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मनु (आदिपुरुष)

  • n. मनवसृष्टि का प्रवर्तक आदिपुरुष, जो समस्त मानवजाति का पिता माना जाता है [ऋ.१.८०.१६,११४.२, २.३३.१३, ८.६३.१];[ अ. वे.१४.२.४१];[ तै. सं.२.१.५.६] । कई अभ्यासकों के अनुसार मनु वैवस्वत तथा यह दोनों एक ही व्यक्ति थे (मनु वैवस्वत देखिये) । ऋग्वेद में प्रायः बीस बार मनु का निर्देश व्यक्तिवाचक नाम से किया गया है । वहॉं सर्वत इसे ‘आदिपुरुष’ एवं मानव जाति का पिता, तथा यज्ञ एवं तत्संबंधित विषयों का मार्गदर्शक माना गया है । मनु के द्वारा बताये गये मार्ग से ले जाने की प्रार्थना वेदों में प्राप्त है [ऋ.८.३०.१] 
  • मानवजाति का पिता n. ऋग्वेद में पांच बार इसे पिता एवं दो बार निश्चित रुप से ‘हमारे पिता’ कहा गया है [ऋ.२.३३] । तैत्तिरीय संहिता में मानवजाति को ‘मनु की प्रजा’ (मानव्यःप्रजाः) कहा गया है [तै. सं. १.५.१.३] । वैदिक साहित्य में मनु को विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं इसे ‘वैवस्वत’ पैतृक नाम दिया गया है [अ.वे.८.१०];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यास्क के अनुसार, विवस्वत् का अर्थ सूर्य होता है, इस प्रकार यह आदिपुरुष सूर्य का पुत्र था [नि.१२.१०] । यास्क इसे सामान्य व्यक्ति न मानकर दिव्यक्षेत्र का दिव्य प्राणी मानते है [नि.१२.३४] । वैदिक साहित्य में यम को भी विवस्वत् का पुत्र माना गया है, एवं कई स्थानो पर उसे भी मरणशील मनुष्यों में प्रथम माना गया है । इससे प्रतीत होता है कि, वैदिक काल के प्रारम्भ में मनु एवं यम का अस्तित्व अभिन्न था, किन्तु उत्तरकालीन वैदिक साहित्य में मनु को जीवित मनुष्यों का एवं यम को दूसरे लोक में मृत मनुष्यों का आदिपुरुष माना गया । इसीलिए शतपथ ब्राह्मण में मनु वैवस्वत को मनुष्यों के शासक के रुप में, तथ यम वैवस्वत को मृत पितरों के शासक के रुप मे वर्णन किया गया है [ऋ.८.५२.१];[ श.ब्रा.१३.४.३] । यह मनु सम्भवतः केवल आर्यो के ही पूर्वज के रुप में माना गया है, क्योंकि अनेक स्थलों पर इसका अनार्यो के पूर्वज द्यौः से विभेद किया है । 
  • यज्ञसंस्था का आरंभकर्ता n. -मनु ही यज्ञप्रभा का आरंभकर्ता था, इसीसे इसे विश्व का प्रथम यज्ञकर्ता माना जाता है [ऋ.१०.६३.७];[ तै. सं.१.५.१.३,२.५.९.१,६.७.१,३.३.२.१,५.४.१०.५,६.६.६.१,७.५.१५.३] । ऋग्वेद के अनुसार, विश्व में अग्नि प्रज्वलित करने के बाद सात पुरोहितों के साथ इसने ही सर्वप्रथम देवों को हवि समर्पित की थी [ऋ.१०.६३] 
  • यज्ञ से ऐश्वर्यप्राप्ति n. तैत्तिरीय संहिता में मनु के द्वारा किये गये यज्ञ के उपरांत उसके ऐश्वर्य के प्राप्त होने की कथा प्राप्त है । देव-दैत्यों के बीच चल रहे युद्ध की विभीषिका से अपने धन की सुरक्षा करने के लिए देवों ने उसे अग्नि को दे दिया । बाद को अग्नि के हृदय में लोभ उत्पन्न हुआ, एवं वह देवों के समस्त धनसम्पत्ति को लेकर भागने लगा । देवों ने उसका पीछा किया, एवंउसे कष्ट देकर विवश किया कि, वह उनकी अमानत को वापस करे । देवों द्वारा मिले हुए कष्टों से पीडित होकर अग्नि रुदन करने लगा, इसी से उसे ‘रुद्र’ नाम प्राप्त हुआ । उस समय सुअके नेत्रों से जो आसूँ गिरे उसीसे चॉंदी निर्माण हुयी, इसी लिए चॉंदी दानकर्म में वर्जित है। अन्त में अग्नि ने देखा कि, देव अपनी धनसम्पत्ति को वापस लिए जा रहे हैं, तब उसने उनसे कुछ भाग देने की प्रार्थना की । तब देवों ने अग्नि को ‘पुनराधान’ (यज्ञकर्मों में स्थान) दिया ।आगे चलकर मनु, पूषन्, त्वष्टु एवं धतृ इत्यादि ने यज्ञकर्म कर के ऐश्वर्य प्राप्त किया [तै.सं.१.५.१] । मनु ने भी लोगों के प्रकाशहेतु अग्नि की स्थापना की थी [ऋ.१.३६] । मनु का यज्ञ वर्तमान यज्ञ का ही प्रारंभक है, क्यों कि, इसके बाद जो भी यज्ञ किये गये, उन में इसके द्वारा दिये गये विधानोम को ही आधार मान कर देवों को हवि समर्पित की गयी [ऋ.१.७६.] । इस प्रकार की तुलनाओं को अक्सर क्रियाविशेषण शब्द ‘मनुष्वत्’ (मनुओं की भॉंति) द्वारा व्यक्ति किया गया है। यज्ञकर्ता भी अग्नि को उसी प्रकार यज्ञ का साधन बनाते हैं, जिस प्रकार मनुओं ने बनाया था [ऋ.१.४४] वे मनुओं की ई भॉंति अग्नि को प्रज्वलित करते हैं, तथा उसीकी भॉंति सोम अर्पित करते हैं [ऋ.७.२.४.३७] । सोम से उसी प्रकार प्रवाहित होने की स्तुति की गयी है, जैसे वह किसी समय मनु के लिए प्रवाहित होता था [ऋ.९.९६] 
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Category : Hindu - Literature
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