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अयिगिरिनन्दिनि नन्दितमेदि...

श्री महिषासुरमर्द्दिनीस्तोत्रम् - अयिगिरिनन्दिनि नन्दितमेदि...

देवी देवतांची स्तुती करताना म्हणावयाच्या रचना म्हणजेच स्तोत्रे. स्तोत्रे स्तुतीपर असल्याने, त्यांना कोणतेही वैदिक नियम नाहीत. स्तोत्रांचे पठण केल्याने इच्छित फल प्राप्त होते.
In Hinduism, a Stotra is a hymn of praise, that praise aspects of Devi and Devtas. Stotras are invariably uttered aloud and consist of chanting verses conveying the glory and attributes of God.


श्री महिषासुरमर्द्दिनीस्तोत्रम्
अयिगिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपॊषिणि शंकरतॊषिणि किल्बिषमॊषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥२॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते
शिखरिशिरोमणि तुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥३॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्डवितुण्डित शुण्डगजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारण चण्डपराक्रम शुण्डमृगाधिपते ।
निजभुजदण्डनिपातित खण्डविपातित मुण्डभटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥४॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधॊदित दुर्धर निर्ज्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति दानवदूतकृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥५॥

अयि शरणागत वैरि वधूवर वीरवराभयदायकरे
त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधिशिरोऽधिकृतामलशूलकरे ।
धुमिधुमितामर दुन्दुभिनाद महॊ मुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥६॥

अयि निजहुङ्कृतिमात्रनिराकृत धूम्रविलोचनधूम्रशते
समरविशोषितशोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिव शिव शुम्भनिशुम्भ महाहव तर्पितभूतपिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥७॥

धनुरनुसंग रणक्षणसंग परिस्फुरदंग नटत्कटके
कनकपिशङ्गपृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हतावटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥८॥

जय जय जप्यजये जयशब्द परस्तुतितत्पर विश्वनुते
भण भण भञ्जिमि भिंकृत नूपर शिञ्जितमॊहित भूतपते ।
नटितनटार्ध नटीनटनायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥९॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः सुमनॊहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनी रजनी रजनीकर वक्त्रवृते ।
सुनयन विभ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१०॥

सहितमहाहवमल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिक मल्लिक भिल्लिक भिल्लिक वर्गवृते ।
सितकृतफुल्लसमुल्लसितारुण तल्लज पल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥११॥

अविरलगण्डगलन्मद मेदुर मत्तमतङ्गज राजपते
त्रिभुवन भूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मॊहन मन्मथ राजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१२॥

कमलदलामलकोमलकान्तिकलाकलितामल फालतले
सकल विलास कलानिलयक्रम केलि चलत् कलहंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुलकुवलयमण्डल मौलि मिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१३॥

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिलमञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनॊहरगुञ्जित रंजित शैलनिकुंजगते ।
निजगणभूतमहाशबरीगण सद्गुण संभृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१४॥

कटितटपीतदुकूलविचित्रमयूख तिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुरदंशुलसन्नखचन्द्ररुचे ।
जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भरकुञ्जरकुंभकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१५॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक संगरतारक संगरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधि समाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१६॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तवपदमेव परंपदमित्यनुशीलयतॊ मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१७॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुणरङ्गभुवं
भजति स किं न शचीकुचकुम्भ तटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१८॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दुमुखीसुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती क्रुपया किमुतत्क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥१९॥

अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतॊ जननी कृपयासि यथासि तथाऽनुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्द्दिनि रम्यकपर्द्दिनि शैलसुते ॥२०॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2018-02-17T20:23:42.5300000

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