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विधी

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  • पूजा एवं विधी
    ईश्वर की कॄपा तथा दया प्राप्त करनेके लिए नित्य पूजा विधी करनी चाहिये, क्योंकी पूजा का अध्यात्म तथा धर्म से गहरा संबंध है । 
  • नित्यकर्म-विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - कर दर्शन
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - प्रात:स्मरण
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - वेदोक्त प्रातःस्मरण सूक्त
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - स्नान की विधि
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - सन्ध्योपासन विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - तर्पण विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - सूर्योपस्थान
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - समर्पण
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - नित्य होम विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - बलिवैश्वदेव विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - ब्रह्मयज्ञ विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - संक्षिप्त भोजन विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - शिवपूजनविधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - विष्णु पूजन विधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - राम पूजनविधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - हनुमत्पूजनविधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - दुर्गापूजनविधि:
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
  • विधीः - श्रीविष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्
    जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान, पूजा, संध्या, देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।
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साव

  • वि. सर्व ; अवघा . मरावें मारावें या आलें प्रसंगा । बरें पांडुरंगा कळलें सावें । - तुगा ४०८२ . [ सं . सर्व ; प्रा . सव्वं - साव ] 
  • स्त्री. १ नाडी ; शीर ; स्नायु ( क्रि० चढणें , फुगणें , शेकणें , उतरणें , दुखणें ). अनेकवचनी उपयोग ; जसें - सावा ओढतात - ताणतात - तुटतात इ० . घडिघडि बहु बाई वोढती सर्व सांवा । - सारुह ३ . ७५ . २ बकरा , इ० कांच्या आंतडयाचा लांब तंतू . तांत , शिरा , नाडी पहा . [ सं . स्नायु ] 
  • पु. १ सावकार ; पेढीवाला . होय व्याकुळ जळतां सर्वस्व वही मनांत साव जसा । - मोआश्रम ५ . ९२ . २ श्रीमंत ; भरभराट असलेला व्यापारी , धंदेवाला . ३ प्रामाणिक , पतीचा माणूस . याच्या उलट चोर , ठक , इ० . तुका म्हणे चोरटाचि झाला साव । सहज न्याय नाहीं तेथें । - तुगा ३७० . [ सं . साधु ; प्रा . साहु - साहव ] 
  • ०जी पु. ( आदरार्थी ) सावकार ; शेठजी . बहुत सावजी , क्रोधयुक्त प्याद्याचा फर्जी । - देवनाथ कटिबंध ६ . 
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