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अथपौर्णिमास्यांविशेषः

धर्मसिंधु - अथपौर्णिमास्यांविशेषः

This Grantha was written by Pt. Kashinathashastree Upadhyay, in the year 1790-91.

अथपौर्णिमास्यांविशेषः

सङ्वकालादूर्ध्वंत्रयोदशादिघटीमारभ्यार्धाह्नात्पूर्वसंधौसद्यःकालापौर्णमासीतस्यांसंधिदिनेएवान्वाधानंयागश्चसद्योनुष्ठेयः

इदंपौर्णमास्यांसद्यःकालत्वंवैकल्पिकमितिकेचित् अमावास्यांसर्वत्रद्व्यहकालतैवनकदाचिदपिसद्यःकालता

पौर्णमास्याममायांचापराह्णसंधौप्रतिपच्चतुर्थपादे यागोनदोषाय

अमावास्यायामपराह्णसंधावपिप्रतिपदित्रिमुहूर्ताधिकाद्वितीयाप्रवेशेचन्द्रदर्शनसम्भवेन

चन्द्रार्शनेयागनिषेधादअमावास्यायामेवेष्टिश्चतुर्दश्यामन्वाधानंबौधायनादीनाम्

अमावास्यायांसप्तघटीमितप्रतिपदभावे

चन्द्रदर्शनेपिप्रतिपद्येवबौधायनैरिष्टिःकार्या आश्वलायनापस्तम्बादीनांतुचन्द्रदर्शन

निषेधोनास्तीतिप्रातिपद्येवेष्तिः

यत्रसंधिदिनेइष्टिस्तत्रसाप्रतिपद्येवसमापनीयानतुपर्वणि पर्वणियागसमाप्तौपुनर्यागः कर्तव्यः

एवमेवस्मार्तेपार्वणस्थालीपाकनिर्णयः

केचित्तुस्मार्तेस्थालीपाकःप्रतिपद्येवस्मापनीयइतिनियमोनास्ति

पूर्वाह्णेएवस्थालीपाकंसमाप्यसंधेरूर्ध्वंप्रतिपदिब्राह्मणभोजनमात्रंकार्यम्

जयन्तोपिसंधिसन्निकृष्टेप्रातःकाले एवस्थालीपाकमाहेतिविशेषमाहुः

श्रौतेपिब्राह्मणभोजनमात्रंप्रतिपदिकार्यमन्यत्तंत्रपूर्वाह्णएवसमापनीयं

नप्रतिपदपेक्षेति पुरुषार्थचिन्तामणावुक्तम् कात्यायनानांपौर्णमसेष्टिनिर्णयः

पूर्वोक्तःसर्वसाधारणएवनतत्रकश्चिद्विशेषः इतिसिन्ध्वादिबहुग्रन्थसंमतं

अन्येतुपूर्वाह्णसंधौसंधिदिनेन्वाधानंपरेह्नियागइति पौर्णमासीविषयेकातीयानां विशेषमाहुः ।

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2008-04-21T02:29:28.9530000

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बिन्दुग

  • n. बाष्कलग्राम में रहनेवाला एक ब्राह्मण, जिसकी पत्नी का नाम चंचला था । यह वेश्यागामी एवं निकृष्ट विचारोंवाला था, अतएव इसकी सदाचरणी पत्नी चंचला भी इसके प्रभाव में आ कर, बुरे कर्मो की ओर अग्रेसर हो, उसीमें लिप्त हो गयी। बिन्दुग को जब यह पता चला तो इसने उसके सामने यह शर्त रखी, ‘तुम वेश्यावृत्ति का कर्म खुशी से अपना सकती हो, किंतु तुम्हे सारे पैसे मुझे देने होंगे’। इस शर्त को मान कर चंचला पूर्ण रुप से वेश्या बन गयी । मृत्यु के उपरांत, दोनो विंध्य पर्वत पर पिशाच बने । बाद को शिवपुराण के श्रवण तथा शिवभजन के कारण, चंचला पिशाचयोनि से मुक्त हुयी । उसके प्रार्थना करने पर, पार्वतीजी ने अपने पार्षद तुंबरु द्वारा विंध्य पर्वत पर पिशाची बिन्दुग को शिवकथा का श्रवण करवाया, जिससे उसे भी मुक्ति प्राप्त हुयी [शिवपुराण महात्म्य अ.४] 
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श्रीयंत्र स्थापना व मुहूर्त याबद्दल माहिती द्यावी.
Category : Hindu - Puja Vidhi
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