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तरणिकुलजलतरणे तरुणतरणितेज...

रामषट्पदी - तरणिकुलजलतरणे तरुणतरणितेज...

श्री राम हा विष्णूचा सातवा अवतार आहे.


श्री गणेशाय नमः ।
तरणिकुलजलतरणे तरुणतरणितेजसा विभातरणे । कृतविदशदशमुखमुखतिमिरगणेऽन्तस्तमो नुद मे ॥१॥
शयविधृतशरशरासन निखिलखलोज्जासनप्रथितसुयशाः । मथितहृदयान्तरालं दुष्कृतिजालं ममापनय ॥२॥
सुरुचिरमरीचिनिचयांश्चरणनखेन्दूनुदाय मम हृदये । हृदयेश विकलतापं स्वसकलतापं किलापहर ॥३॥
इन्दीवरदलसुन्दर वरदलसद्वामजानकीजाने । जाने त्वामखिलेशं लेशलसल्लोकलोकेशम् ॥४॥
शं कुरु शङ्करवल्लभ यल्लभतामाश्वयं त्वदंघ्रियुगे । अनुरक्तिदृढां भक्तिं चिरस्य चिन्ताब्धिभवभक्तिम् ॥५॥
वैराजराजराजोऽप्यभूत्सुसाकेतराजनरराजः । वानरराजसहायो लीलाकैवल्यमेतद्धि ॥६॥
जगदसुसुतासुपरवसुमुदे यदेषा स्तुतिः कृता स्फीता । सा रामषट्पदीयं विलसतु तत्पादजलजाते ॥७॥
॥इति श्रीमन्मालवीयशुक्ल श्रीमन्मथुरानाथप्रणीता रामषट्पदी समाप्ता ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-07-20T11:26:25.2100000

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धृतराष्ट्र

  • n. (सो. कुरु.) दुर्योधन, दुःशासन आदि सौ कौरवों का जन्मांध पिता, एवं महाभारत की अमर व्यक्तिरेखाओं में से एक । अशांत, शंकाकुल एवं द्विधा स्वभाव का अंध एवं अपंग पुरुष मान कर, श्रीव्यास ने ‘महाभारत’ में धृतराष्ट्र का चरित्रचित्रण किया है । अंध व्यक्तिओं में प्रत्यहि दिखनेवाली लाचारी, परावलंबित्त्व एवं प्ररप्रत्येयनेय बुद्धि के साथ, उसका संशयाकुल स्वभाव एवं झूटेपन, इन सारे स्वभावगुणों से धृतराष्ट्र का व्यक्तिमत्त्व ओतप्रोत भरा हुआ था । इस कारण, यद्यपि यह मूह से, ‘पांडव एवं कौरव मेरे लिये एक सरीखे है,’ ऐसा कहता था, फिर भी इसका प्रत्यक्ष, आचरण कौरवों के प्रति सदा पक्षपाती ही रहता था । ‘अपंगत्त्व के कारण मेरा राज्यसुख चला गया मेरे पुत्रों का भी यही हाल न हो,’ यह एक ही चिंता से यह रातदिन तडपता था । इस कारण, वृद्ध एवं अपंग हो कर भी, इसके प्रति अनुकंपा एवं प्रेम नहीं प्रतीत होता है । कुरुवंश का सुविख्यात राजा विचित्रवीर्य का धृतराष्ट्र ‘क्षेत्रज’ पुत्र था । विचित्रवीर्य राजा निपुत्रिक अवस्था में मृत हो गया । तपश्चात कुरुवंश का क्षय न हो, इस हेतु से सत्यवती की आज्ञानुसार, विचित्रवीर्य की पत्नी अंबिका के गर्भ से, व्यास ने इसे उत्पन्न किया । गर्भाधान प्रसंग में व्यास का तेज सहन न हो कर, अंबिका ने ऑखें मूँद ली । इसीलिये धृतराष्ट्र जन्म से अंधा पैदा हुआ [म.आ.१.९८] । हँस नामक गंधर्व के अंश से इसका जन्म हुआ था [म.आ.६१.७-८,९९-१००];[भा.९.२२.२५०]। धृतराष्ट्र का पालनपोषण तथा विद्याभ्यास भीष्म की खास निगरानी में हुआ [म.आ.१०२.१५-१८] । जन्मतः बुद्धिवान होने के कारण, यह शीघ्र ही वेदशास्त्रों में निष्णात हुआ । शिक्षा पूर्ण होने के बाद, भीष्म नें सुबल राजा की कन्या गांधारी से इसका विवाह कर दिया [म.आ.१०३] । गांधारी के सिवा, इसे निम्नलिखित स्त्रियॉं थीः 
  • m  Proper name of the uncle of the पांडव princes. A term for one born blind. 
  • स्वभाव n. धृतराष्ट्र स्वभाव से बडा ही सीधा तथा गुणों का पक्षपाती था । इसके मन में कृष्ण, विदुर आदि के लिये बडा आदर था । किंकर्तव्यमूढ अवस्था में यह विदुर से सलाह प्राप्त करता था । एक दिन, पांडवों के साथ युद्ध टालने के विषय में बातचीत चल रही थी । इतनें में पांडवों से बातचीत कर संजय वापस लौटा । दूसरे दिन राजसभा में वह पांडवों का मनोगत करनेवाला था । धृतराष्ट्र को इस बात का पता लगने पर, यह रात भर सुख की निंदे न सो सका । इसने विदूर को आमंत्रित कर उससे सलाह पूँछी । विदुर ने उचित राजनीति बताकर, युद्ध टालने का उपदेश किया । यह कथाभाग उद्योग पर्वस्थित ‘विदुर नीति’ में काफी विस्तार के साथ दिया गया है । पूरी रात जाग कर, यह विदुर की सलाह लेता रहा । उस कारण, महाभारत के इस पर्व का नाम ‘प्रजागर पर्व’ रखा गया है । शूद्र होने के कारण विदुर को ब्रह्मज्ञान-कथन का अधिकार नहीं था । अतः उसने सनत्सुजात ऋषि के द्वार, धृतराष्ट्र को तत्त्वज्ञान की बाते सुनवायी । अन्त में धृतराष्ट्र ने कहा, ‘यह सब सत्य है, न्याय्य है, उचित है, किन्तु दुर्योधन की उपस्थिति में, मैं अपने मन को सम्हाल नहीं सकता [म.उ.४०.२८-३०] । धृतराष्ट्र के पुत्र---धृतराष्ट्र को गांधारी से कुल सौ पुत्र हुएँ । उन्हे ‘कुरुवंश के’ इस अर्थ से ‘कौरव’ कहते थे । उन सौ कौरवों की नामावलि महाभारत में ही अलग अलग ढंग से दी गयी है । उनमें से तीन नामावलियॉं अकारादि क्रम से नीचे दी गयी हैं । इनमें प्रारंभ में दिया क्रमांक ‘पुत्रक्रम’ का हैः--- [ नामावलि क्र.१:---९०. अनाधृष्य,७६. अनुयायिन्, १३. अनुविंद, ५७. अनूदर, ६५. अपराजित, ८७. अभय, ४२. अयोबाहु, ८६. अलोलुप, ७३. आदित्यकेतु, ८२. उग्र, ६२. उग्रश्रवस्, ६३. उग्रसेन, ५० उग्रायुध, २२. उपचित्र, ३३.उपनंदक, ३०. ऊर्णनाभ, ९७.कनकध्वज, ५२. कनकायु, २०. कण, ७७. कवचिन्, ९८. कुंडाशी, ९१. कुंडभेदिन्, ३६. कुंडोदर, ६४. क्षेममूर्ति, २४. चारुचित्रांगद, २१. चित्र. ९९. चित्रक, ४४. चित्रचाप, ३८७. चित्रबाहु, ३९. चित्रवर्मन, २३, चित्राक्ष,५८. जरासंध, ९. जलसंध, ८०. दंडधार, ७९. दंडिन्पाशी, ९४. दीर्घबाहु, ९३. दीर्घलोचन, ६७. दुराधर, १४. दुर्धर्ष, १८. दुर्मख, २५. दुर्मद, १७. दुर्मर्पण, ६. दुर्मुख, १. दुर्योधन, ४१. दुर्विमोचन, ५. दुःशल, ३. दुःशासन, १९. दुष्कर्ण, १६. दुष्प्रधर्षण, २६. दुष्प्रहर्प, ४. दुःसह, ५५. दृढक्षत्र, ८४. दृढरथ, ५४. दृधवर्मन्, ५९. दृधसंध, ६९. दृधहस्त, ५३. दृधायुध, ८१. धनुर्ग्रह, ३२.नंद, ७५. नागदन्त, ५३. दृधायुध, ८१. धनुर्ग्रह, ३२. नंद, ७५. नागदन्त, ७८. निपंगिन्, ६६. पंडितक, ३१. सुनाभ, ७. अपर, ४८. बलाकिन्, ७४. वह्राशी, ४७. भीमबल, ८३. भीमरथ, ४९. भीम विक्रम (बलवर्धन), ४६. भीमवेग, ५१. भीमशर, ९५. महाबाहु, ४३. महाबाहु, ३७. महोदर, २. युयुत्सु.८८.रौद्रकर्मन, ७१. वातवेग्त, २८. विकट, ९. विकर्ण, १२. बिंद, ९२. विराविन्, २७. विवित्सु ८. विविशति, ६७. विशालाक्ष, ८४. वीर, ८५. वीरबाहु, ९६. व्यूढोरु, ६०. सत्यसंघ, २९.सम,६१. सहस्त्रवाक, ४५. सुकुंडल, १५. सुबाहु,११.सुलोचन, ७२. सुवर्चस्, ४०.सुवर्मन्, ३५. सुषेण, ७०. सुहस्त, ३४.सेनापति, ५६. सोमकीर्ति, १००. दुःशला, (कन्या) तथा, १०१. युयुत्सु (वैश्यापुत्र) [म.आ.६८.परि.१.क्र.४१.] । ] [ नामावलि क्र.२:---७८. अग्रयायिन्, ९१. अनाधृष्य, १०. अनुविंद, ५७. अनूदर, ६७. अपराजित, ८८. अभय, ४०. अयोबाहु ८७. अलोलुप, ७५. आदित्य केतु, ८४. उग्र, ६३. उग्रश्रवस्, ६४. उग्रसेन (अश्व उग्रसेन), ४७. उग्रायुध, २४. उपचित्र, २५. उपनंदक, ३२. ऊर्णनाभ, १००. कनकध्वज, १७. कर्ण, ७९. कवचिन्, ४९,८२ कुंडधार, ९२. कुंडभेदिन्, ६८. कुंडशायिन्, १०१. कुंडाशिन्, ८१. कुंडिन्, ८०. क्रथन, २६. चारुचित्र, २३. चित्र, ४२,९४. चित्रकुंडल, ३६, चित्रबाण, ३७, चित्रवर्मन्, २५. चित्राक्ष, ४१. चित्रांग, ५० चित्रायुध, ५९. जरासंध, ६. जलसंघ. ९८. दीर्घबाहु, ९७. दीर्घरोमन, ७०. दुराधर, ११. दुर्धर्ष, २८. दुर्मद, १४. दूर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १. दुर्योधन, २९. दुर्विगाह, ३९. दुर्विमोचन, ५. दुःशल, ३. दुःशासन, ४. दुःसह, १६. दुष्कर्ण, ६६. दुष्पराजय, १३. दुष्प्रधर्षण, ५५. दृधक्षत्र, ९०. दृढरथाश्रय, ५४. दृधवर्मन्, ५८. दृधसंध, ७१. दृधहस्त, ८३. धनुर्धर, ३४. नंद, ७७.नागदत्त, ५१. निषंगिन्, ५२. पाशिन्, ९५. प्रमथ, ९६. प्रमथिन्, ४६. बलवर्धन, ४५. बलाकिन्, ७६. बह्राशी, ४४. भीमबल, ८५. भीमरथ, ४३. भीमवेग, २. युयुत्सु, ८९. रौद्रकर्मन्, ७३. वातवेग, १३. विकटानन‍, १९. विकर्ण, ९. विंद, १०२. विरजंस्, ९३. विराविन्, ३०. विवित्सु, १८. विविंशति, ६९.विशालाक्ष, ८६. वीरबाहु, ५३. वृंदारक, ९६. व्यूढोरस्, २७. शरासन, ७४. सुवर्चस्, ३८. सुवर्मन्, ६२. सुवाक, २२. सुलोचन्, ७४. सुवर्चस्, ३८. सुवर्मन्, ६२. सुवाक, ४८. सुषेण, ७२. सुहस्त, ६५. सेननी, ५६. सोमकीर्ति, एवं १०३. दुःशला (कन्या) [म.आ.१०७.२-१४] । ] [ नामावलि क्र.३---अनाधृष्टि, अयोभुज, अलंबु, उपनद, करकायु, कुंडक, कुंडभेदिन्, कुंडलिन्, क्राथ, खङ्गिन्, चित्रदर्शन, चित्रसेन चित्रोपचित्र, जयत्सेन, जैत्र, तुहुंड, दीप्तलोचन, दीर्घनेत्र, दुर्जय, दुर्धर, दुर्धपण, दुर्विषह, दुष्प्रधर्ष, दृढ, नंदक, पंडित, बाहुशालिन्, भीम, भीमवेगरव, भूरिबल, मकरध्वज, रवि, वायुवेग, विराज, विरोचन, शत्रुजयं, शत्रुसह, श्रुतवर्मन, श्रुतायु, श्रुतांत, संजय, सुचारु, सुचित्र, सुजात, सुदर्शन, सुलोचन । इनका उल्लेख द्रौपदी स्वयंवर, घोषयात्रा उत्तरगोग्रहण भारतीय युद्ध आदि प्रसंग में आया है [म.आ.१७७];[ म.भी.६०, ७३,७५, ८४];[म. द्रो.१३१, १३२];[म. वि. ३३];[म. क.६२];[ म.श. २५] । ] उपरिनिर्दिष्ट नामावलियों में कुछ नाम बार बार आये हैं । कई जगह समानार्थक दूसरे शब्द का उपयोग किया गया है । इन नामावलि में प्राप्त पुत्रों की कुल संख्या भीं सौ से अधिक है । किंतु उन में से सही नाम कौन से है, इसका निर्णय करने का कुछ भी साधन प्राप्त नहीं है । 
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Category : Hindu - Beliefs
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