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मराठी मुख्य सूची|मराठी साहित्य|अभंग संग्रह आणि पदे|श्रीरंगनाथस्वामीकृत पदसंग्रह|
पदे ४११ ते ४१५

पदसंग्रह - पदे ४११ ते ४१५

रंगनाथ स्वामींचा जन्म शके १५३४ परिघाविसंवत्सर मार्गशीर्ष शुद्ध १० रोजीं झाला.


पदे ४११ ते ४१५
पद ४११. [चाल-न्हाणि न्हाणि त्या निर्मळातें]
देईं इतुलें अंतरिंचें गुज सांगितलें ॥ निगमागमिंचें ह्रद्नत तें तुज मागितलें ॥धृ०॥
कृपावंता विज्ञप्ति परिस अनंता ॥ छेदि अहंता दुर्निवार ममता चिंता ॥
निरवीं संता भगवंता कमलाकांता ॥ भुवनत्रयींचें साम्राज्य न मागें आतां ॥१॥
संकट भारी मानुनियां नेदिसि चारी ॥ तरिएकच देईं विद्वज्जनंसंग मुरारी ॥
दीनवत्सल ते तूं भक्तकाजकैवारी ॥ त्यचेनि विजयी मी षड्वर्गाच्या समरीं ॥२॥
जगदुद्धारीं तव भक्त सुपावन कारी ॥ होसी मत्स्य कूर्म वामन तूं त्यांचे द्वारीं ॥धृ०॥
चित्ता जयाचें निर्मत्सर निर्भय साचें ॥ सदय सदांचे विगताशय अंतर ज्यांचें ॥
पियूष वाचें बोलति त्या सदन शिवाचें ॥ निजरंगें त्या बहिरंतर चित्सुख नाचे ॥३॥
हो जे झालें मी दास तयांचा बोलें ॥ न धरीं पदरीं तुजं अंतरसाक्षी केलें ॥धृ०॥

पद ४१२. [चाल-सदर]
पाहा पाहा श्रीराम नयनीं पाहा ॥ न दिसे ऐसा शोधितां दिशा दाहा ॥
निज ह्रत्कोशीं अनुभवोनि तन्मय राहा ॥ नेणति चारी अष्टादश आणि साहा ॥धृ०॥
सूर्य़वंशीं अज अव्यय जो निष्काम ॥ दशरथ कौसल्योद्भव मुनिमनविश्राम ॥
लीलाविग्रही अवाप्त पूर्णकाम ॥ वशिष्ठ बोले सच्चिदानंद नाम ॥१॥
विधि मुळ आपुलें शोधितां सहस्र वर्षें ॥ मग गजबजिला पातला वरि उत्कर्षें ॥
म्हणे मग पावें तंव वर दिधला हर्षें ॥ तप तप शब्दें तो पावन केला स्पर्षे ॥२॥
मायायोगें जो विवर्तरूपें भासे ॥ तटस्थ स्वरुपें लक्षणें द्वय लक्षांशें ॥
विद्वत्ज्ञानी अनुभविती स्वात्मतोषें ॥ एवंविध तो गुरु शास्त्र आत्मविलासें ॥३॥
अलंकारीं सुवर्ण शोभा दावी ॥ तेवि निजात्मा अवतरला मनुष्यभावीं ॥
महिमा ज्याची कवणासि नाहीं ठावी ॥ शिव ह्रत्कोशीं निजस्वरूप ज्याचें भावी ॥४॥
गमलें विबुधां भवबंदी मोचन झालें ॥ दिनकर भावी वंशासि दैव आलें ॥
वसुधा हर्षे. हो मस्तकिंचें जड गेलें ॥ या निजरंगें त्रैलोक्य सुखी केलें ॥५॥

पद ४१३. [चाल-सदर.]
तंव आकाशीं गर्जति भेरी काहाळा ॥ वर्षती सुमनें सुर जयजयकार झाला ॥धृ०॥
प्रसूतकाळीं कौसल्या एकांतीं ॥ सम्मुख देखे तव दिव्य चतुर्भुज मूर्ति ॥
मंडित आयुधें बालार्कसाद्दश्य दीप्ति ॥ बोले तनयो मी आलों तुझिये भक्ति ॥१॥
हर्षें खेळे अंकावरि बाळकवेषें ॥ वशिष्टा पाहें अंतरिच्या ज्ञानप्रकाशें ॥
जगदुद्धारा हा अवतरला संतोषें ॥ चित्तिं स्मरला वाल्मीकिभाष्य विशेषें ॥२॥
त्रिभुवन विजयी हा होईल बाळक प्रभुचा ॥ चाळक जगतीतळ पाळक ऋषिमंडळिचा ॥धृ०॥
तारिल अहल्या ताटिका मारिल बाणें ॥ कौशिकयज्ञातें रक्षिल क्षात्रत्राणें ॥
त्र्यंबकभंगें सत्कीर्ति होईल तेणें ॥ वरील सीता संतोष जीवप्राणें ॥३॥
पितृवचनातें पाळुनियां जो वनवासी ॥ वानरसेना करुनी जो मित्रत्वेंशीं ॥
शिळा सेतू संपादिल साहाय्यासी ॥ उतरिल कपिसेना चर्या अद्भुत ऐसी ॥४॥
दशमुख वधुनी बिभिषणासि लंका ओपी ॥ आणुनि सीता स्वस्थानीं सुरवर स्थापी ॥
रामराज्यीं निर्द्वंद्व न दिसे पापी ॥ निजसुखरंगें श्रीराम पूर्ण प्रतापी ॥५॥

पद ४१४.
नंद यशोदेचा बाळक तो श्रीहरि वो ॥ पांवा मंजुळ वाजवी तो मो हरि वो ॥
गोपी-गोपाळांचीं मानसें मोहरी वो ॥ तोय तुंबलें कालिंदीच्या उदरीं वो ॥धृ०॥
देहभाव झाला वाव सरली लाज वो ॥ वृत्ति वेधली भुलली गृहकाजा वो ॥
प्राणाचाहि प्राण भाविती यदुराज वो ॥ झालें नाहीं कालत्रयीं ऐसें चोज वो ॥१॥
प्रेमभावें जाती जेथें तो श्रीपति वो ॥ वस्त्रें भूषणें पालटूनि लेती वो ॥
पयपानातें बाळकें न करिती वो ॥ वेणु-गानश्रवणें विचित्न झाली स्थिति वो ॥२॥
व्याळ नकुळेंशीं स्वच्छंदें खेळताहे वो ॥ धेनु व्याघ्रेंशि केसरी गजीं राहे वो ॥
शुकसारिकासमाजीं श्येनु पाहीं वो ॥ कैंचा वैरभाव कृष्णीं तन्मयता वो ॥३॥
इंदु मंदला तो वेग वायो टाकी वो ॥ शेष डोले कूर्म आंगीं पाय ओढी वो ॥
भानु थोकला आश्वर्य त्नैलोकीं वो ॥ गोवळ नाचे छंदें गर्जे तोडर वांकी वो ॥४॥
बोले शेषहि नेणव याचा पार वो ॥ लीलाविग्रही घेतला अवतार वो ॥
जाणती साधु सज्जन नेणती भूमीभार वो ॥ निजानंद रंगला श्रुतीसार वो ॥५॥

पद ४१५. [चाल-बोलणें फोल झालें डोलणें०]
देहीं मी माझे वैरी यांतें शीघ्र मारीं ॥धृ०॥
दुर्जय संपदा आसुरी शोक मोह दंती भारी ॥ राग द्वेष सुह्रद यांचे साहाकारी ॥१॥
इच्छा माता चिंता कांता लोभ पाठीराखा भ्राता ॥ आशा तृष्णा विलासिनी या कुमारी ॥२॥
लक्ष कोटि जन्मवरी न सुटती दुष्ट वैरी ॥ दानवां मानवां खेदकारी ॥३॥
उपाय हा एक यातें साधुसंगें शास्त्रमतें ॥ जाणिजे मी कोण येथें देहधारी ॥४॥
जरी गुरुकृपा होय तरि हे सांपडे सोय ॥ जीव हा रंगुनि जाय ईश्वरीं ॥५॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2016-11-11T12:52:18.5000000

Comments | अभिप्राय

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वामदेव (गोतम)

  • n. एक आचार्य एवं वैदिक सूक्तद्रष्टा, जिसे अपनी माता के गर्भ में ही आत्मानुभूति प्राप्त हुई थी । ऋग्वेद के प्रायः समग्र चौथे मंडल का यह प्रणयिता कहा जाता है । इस मंडल के केवल ४२-४४ सूक्तों का प्रणयन त्रसदस्यु, पुरुमीह्ळ एवं अजमीह्ळ के द्वारा किया गया है; बाकी सारे सूक्त वामदेव के द्वारा प्रणीत ही है । किन्तु इस मण्डल में केवल एक ही स्थान पर इसका प्रत्यक्ष निर्देश प्राप्त है [ऋ. ४.१६.१८] । अन्य वैदिक ग्रंथों में भी इसे ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल का प्रणयिता कहा गया है [का. सं. १०.५];[ मै सं. २.१.१३];[ ऐ.आ. २.२.१] 
  • जन्म n. वैदिक ग्रंथ में इसे सर्वत्र गोतम ऋषि का पुत्र कहा गया है [ऋ. ४.४.११] । इसी कारण यह स्वयं को ‘गोतम’ कहलाता था । इसके जन्म के संबंधी अस्पष्ट विवरण वैदिक साहित्य में प्राप्त है [ऋ. ४.१८, २६.१];[ ऐ. आ. २.५] । अपने जन्म के संबंधी ज्ञान इसे माता के गर्भ में ही प्राप्त हुआ था । तब इसने सोचा कि, अन्य लोगों के समान मेरा जन्म न हो। इसी कारण इसने इपनी माता का उदर विदीर्ण कर बाहर आने का निश्र्चय किया । इसकी माता को यह बात ज्ञात होते ही, उसने अदिति का ध्यान किया। उस समय इंद्र के साथ अदिति वहॉं उपस्थित हुई, जहॉं गर्भ से ही इसने इंद्र के साथ तत्त्वज्ञान के संबंधी चर्चा की [ऋ. ४.१८]; वेदार्थदीपिका । ऋग्वेद में अन्यत्र वर्णन है कि, योगसामर्थ्य से श्येन पक्षी का रूप धारण कर, यह अपनी माता के उदर से बाहर आया [ऋ. ४.२७.१] । ऐतरेय उपनिषद के अनुसार, इसके जन्म के पूर्व इसे अनेकानेक लोह के कारगार में बंद करने का प्रयत्न किया गया, जिन्हे तोड़ कर यह श्येन पक्षी की भॉंति पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ [ऐ उ. ४.५] । वामदेव के जन्म के संबंधी सारी कथाएँ रुपात्मक प्रतीत होती है, जहॉं गर्भवास को कारागृह कहां गया है । 
  • संबंधित व्यक्ति n. ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के अधिकांश सूक्तों में सुदास, दिवोदास, सृंजय, अतिथिग्व, कुत्स आदि राजाओं कां निर्देश प्राप्त है, जिससे प्रतीत होता है कि, इसका इन राजाओं से घनिष्ठ संबंध था । बृहद्देवता में इंद्र एवं वामदेव के संबंध में कई असंगत कथाओं का निर्देश प्राप्त है, जिनका सही अर्थ समझ में नही आता है । एक बार जब यह कुत्ते की अँतडियॉं पका रहा था, तो इंद्र एक श्येनपक्षी के रुप में इसके सम्मुख प्रकट हुआ था [बृहद्दे. ४.१.२६] । इसी ग्रंथ में प्राप्त अन्य कथा के अनुसार, इसने इंद्र को परास्त कर अन्य ऋषियों को उसका विक्रय किया था [बृहद्दे. ४.१३१] । सीग ने बृहद्देवता में प्राप्त इन कथाओं को ऋग्वेद में प्राप्त इसकी जन्मकथाओं से मिलाने का प्रयत्न किया है [सीग, सा. ऋ. ७६] 
  • तत्त्वज्ञान n. पुनर्जन्म के संबंध में विचार करनेवाले तत्वज्ञों में वामदेव सर्वश्रेष्ठ माना जाता है । मनु एवं सूर्य नामक अपने दो पूर्वजन्म इसे ज्ञात हुए थे, एवं माता के गर्भ में स्थित अवस्था में ही इसे सारे देवों के भी पूर्वजन्म ज्ञात हुए थे । पुनर्जन्म के संबंधी वामदेव का तत्त्वज्ञान ‘जन्मत्रयी’ नाम से सुविख्यात है, जिसके अनुसार हर एक मनुष्य के तीन जन्म होते हैः---पहला जन्म, जब पिता के शुक्र जंतु का माता के शोणित द्रव्य से संगम होता है; दुसरा जन्म, जब माता की योनि से बालक का जन्म होता है; तीसरा जन्म जब मृत्यु के बाद मनुष्य को नया जन्म प्राप्त होता है । अमरत्व प्राप्त करने की इच्छा करनेवाले साधकों के लिए, वामदेव का यह तत्त्वज्ञान प्रमाणभूत माना जाता है । 
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