तो बात ही क्या है ? मैं तो डंकेकी चोट दुःखोंमें बहा चला जा रहा हूँ । जब मेरे लिये इस लोकमें ही कहीं ठौर नहीं है , तब परलोकका क्या भरोसा करुँ ? हे श्रीरामजी ! मैं आपकी बलैया लेता हूँ , मैं तो एक आपके नामहीमे हाथ बिक चुका हूँ ( मेरा लोक - परलोक तो उसीसे बनेगा ) ॥१॥

कर्म , स्वभाव , काल , काम , क्रोध , लोभ और मोहरुपी बड़े - बड़े ग्राहोंने और ( साधनहीनतारुपी ) घोर दरिद्रताने मुझको बड़े जोरसे पकड़ रखा है । हे महाराज ! बाँधनेके लिये करोड़ों योद्धा हैं , परन्तु बन्धनसे छुड़ानेके लिये तो केवल एक आप ही हैं । अतएव हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिये , रक्षा कीजिये । मैं पापरुपी तीनों तापोंसे जल रहा हूँ ( अपनी कृपादृष्टीकी सुधावृष्टिसे इन तापोंको शान्त कीजिये ) ॥२॥

हे प्रभो ! ( दूसरे किसके पास जाऊँ ? ) सबकी रीझ - बूझ और प्रीति - विश्वास एक आपके ही खजानेसे अपने सेवकोंको कुछ दिया करते हैं , परन्तु वे मुक्ति नहीं दे सकते । उन सबकी पूजा भी आपकी ही पूजा होती हैं , क्योंकि सबके मूल आप ही हैं । ) मैं तो दूधका जला मट्ठा भी फूँक - फूँककर पीता हूँ । भाव यह कि आपको छोड़कर दूसरोंको भजनेसे कभी परमसुख और दिव्य शान्ति नहीं मिली , इसलिये बहुत सावधान होकर चलता हूँ । सुखके लिये देवताओंको पुकारते - पुकारते हार गया और जाति - पाँति तथा चाल - चलन सभीसे हाथ धो बैठा । इसलिये अब मैं के ल आपके जूठनका ही लालची हूँ । मैं दूधसे नहीं नहाना चाहता । भाव , मुझे स्वर्गके ऐश्वर्यकी इच्छा नहीं है , मैं तो केवल आपके चरणोंमें पड़े रहना चाहता हूँ ॥३॥

मैं और कहीं ( दूसरोंकी शरण लेकर ) सुखमार्गपर अच्छी चाल चलकर अपना कल्याण नहीं चाहता हूँ और यहाँ ( आपके शरणमें ) मैं आदर न पाकर भी अच्छी तरह हूँ । ( आपके अनोखे विरदके भरोसे निर्भय और निश्चिन्त पड़ा हूँ ) । तुलसीने समझकर अपने मनको बार - बार समझा दिया है और वह अपने नाथसे भी कहकर निश्चिन्त हो गया है कि उसका निर्वाह आपके ही हाथमें हैं ॥४॥

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Last Updated : November 13, 2010

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