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अध्याय ३ - अष्टमभावस्थराशिफलम्

मानसागरी - अध्याय ३ - अष्टमभावस्थराशिफलम्

सृष्टीचमत्काराची कारणे समजून घेण्याची जिज्ञासा तृप्त करण्यासाठी प्राचीन भारतातील बुद्धिमान ऋषीमुनी, महर्षींनी नानाविध शास्त्रे जगाला उपलब्ध करून दिली आहेत, त्यापैकीच एक ज्योतिषशास्त्र होय.

The horoscope is a stylized map of the planets including sun and moon over a specific location at a particular moment in time, in the sky.


अष्टमभावस्थराशिफलम्

मेषेऽष्टमस्थे च भवेन्नराणां भवेद्विदेशे तु रुजा स्थितानाम् ।

कथानुस्मृत्याथ विमूर्च्छितानां महाधनीनामतिदुःखितानाम् ॥१॥

वृषेऽष्टमस्थे च भवेन्नराणां मृत्युर्गृहे श्लेष्मकृताद्विकारात ।

महाशनाद्वाथ चतुष्पदाद्वा रात्रौ तथा दुष्टजनादिसंगात् ॥२॥

तृतीयराशौ च भवेन्नराणां मृत्युस्थितं मृत्युरनिष्टसङ्गत् ।

लाभोद्भवो वा रससंभवो वा गुदप्रकोपादथवा प्रमेहात् ॥३॥

कर्केऽष्टमस्थे च जलोपसर्गात्कीटात्तथा चैव विभीषणाद्वा ।

भवेद्विनाशः परहस्ततो वा विदेशसंस्थस्य नरस्य चैव ॥४॥

सिंहेऽष्टमस्थे च सरीसृपाच्च भवेद्विनाशस्तनुजस्य सम्यक् ।

व्यालोद्भवो वापि वनाश्रितस्य चोरोद्भवो वाऽथ चतुष्पदाच्च ॥५॥

कन्या यदा चाष्टमगा विलासात्सदा स्वचित्तान्मनुजस्य विन्द्यात् ।

स्त्रीणां हि हिंस्त्राद्विषमाशनात्स्यात् स्त्रीणां कृते वा स्वगृहाश्रितस्य ॥६॥

तुलाधरे चाष्टमगे च मृत्युर्भवेन्नराणां द्विपदोत्थ एव ।

निशागमे संस्थकृतोपवासाद्विष्टिं च कोपोऽप्यथवा प्रतापात् ॥७॥

स्थानेऽष्टमस्याष्टमराशिसङ्गे नृणां विनाशो रुधिरोद्भवेन ।

रोगेण वा कीटसमुद्भवैश्च स्वस्थानसंस्थस्य विषोद्भवो वा ॥८॥

चापेऽष्टमस्थे प्रभवेन्नराणां मृत्युः स्वसंस्थे शरताडनेन ।

गुह्योद्भवेनापि गदोद्भवेन चतुष्पदोत्थस्य जलोद्भवेन ॥९॥

मृगेऽष्टमस्थे च नरस्य यस्य विद्यान्वितो मानगुणैरुपेतः ।

कामी च शूरोऽथ विशालवक्षाः शास्त्रार्थवित्सर्वकलासु दक्षः ॥१०॥

घटेऽष्टमस्थे विभवेद्विनाशो वैश्वानरात्सद्मगतात्तु जन्तोः ।

नानाव्रणैर्वायुभवैर्विकारैः श्रमात्तथा गेहविहीनमृत्युः ॥११॥

मीनेऽष्टमस्थे प्रभवेच्च मृत्युर्नृणामतीसारकृतश्च कष्टात् ।

पित्तज्वराद्वा सलिलाश्रयाद्वा रक्तप्रकोपादथवा च शस्त्रात् ॥१२॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2009-03-25T22:33:20.4800000

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मुचुकंद

  • n. (सू.इ.) एक सुविख्यात इक्ष्वाकुवंशीय राजा, जो मांधातृ राजा का तृतीय पुत्र था । राम दाशरथि के पूर्वजों में से यह इकतालिसवॉं पुरुष था । इसके नाम के लिए ‘मुचकुंद’ पाठभेद भी प्राप्त है [म.शां.७५.४] । इसकी माता का नाम बिन्दुमती था [ब्रह्मांड.३.६३.७२];[ मत्स्य.१२.३५];[ ब्रह्म.७.९५] । इसने नर्मदा नदी के तट पर पारिपात्र एवं ऋक्ष पर्वतों के बीच में अपनी एक नयी राजधानी स्थापन की थी । आगे चल कर, हैहय राजा महिष्मंत ने उस नगरी को जीत लिया, एवं उसे ‘माहिष्मती’ नाम प्रदान किया । इससे प्रतीत होता है कि, मुचुकुंद राजा की उतर आयु में इक्ष्वाकु वंश की राजसत्ता काफी कम हो चुकी थी । इसने ‘पुरिका’ नामक और एक नगरी की भी स्थापना की थी, जो विंध्य एवं ऋक्ष पर्वतों के बीच में बसी हुयी थी [ह.वं.२.३८.२, १४-२३] 
  • मुचुकुंद-वैश्रवण संवाद n. मुचुकुंद अपने बाहुबल से पृथ्वी को अपने अधिकार में ला कर, उस पर राज्य स्थापित किया था । इसकी जीवनकथा एवं वैश्रवण नामक इंद्र के साथ हुआ इसके संवाद का निर्देश महाभारत में प्राप्त है, कुन्ती ने युधिष्ठिर को बताया था [म.उ.१३०.८-१०];[ शा.७५] । एक बार स्वबल की परीक्षा देखने के लिए इसने कुबेर पर आक्रमण कर दिया । तब कुबेर ने राक्षसोम का निर्माण कर, इसकी समस्त सेना का विनाश किया । अपनी बुरी स्थिति देख कर, इसने अपना सारा दोष पुरोहितों के सर पर लादना शुरु किया । तब धर्मज्ञ वसिष्ठ ने उग्र उपश्चर्या कर राक्षसोम का वध किया । उस समय कुबेर ने इससे कहा, ‘तुम अपने शौर्य से मुझे युद्ध में परास्त करो। तुम ब्राह्मणों की सहायता क्यों लेते हो’ तब इसने कुबेर को तर्कपूर्ण उत्तर देते हुए कहा, ‘तप तथा मंत्र का बल ब्राह्मणों के पास होता है, तथा शस्त्रविद्या क्षत्रियों के पास होती है । इस प्रकार राजा का कर्तव्य है कि, इन दोनों शक्तियों का उपयोग कर राष्ट्र का कल्याण करे’ । इसके इस विवेकपूर्ण वचनों को सुन कर कुबेर ने इसे पृथ्वी का राज्य देना चाहा, किन्तु इसने कहा, ‘मैं अपने बाहुबल से पृथ्वी को जीत कर, उस पर राज्य करुंगा’। 
  • कालयवन का वध n. कालयवन नामक राक्षस एवं श्रीकृष्ण से संबंधित मुचुकंद राजा एक कथा पद्म, ब्रह्म, विष्णु, वायु आदि पुराणों में, एवं हरिवंश में प्राप्त है । उस कथा में इसके द्वारा कालयवन राक्षस का वध करने का निर्देश प्राप्त है । किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से यह कथा कालविपर्यस्त प्रतीत होती है । एक बार देवासुर संग्राम में, दैत्यों विरुद्ध लडने के लिए देवों ने मुचुकुंड की सहाय्यता ली थी । उस युद्ध में देवों की ओर से लड कर इसने दैत्यों को पराजित किया, एवं इस तरह देवों की रक्षा की । इसकी वीरता से प्रसन्न हो कर, देवों ने इसे वर मॉंगने के लिए कहा । किन्तु उस समय अत्यधिक थकान होने के कारण, यह निद्रित अवस्था में था । अतएव इसने वरदान मॉंगा, ‘मैं सुख की नींद सोउ, तथा यदि कोई मुहे उस नीदें में जगा दे, तो वह मेरी दृष्टि से जल कर खाक हो जाये’। इसके सिवाय, इसने श्रीविष्णु के दर्शन की भी इच्छा प्रकट की । इस प्रकार पर्वत की गुफा में यह काफी वर्षो तक निद्रा का सुख लेता रहा । इसी बीच एक घटना घटी । कालयवन ने कृष्ण को मारने के लिए उसका पीछा किया । कृष्ण भागता हुआ उसी गुफा में आया, जहॉं पर यह सोया हुआ था । इसके ऊपर अपना उत्तरीय डाल कर, कृष्ण स्वयं छिप गया । पीछा करता हुआ कालयवन गुफा में आया, तथा इसे कृष्ण समझ कर, लात के प्रहार से उसने इसे जगाया । मुचुकुंद बडी क्रोध से उठा, तथा जैसे ही इसने कालयवन को देखा, वह जलकर वही भस्म हो गया । 
  • कृष्णदर्शन n. बाद में ने इसे दर्शन दे कर, राज्य की ओर जाने को कहा, तथा वर प्रदान किया, ‘तुम समस्त प्राणियों के मित्र, तथा श्रेष्ठ ब्राह्मण बनोगे, तथा उसके उपरांत मुक्ति प्राप्त कर मेरी शरण में आओगे’। श्रीकृष्ण के द्वारा पाये अशीर्वचनों से तुष्ट हो कर, यह अपनी नगरी आया । वहॉं इसने देखा कि, इसके राज्य को किसी दूसरे ने ले लिया है, एवं सभी मानव निम्न विचारधारी एवं प्रवृत्ति के हो गये है । यह देखते ही यह समझ गया कि, कलियुग का प्रारंभ हो गया है । यह अपने नगर को छोड कर हिमालय के बदरिकाश्रम में जा कर तप करने लगा । वहॉं कुछ दिनों तक तपश्चर्यों करने के उपरांत, राजर्षि मुचुकुंद को विष्णुपद की प्राप्ति हुयी [भा.१०.५१];[ विष्णु.५.२];[ ब्रह्म.१९६];[ ह.वं.१.१२.९,२.५७] 
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