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हवन कर्मपूजा ( होम )

पूजा विधे - हवन कर्मपूजा ( होम )

जो मनुष्य प्राणी श्रद्धा भक्तिसे जीवनके अंतपर्यंत प्रतिदिन स्नान , पूजा , संध्या , देवपूजन आदि नित्यकर्म करता है वह निःसंदेह स्वर्गलोक प्राप्त करता है ।


हवन कर्मपूजा ( होम )

संकल्प

पूर्वोक्त गुण विशेषण विशिष्टायां शुभ पुण्य तिथौ अमुक कर्मणि ( हवन कर्मणि ) अग्निस्थापनमहं करिष्ये ।

प्रार्थना

ये च कुण्डे स्थिता देवा कुण्डाङ्गे याश्च देवता : ।

ऋद्धि यच्छतु ते सर्वे यज्ञसिद्धिं मुदान्विता : ॥

हे कुण्ड तव रूपं तु रचितं विश्व कर्मणा : ।

अस्माकं वांछितां सिद्धि यज्ञ सिद्धि ददस्व च ॥

कुशकांडिकाकरणम्

पंचगव्येन शुद्धायां भूमौ दर्भे : परिसमूहनम्

नोट :- पहले वेदी को कुशाओं से बुहारा देकर साफ करें ।

हस्तमात्र - परिमितां चतुरस्त्रां भूमिं कुशै परिसमूह्य तानैशान्यां परित्यज्य ( उन कुशाओं को ईशान में त्याग दे ) गोमयेनोपलिप्य ( वेदी को गोबर से लीपें )

स्त्रुवमूलेन प्राङ्गमुखं प्रादेश मात्रं उत्तरोत्तर - क्रमेण त्रिरुल्लिख्य उल्लेखन क्रमेण नामिकांगुष्ठाभ्यां मृदुमुद्‌धृत्य ऐशान्यां दशि पक्षिपेत् । तत उदकेन अभ्युक्षणम् ।

अब श्रुवे के मूल से उस पर पश्चिम से पूर्व की तरफ तीन रेखा खींच दें । अनामिका और अंगुष्ठ से उन रेखाओं की कुछ - कुछ मिट्टी उठाकर ईशान कोण में फेंक दें । इसके बाद वेदी पर जल सींच दें ।

एते पंच भू संस्कारा यत्र यत्राग्नि स्थापनं तत्र तत्र क्रियन्ते ।

ये पांचों भूसंस्कार जहाँ - जहाँ अग्नि स्थापना हो वहाँ - वहाँ करने चाहिये ।

अथाग्नि स्थापनम्

वामहस्तानामिकया भूमिं स्पृशन् ताम्रपात्रेण ( कांस्यपात्रेण वा ) आहृतमग्निं स्वाभिमुखं निद्‌ध्यात् । तद्रक्षार्थ कंचिन्नियुज्य आनीताग्नि पात्रे अक्षतादि प्रक्षेप : ।

अग्नि को स्थापित कर यह मंत्र बोलें -

ॐ अग्निं दूतं पुरादेधे हव्यावाहमुपब्रुवेदेवां२ऽआसादयादिह ॥ इति मन्त्रं पठन् कुण्डे स्वात्माभिमुखं अग्निं स्थापयेत् ।

ततोऽग्नौ आवाहनादिमुद्रा : प्रदर्शयेत् । भो अग्ने त्वं आवाहितो भव । भो अग्ने त्वं सन्निहितोभव । भो अग्ने त्वं सन्निरुद्धो भव ।

भो अग्नेत्वं सकली कृतो भव । भो अग्ने त्वं अवगुष्ठितो भव । भो अग्ने त्वम् अमृतीकृतोभव । भो अग्ने त्वं परमीकृतो भव ॥

अग्निंध्यायेत्

ॐ चत्वारिशृङ्गास्त्रयोऽअस्य पादा द्धे शीर्षे सप्प्तहस्ता सोऽअस्य ।

त्रिधावद्धोन्व्वृषभोरोरवीति महोदेवोमँर्त्त्या २ऽअविवेश ॥

रुद्रतेज : समुद्भूतं द्विमूर्धान द्विनासिकम् ॥ षष्णेत्रं च चतु : श्रोतं त्रिपादं सप्तहस्तकम् । याम्यभागे चतुर्हस्तं सव्यभागे त्रिहस्तकम् ॥

स्त्रुवं स्त्रुचञ्च शक्तिञ्च ह्यक्षमालाञ्च दक्षिणे । तोमरं व्यजनं चैव घृतपात्रञ्च वामके । ब्रिभ्रतं सप्तभिर्हस्तैद्विमुखं सप्तजिह्वकम् ॥

याम्यायने चतुर्जिह्वं त्रिजिह्वं चोत्तरे मुखम् । द्वादश कोटिम् र्त्याख्यं द्विपञ्चाशत्कलायुतम् । आत्माभिमुखमासीनं ध्यायेच्चैवं हुताशनम् ॥

प्रतिष्ठा

ॐ मनोजूतिर्ज्जुषतामाज्जस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु । विश्वेदेवास ऽइहमादयन्तामो ३ प्रतिष्ठ : । ॐ शतमङ्गल नामान्गे सुप्रतिष्ठितो वरदो भव । इति प्रतिष्ठाप्य पूजनं कुर्यात् । ॐ भूर्भुव : स्व : शतमङ्गलनाम्ने वैश्वानराय नम : सर्वोपचारार्थ गन्धाक्षतपुष्पाणि सर्मपयामि ।

अग्निंप्रार्थयेत्

अग्निं प्रज्वलितं वन्दे जातवेदं हुताशम् । हिरण्यवर्णममलं समिद्धं विश्वतोमुखम् ॥

इसके बाद कुशा का ब्रह्मा बनाकर स्थापित करके पूजा करें ।

ॐ ब्रतेन दीक्षामाप्नोति दीक्षयाप्नोति दक्षिणाम् । तया च श्रद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्य माप्यते ।

इति प्रतिवचन मुक्त्वा ऽग्नेर्दक्षिणत : कल्पितासन उपविशेत । उवेशयेद्धा ।

इस प्रकार अग्नि के दक्षिण में कल्पित आसन ब्रह्मा जी को विराजमान करके षोडशोपचार पूजन करें ।

इसके बाद उत्तर दिशा में प्रणीता प्रोक्षणी रखें ।

अथ त्रिभि : पवित्रच्छेदन कुशैद्वे पवित्रे छित्वा सपवित्रकरेण प्रणीतोदकं त्रि : प्रोक्षणीपात्रे निधाय ( पश्चात् ) प्रोक्षणी पात्र वामहस्ते धृत्वा दक्षिण हस्तानामिकांगुष्ठाभ्यां पवित्रं गृहीत्वा त्रिरुत्पवनम् ।

अब तीन पवित्र छेदन कुशाओं से दो पवित्रियों को ( ३ ) तीन आंटे देकर कांटकर फैक दें यानि तीन को त्याग दे । दो ( २ ) को ग्रहण कर लें । इन पवित्रे को हाथ से प्रणीताका जल ( ३ ) बार प्रोक्षणी में डालें ।

फिर प्रोक्षणी पात्र को बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ में अनामिका अंगुष्ठ से पवित्र पकड कर प्रोक्षण के जल को ३ ( तीन ) बार ऊपर उछालें ।

तत : प्रोक्षणीपात्रं आकाशस्य प्रणीतोदकेनापूरयेत् । भूमौ पतितं चेत्तदा प्रायश्चित्तं गोदानम् ॥

फिर प्रोक्षणी के जल में रखी हुई सारी सामग्री के छीटें देवें और अग्नि तथा प्रणीता के बीच में प्रोक्षणी को रख देवें ।

पश्चात् सिद्धेचरौ ज्वलतृणादि आज्योपरि भ्रामयित्वा वह्नो तत्प्रक्षेप : ।

पीछे जलते हुए तृणादि को आज्य पर घुमाकर अग्नि में डाल देवें ।

तत : स्त्रुव : प्रतपनं कृत्वा सम्मानर्जनकुशै : त्रि ; स्त्रुवमार्जनं , मूलेन मूलं मध्येन मध्यं आग्रेणाग्रम् । पुन : परितप्य स्त्रुव दक्षिणतो निद्‌ध्यात् ।

फिर स्त्रुवे को तपाकर सम्मार्जन कुशाओं के मूल से मूल को मध्य से मध्य को तथा अग्रभाग से अग्रभाग को साफ कर फिर तपाकर दाहिनी तरफ रख दें ।

एवमेव आज्यप्रतपनं उत्पवनं कृत्वा तदवेक्षणम् अपद्रव्यनिरसनञ्च ।

फिर घी को उतार कर उत्पवन करके देख ले कोई अपद्रव्य हो तो निकाल दें ।

तब उत्थाय उपयमन कुशानादाय वामहस्ते घृत्वा अग्निपर्युक्षणं कृत्वा उत्तिष्ठन् मनसा प्रजापतिं ध्यात्वा तूष्णीमग्नौ घृताक्ता : समिधस्तिस्त्र : क्षिपेत् ।

फिर उपयमन कुशाओं को बायें हाथ में लेकर , दाहिने हाथ में उपरोक्त तीनों समिधा लेकर , उन्हें घी में भिगोकर खडे होकर ब्रह्माजी का मन में ध्यान करके चुपचाप अग्नि में छोडे दें ।

ततं उपविश्य सपवित्र प्रोक्षण्युदकेन अग्निं पर्युक्ष्य पवित्रे प्रणीता पात्रे निधाय पातितदक्षिण जानु : कुशेन ब्रह्मणा ऽन्वारब्ध समिद्धतमेऽग्नौ स्त्रुवेण आज्याहुतिं जुहुयात् ।

फिर बैठकर पवित्र सहित प्रोक्षणी जल अग्नि के चौतरफ डाल दें । पवित्र को प्रणीता पात्र में रख दें । पीछे दाहिनी जंघा को नवाकर डाभ से ब्रह्मा को स्पर्श कर लें ब्रह्मा से मोली यजमान तक रख दें । और स्त्रुवे से अग्नि में घी की आहुति दें ।

आहुति चतुष्टये स्त्रुवावशिष्ट घृतस्य प्रोक्षणी पात्रे प्रक्षेप : ।

अग्रे यथा दैवतं चतुर्थ्यन्तं स्वाहान्तं नममेति त्यागं च कुर्यात्

प्रथम चार ( ४ ) आहुतियों स्त्रुवे के अवशिष्ट घृत को प्रोक्षणी पात्र में त्यागता जावे । स्वाहा : बोलकर होम : व न मम : से त्याग करें ।

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Last Updated : May 24, 2018

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