हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|अनुवादीत साहित्य|श्रीनरसिंहपुराण|
अध्याय ४३

श्रीनरसिंहपुराण - अध्याय ४३

अन्य पुराणोंकी तरह श्रीनरसिंहपुराण भी भगवान् श्रीवेदव्यासरचित ही माना जाता है ।


मार्कण्डेयजी बोले - तदनन्तर सकल शास्त्राके ज्ञाता प्रह्लादजी गुरुके घरमें रहकर भी अपने पवित्र मनको भगवान् विष्णुमें लगाये रहनेके कारण सम्पूर्ण जगतको नारायणका स्वरुप समझकर बाह्य - लौकिक कर्मोंमें जडकी भाँति व्यवहार करते हुए विचरते थे । एक दिन, उनके साथ ही गुरुकुलमें निवास करनेवाले छात्र - बालक पाठ - श्रवण बंद करके, एकत्र हो, प्रसादसे कहने लगे - ' राजकुमार ! अहो ! आपका चरित्र बड़ा ही विचित्र हैं; क्योंकि आपने विषय - भोगोंका लोभ त्याग दिया है । प्रिय ! आप अपने हदयमें किसी अनिर्वचनीय वस्तुका चिन्तन करके सदा पुलकित रहते हैं । यदि वह वस्तु छिपानेयोग्य न हो तो हमें भी बताइये ' ॥१ - २॥

नृप ! प्रह्लादजी सबपर स्नेह करनेवाले थे, अतः इस प्रकार पूछते हुए मन्त्रिकुमारोंसे वे यों बोले - '' हे दैत्यपुत्रो ! एकमात्र भगवानमें अनुराग रखनेवाला मैं तुम्हरे पूछनेपर जो कुछ भी बता रहा हूँ, उसे तुमलोग प्रसन्नचित्त होकर सुनो । यह जो धन, जन और स्त्री - विलास आदिसे अत्यन्त रमणीय प्रतीत होनेवाला सांसारिक वैभव दृष्टिगोचर हो रहा है, इसपर विचार करो । क्या यह लोक - वैभव विद्वानोंके सेवन करने योग्य है या जल्दी - जल्दी दूरसे ही त्याग देनेयोग्य ? अहो ! जिनके अङ्ग गर्भाशयमें टेढ़े - मेढ़े पड़े हैं, जो जठरानलकी ज्वालासे संतप्त हो रहे हैं तथा जिन्हें अपने अनेक पूर्वजन्मोंका स्मरण हो रहा है, वे माताके गर्भमें पड़े हुए जीव जिस महान् कष्टका अनुभव करते हैं, पहले उसपर तो विचार करो ॥३ - ५॥

' गर्भमें पड़ा हुआ दुःखी जीव कहता है - ' हाय ! कारागारमें बँधे हुए चोरकी भाँति मैं विष्ठा, कृमियों और मूत्रसे भरे हुए इस [ देहरुपी ] घरमें जरायु ( झिल्ली ) - से बँधा पड़ा हूँ । मैंने जो एक बार भी भगवान् मुकुन्दके चरणारविन्दोंका स्मरण नहीं किया, उसीके कारण होनेवाले कष्टको आज मैं इस गर्भमें भोग रहा हूँ ।' अतः गर्भमें सोनेवाले जीवको बचपन, जवानी और बुढ़ापेमें भी सुख नहीं है । दैत्यकुमारो ! जब इस प्रकार यह संसार सदा दुःखमय है, तब विज्ञ पुरुष इसका सेवन कैसे कर सकते हैं ? इस तरह इस संसारमें ढूँढ़नेपर हमें सुखका लेशमात्र भी दिखायी नहीं देता । हम जैसे - जैसे इसपर ठीक विचार करते हैं, वैसे - ही - वैसे इस जगतको अत्यन्त दुःखमय समझते हैं । इसलिये ऊपरसे सुन्दर दिखायी देनेवाले इस दुःखपूर्ण संसारमें साधु पुरुष आसक्त नहीं होते । जो तत्त्वज्ञानसे रहित अत्यन्त मूढ़ लोग हैं, वे ही देखनेमें सुन्दर दीपकपर गिरकर नष्ट होनेवाले पतंगोंकी भाँति सांसारिक भोगोंमें आसक्त होते हैं । यदि सुखके लिये कोई दूसरा सहारा न होता, तब तो सुखमय - से प्रतीत होनेवाले इस जगतमें आसक्त होना उचित था - जैसे अन्न न पानेके कारण जो अत्यन्त दुबले हो रहे हैं, उनके लिये खली - भूसी आदि खा लेना ठीक हो सकता है; परंतु भगवान् लक्ष्मीपतीके युगल चरणारविन्दोंकी सेवासे प्राप्त होनेवाला आदि, अविनाशी, अजन्मा एवं नित्य सुख ( परमात्मा ) तो है ही, फिर इस क्षणिक संसारका आश्रय क्यों लिया जाय ? ॥६ - १०॥

'' जो बिना कष्टके ही प्राप्त होनेयोग्य इस महान् सुख ( परमेश्वर ) - को त्यागकर अन्य तुच्छ सुखोंकी इच्छा करता है, वह दीनहदय मूर्ख पुरुष मानो हाथमें आये हुए अपने राज्यको त्यागकर भीख माँगता है । भगवान् लक्ष्मीपतिके युगल - चरणारविन्दोंका यथार्थ पूजन वस्त्र, धन और परिश्रमसे नहीं होता; किंतु मनुष्य यदि अनन्यचित्त होकर ' केशव ', ' माधव ' आदि भगवन्नामोंका उच्चारण करे तो वही उनकी वास्तविक पूजा है । दैत्यकुमारो ! इस प्रकार संसारको दुःखमय जानकर भगवानका ही भलीभाँति भजन करो । इस प्रकार करनेसे ही मनुष्यका जन्म सफल हो सकता है; नहीं तो ( भगवद्भजन न करनेके कारण ) अज्ञानी पुरुष भवसागरमें ही नीचेसे और नीचे स्तरमें ही गिरता रहता है । इसलिये इस संसारमें समस्त कामनाओंसे रहित हो तुम सभी लोग अपने हदयके भीतर विराजमान शङ्ख - चक्र - गदाधारी, वरदाता, अविनाशी स्तवनीय भगवान् मुकुन्दका सच्चे भक्तिभावसे सदा चिन्तन करो । भवसागरमें पड़े हुए दैत्यपुत्रो ! तुम लोग नास्तिक नहीं हो, इसलिये दयावश मैं तुमसे यह गोपनीय बात बतलाता हूँ - समस्त प्राणियोंके प्रति मित्रभाव रखो; क्योंकि सबके भीतर भगवान् विष्णु ही विराजमान हैं '' ॥११ - १५॥

दैत्यपुत्र बोले - महाबुद्धिमान् प्रह्लादजी ! बचपनसे लेकर आजतक आप और हम भी शण्डामर्कके सिवा दूसरे किसी गुरु तथा मित्रको नहीं जान सके । फिर आपने यह ज्ञान कहाँ सीखा ? हमसे पर्दा न रखकर सच्ची बात बताइये ॥१६ १/२॥

प्रह्लादजी बोले - कहते हैं, जिस समय मेरे पिताजी तपस्या करनेके लिये महान् वनमें चले गये, उसी समय इन्द्रने यहाँ आकर पिता दैत्यराज हिरण्यकशिपुको मरा हुआ समझकर उनके इस नगरको घेर लिया । इन्द्र कामाग्निसे पीड़ित हो मेरी महाभागा माताजीको पकड़कर यहाँसे चल दिये । वे मार्गमें बड़ी तेजीसे पैर बढ़ाते हुए चले जा रहे थे । इसी समय देवदर्शन नारदजी मुझे माताके गर्भमें स्थित जान सहसा वहाँ पहुँचे और चिल्लाकर इन्द्रसे बोले - ' मूर्ख ! इस पतिव्रताको छोड़ दो । इसके गर्भमें जो बालक है, वह भगवद्भक्तोंमें श्रेष्ठ है ।' नारदजीका कथन सुनकर इन्द्रने विष्णुभक्तिके कारण मेरी माताको प्रणाम करके छोड़ दिया और वे अपने लोकको चले गये । फिर शुभ सङ्कल्पवाले नारदजी मेरी माताक्लो अपने आश्रममें ले आये और मेरे उद्देश्यसे मेरी महाभागा माताके प्रति इस पूर्वोक्त ज्ञानका वर्णन किया । दानवो ! बाल्यकालके अभ्यास, भगवानकी कृपा तथा नारदजीका उपदेश होनेसे वह ज्ञान मुझे भूला नहीं है ॥१७ - २३ १/२॥

मार्कण्डेयजी बोले - एक दिन राक्षसराज हिरण्यकशिपु रात्रिके समय गुप्तरुपसे नगरमें घूम रहा था । उस समय उसे ' जय राम ' का कीर्तन सुनायी देने लगा । तब बलवान् दानवराजने यह सब अपने पुत्रकी ही करतूत समझी । तब उस दैत्यराजने क्रोधान्ध होकर पुरोहितोंको बुलाया और कहा - ' नीच ब्राह्मणो ! जान पड़ता है, तुमलोग मरनेके लिये अत्याधिक उत्सुक हो गये हो । तुम्हारे देखते - देखते यह प्रह्लाद स्वयं तो व्यर्थकी बातें बकता ही है, दूसरोंको भी यही सिखाता है ।' इस प्रकार उन ब्राह्मणोंको फटकारकर राजा हिरण्यकशिपु लम्बी साँसें खींचता हुआ घरमें आया । उस समय भी वह पुत्रवधके विषयमें होनेवाली चिन्ताको, जो उसका ही नाश करनेवाली थी, नहीं छोड़ सका । उसकी मृत्यु निकट थी; अतः उसने अमर्षवश एक ऐसा काम सोचा, जो वास्तवमें न करने योग्य ही था । हिरण्यकशिपुने दैत्यादिकोंको बुलाया और उनसे एकान्तमें कहा - ' देखो, आज रातमें प्रह्लाद जब गाढ़ी नींदमें सो जाय, उस समय उस दुष्टको भयंकर नागपाशोंद्वारा खूब कसकर बाँध दो और बीच समुद्रमें फेंक आओ ' ॥२४ - २९ १/२॥

उसकी आज्ञा शिरोधार्य करके उन दैत्योंने प्रह्लादजीके पास जाकर उन्हें देखा । वे रात्रिके ही प्रेमी थे ( क्योंकि रातमें ही उन्हें ध्यान लगानेकी सुविधा रहती थी ) । प्रह्लादजी समाधिमें स्थित होकर जाग रहे थे, फिर भी खूब सोये हुएके समान स्थित थे । उन्होंने राग और लोभ आदिके महान् बन्धनोंको काट डाला था, तो भी उन महात्मा प्रह्लादकी निशाचरोंने तुच्छ नागपाशोंसे बाँध दिया । जिनकी ध्वजामें साक्षात् गरुडजी विराजमान हैं, उन भगवानके भक्त प्रह्लादको उन मूर्खोंने सर्पोंद्वारा बाँधा और जलशायीके प्रियजनको ले जाकर जलराशि समुद्रमें डाला । तदनन्तर उन बली दैत्योंने प्रह्लादके ऊपर पर्वतकी चट्टनें रख दीं और तुरंत ही जाकर राजा हिरण्यकशिपुको यह प्रिय संवाद कह सुनाया । उसे सुनकर उस दैत्यराजने भी उन सबका सम्मान किया ॥३० - ३३ १/२॥

बीच समुद्रमें पड़े हुए प्रह्लादको भगवानके तेजसे दूसरे बडवानलकी भाँति प्रज्वलित देख अत्यन्त भयके कारण ग्राहोंने उन्हें दूरसे ही त्याग दिया । प्रल्हाद भी अपनेसे अभिन्न चिदानन्दमय समुद्र ( परमेश्वर ) - में समाहित होनेके कारण यह न जान सके कि ' मैं बाँधकर खारे पानीके सागरमें डाल दिया गया हूँ ।' मुनि ( प्रह्लाद ) जब ब्रह्मानन्दामृतके समुद्ररुप अपने आत्मामें स्थित हो गये, उस समय समुद्र इस प्रकार क्षुब्ध हो उठा, मानो उसमें दूसरे महासागरका प्रवेश हो गया हो । फिर समुद्रकी लहरें प्रह्लादको धीरे - धीरे कठिनाईसे ठेलकर उस नौकरहित सागरके तटकी ओर ले गयी - ठीक उसे प्रकार, जैसे ज्ञानी गुरुके वचन क्लेशोंका उन्मूलन करके शिष्यको भवसागरसे पार पहुँचा देते हैं । ध्यानके द्वारा विष्णुस्वरुप हुए उन प्रह्लादजीको तीरपर पहुँचाकर भगवान् वरुणालय ( समुद्र ) बहुत - से रत्न ले उनका दर्शन करनेके लिये आये । इतनेमें ही भगवानकी आज्ञा पाकर सर्पभक्षी गरुडजी वहाँ आ पहुँचे और बन्धनभूत सर्पोंको अत्यन्त हर्षपूर्वक खाकर चले गये ॥३४ - ३९ १/२॥

तत्पश्चात् गम्भीर घोषवाला दिव्यरुपधारी समुद्र समाधिनिष्ठ भगवद्भक्त प्रह्लादको प्रणाम करके यों बोला ' भगवद्भक्त प्रह्लाद ! पुण्यात्मन् ! मैं समुद्र हूँ । अपने पास आये हुए मुझ प्रार्थीको अपने नेत्रोंद्वरा देखकर पवित्र कीजिये ।' समुद्रके ये वचन सुनकर भगवानके प्रिय भक्त महात्मा असुर - नन्दन प्रह्लादने सहसा उनकी ओर देखकर प्रणाम किया और कहा - ' श्रीमान् कब पधारे ? ' तब उनसे समुद्रने कहा - ॥४० - ४३॥

' योगिन् ! आपको यह बात ज्ञात नहीं हैं, असुरोंने आपका बड़ा अपराध किया है । वैष्णव ! आपको साँपोंसे बाँधकर दैत्योंने आज मेरे भीतर फेंक दिया; तब मैंने तुरंत ही आपको किनारे लगाया और उन साँपोंको अभी - अभी महात्मा गरुडजी भक्षण करके गये हैं । महात्मन् ! मैं सत्सङ्गका अभिलाषी हूँ, आप मुझपर अनुग्रह करें और इन रत्नोंको भेंटरुपमें स्वीकार करें । मेरे लिये आप भगवान् विष्णुके समान ही पूज्य हैं । यद्यपि आपको इन रत्नोंकी कोई आवश्यकता नहीं है, तथापि मैं तो इन्हें आपको दूँगा ही; क्योंकि भगवान् सूर्यका भक्त उन्हें दीप निवेदन करता ही है । घोर आपत्तियोंमें भी भगवान् विष्णुने ही आपकी रक्षा की है । सूर्यकी भाँति आप - जैसे शुद्धचित्त महात्मा संसारमें अधिक नहीं हैं । बहुत क्या कहूँ ? आज मैं कृतार्थ हो गया; क्योंकि आज मुझे आपके साथ स्थित होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ । इस समय क्षणभर भी जो आपके साथ्य बातचीत कर रहा हूँ, इससे प्राप्त होनेवाले फलकी उपमा मैं कहीं नहीं देखता ' ॥४४ - ४९॥

इस प्रकार समुद्रने साक्षात् भगवान् लक्ष्मीपतिके माहात्म्यसूचक वचनोंद्वारा जब उनकी स्तुति की, तब भगवानके प्रिय भक्त प्रह्लादजीको बड़ी लज्जा हुई और हर्ष भी । स्नेही प्रह्लादने समुद्रके दिये हुए रत्न ग्रहणकर उनसे कहा - ' महात्मन् ! आप विशेष धन्यवादके पात्र हैं; क्योंकि भगवान् आपके ही भीतर शयन करते हैं । यह प्रसिद्ध है कि जगन्मय प्रभु प्रलयकालमें भी सम्पूर्ण जगतको अपनेमें लीन करके एकार्णवरुपमें स्थित आप महात्मा महासागरमें ही शयन करते हैं । समुद्र ! मैं इन स्थूल नेत्रोंसे भगवान् जगन्नाथका दर्शन करना चाहता हूँ । आप धन्य हैं; क्योंकि सदा भगवानका दर्शन करते रहते हैं । कृपया मुझे भी उनके दर्शनका उपाय बताइये ' ॥५० - ५३॥

यों कहकर प्रह्लादजी समुद्रके चरणोंपर गिर पड़े तब समुद्रने उनको शीघ्र ही उठाकर कहा - ' योगीन्द्र ! आप तो सदा ही अपने हदयमें भगवानका दर्शन करते हैं; तथापि यदि इन नेत्रोंसे भी देखना चाहते हैं तो उन भक्तवत्सल भगवानका स्तवन कीजिये ।' यों कहकर समुद्रदेव अपने जलमें प्रविष्ट हो गये ॥५४ - ५५॥

समुद्रके चले जानेपर दैत्यनन्दन प्रह्लादजी रात्रिमें वहाँ अकेले ही रहकर भगवानके दर्शनको एक असम्भव कार्य मानते हुए भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी स्तुति करने लगे ॥५६॥

प्रह्लादजी बोले - धीर पुरुष जिनके दर्शनकी योग्यता प्राप्त करनेके लिये सदा ही सैकड़ों वेदान्त - वाक्यरुप वायुद्वारा अत्यन्त बढ़ी हुई वैराग्यरुप अग्निकी ज्वालासे अपने चित्तको तपाकर भलीभाँति शुद्ध किया करते हैं, वे भगवान् विष्णु, भला, मेरे दृष्टिपथमें कैसे आ सकते हैं । एकके ऊपर एकके क्रमसे ऊपर - ऊपर जिनका आवरण पड़ा हुआ है - ऐसे मात्सर्य, क्रोध, काम, लोभ, मोह, मद आदि छः सुदृढ़ बन्धनोंसे भलीभाँति बँधा हुआ मेरा मन अंधा ( विवेकशून्य ) हो रहा है । कहाँ भगवान् श्रीहरि और कहाँ मैं ! भय उपस्थित होनेपर उसकी शान्तिके लिये क्षीरसागरके तटपर जाकर ब्रह्मादि देवता उत्तम रीतिसे स्तवन करते हुए किसी प्रकार जिनका दर्शन कर पाते हैं, उन्हीं भगवानके दर्शनकी मुझ - जैसा दैत्य आशा करे - यह कैसा आश्चर्य हैं ! ॥५७ - ५९॥

राजन् ! इस प्रकार अपनेको भगवानका दर्शन पानेके योग्य न मानते हुए प्रह्लादजी उनकी अप्राप्तिके दुःखसे कातर हो उठे । उनका चित्त उद्वेग और अनुतापके समुद्रमें डूब गया । वे नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहाते हुए मूर्च्छित होकर गिर पडे । भूप ! फिर तो क्षणभरमें ही भक्तजनोंके एकमात्र प्रियतम सर्वव्यापी कृपानिधान भगवान् विष्णु सुन्दर चतुर्भुज रुप धारणकर दुःखी प्रह्लादको अमृतके समान सुखद स्पर्शवाली अपनी भुजाओंसे उठाकर गोदमें लगाते हुए वहाँ प्रकट हो गये ॥६० - ६१॥

उनके अङ्गस्पर्शसे होशमें आनेपर प्रह्लादने सहसा नेत्र खोलकर भगवानको देखा । उनका मुख प्रसन्न था । नेत्र कमलके समान सुन्दर और विशाल थे । भुजाएँ बड़ी - बड़ी थीं और शरीर यमुनाजलके समान श्याम था । वे परम तेजस्वी और अपरिमित ऐश्वर्यशाली थे । गदा, शङ्ख, चक्र और पद्म आदि सुन्दर चिह्नोंसे पहचाने जा रहे थे । इस प्रकार अपनेको अङ्कमें लगाये हुए भगवानको खड़ा देख प्रह्लाद भय, विस्मय और हर्षसे काँप उठे, वे इस घटनाको स्वप्न ही समझते हुए सोचने लगे - ' अहा ! स्वप्नमें भी मुझे पूर्णकाम भगवानका दर्शन तो मिला गया ।' यह सोचकर उनका चित्त हर्षके महासागरमें गोता लगाने लगा और वे पुनः स्वरुपानन्दमयी मूर्च्छाको प्राप्त हो गये । तब अपने भक्तोंके एकमात्र बन्धु भगवान् पृथ्वीपर ही बैठ गये और पाणिपल्लवसे धीरे - धीरे उन्हें हिलाने लगे । स्नेहमयी माताकी भाँति प्रह्लादके गात्रका स्पर्श करते हुए उन्हें बार - बार छातीसे लगाने लगे ॥६२ - ६५॥

कुछ देरके बाद प्रह्लादने भगवानके सामने आँखें खोलकर विस्मितचित्तसे उन जगदीश्वरको देखा । फिर बहुत देरके बाद अपनेको भगवान् लक्ष्मीपतिकी गोदमें सोया हुआ अनुभवकर वे भय और आवेगसे युक्त हो सहसा उठ गये तथा ' भगवन् ! प्रसन्न होइये ' यों बार - बार कहते हुए उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम करनेके लिये पृथ्वीपर गिर पड़े । बहुज्ञ होनेपर भी उन्हें उस समय घबराहटके कारण अन्य स्तुतिवाक्योंका स्मरण न हुआ । तब गदा, शङ्ख और चक्र धारण करनेवाले दयानिधि भगवानने प्रह्लादको अपने भक्तभयहारी हाथके पकड़कर खड़ा किया । भगवानके कर - कमलोंका स्पर्श होनेसे अत्यन्त आनन्दके आँसू बहाते उर काँपते हुए प्रह्लादको और अधिक आनन्द देनेके लिये प्रभुने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा ॥६६ - ७०॥

' वत्स ! मेरे प्रति गौरव - बुद्धिसे होनेवाले इस भय और घबराहटको त्याग दो । मेरे भक्तोंमें तुम्हारे समान कोई भी मुझे प्रिय नहीं है, तुम स्वाधीनप्रणयी हो जाओ [ अर्थात् यह समझो कि तुम्हारा प्रेमी मैं तुम्हारे वशमें हूँ ] । मैं नित्य पूर्णकाम हूँ, तथापि भक्तोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेके लिये मेरे अनेक अवतार हुआ करते हैं; अतः तुम भी बताओ, तुम्हें कौन - सी वस्तु प्रिय है ? ' ॥७१ - ७२॥

तदनन्तर खिले हुए नेत्रोंसे भगवानके सतृष्णभावसे देखते हुए प्रह्लादने हाथ जोड़ नमस्कारपूर्वक उनसे यों निवेदन किया - ' भगवन् ! यह वरदानका समय नहीं है, केवल मुझपर प्रसन्न होइये । इस समय मेरा मन आपके दर्शनरुपी अमृतका आस्वादन करनेसे तृप्त नहीं हो रहा है । प्रभो ! ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी जिनका दर्शन पाना कठिन है, ऐसे आपका दर्शन करते हुए मेरा मन दस लाख वर्षोंमें भी तृप्त न होगा । इस प्रकार आपके दर्शनसे अतृप्त रहनेवाले मुझ सेवकका चित्त आपके दर्शनके बाद और क्या माँग सकता है ?' ॥७३ - ७५ १/२॥

तब मुस्कानमयी सुधाका स्रोत बहाते हुए उन जगदीश्वरने अपने परम प्रिय भक्त प्रह्लादको मोक्षलक्ष्मीसे संयुक्त - सा करते हुए उससे कहा - ' वत्स ! यह सत्य है कि तुम्हें मेरे दर्शनसे बढ़कर दूसरा कुछ भी प्रिय नहीं हैं; किंतु मेरी इच्छा तुम्हें कुछ देनेकी है । अतः तुम मेरा प्रिय करनेके लिये ही मुझसे कुछ माँग लो ' ॥७६ - ७७ १/२॥

तब बुद्धिमान् प्रह्लादने कहा - ' देव ! मैं जन्मान्तरोंमें भी गरुडजीकी भाँति आपमें ही भक्ति रखनेवाला आपका दास होऊँ ! ' यह सुनकर भगवानने कहा - ' यह तो तुमने मेरे लिये कठिन समस्या रख दी - मैं तो तुम्हें स्वयं अपने - आपको दे देना चाहता हूँ और तुम मेरी दासता चाहते हो ! बुद्धिमान् दैत्यराजकुमार ! दूसरे - दूसरे वर माँगो ' ॥७८ - ८०॥

तब प्रह्लादने भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले भगवान् विष्णुसे पुनः कहा - ' नाथ ! आप प्रसन्न हों; मुझे तो यही चाहिये कि आपमें मेरी सात्विक भक्ति सदा स्थिर रहे । यही नहीं, इस भक्तिसे युक्त होकर मैं आपका स्तवन किया करुँ और आपके ही परायण रहकर सदा नाचा करुँ ' ॥८१ १/२॥

भगवानने संतुष्ट होकर प्रिय भाषण करनेवाले प्रिय भक्त प्रह्लादसे तब कहा - ' वत्स ! तुम्हें जो - जो अभीष्ट हो, वह सब प्राप्त हो; तुम सुखी रहो । एक बात और है - महामते ! यहाँसे मेरे अन्तर्धान हो जानेपर भी तुम खेद न करना । मैं अपने परमप्रिय स्थान क्षीरसागरकी भाँति तुम्हारे शुद्धचित्तसे कभी अलग न होऊँगा । तुम दो - ही - तीन दिनोंके बाद मुझे दुष्ट हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिये उद्यत अपूर्व शरीर धारण किये नृसिंहरुपमें, जो पापियोंके लिये भयानक है, पुनः प्रकट देखोंगे ।' यों कहकर भगवान् हरि, अपनेको प्रणाम करके अत्यन्त ललचायी हुई दृष्टिसे देखते रहनेपर भी तृप्त न होनेवाले उस भक्त प्रह्लादके सामने ही मायासे अन्तर्धान हो गये ॥८२ - ८५ १/२॥

तत्पश्चात् वे सहसा सब ओर दृष्टि डालनेपर भी जब भक्तवत्सल भगवानको न देख सके, तब आँसू बहाते हुए उच्चस्वरसे हाहाकार करके बड़ी देरतक भगवानकी वन्दना करते रहे । फिर जब प्रातः काल जगे हुए जन्तुओंकी वानी सब ओर सुनायी देने लगी, तब बुद्धिमान प्रह्लाद समुद्र - तटसे उठकर अपने नगरको चले गये । इसके बाद दैत्यनन्दन प्रह्लादजी परम प्रसन्न होकर अपने स्मरणबलसे संसारमें सब और भगवानका ही दर्शन करते हुए तथा भगवान् एवं मनुष्यकी गतिको भलीभाँति समझते हुए रोमाञ्चित होकर धीरे - धीरे गुरुके घर गये ॥८६ - ८९॥

इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें ' नरसिंहावतारविषयक ' तैंतालीसवाँ अध्याय पुरा हुआ ॥४३॥

N/A

References : N/A
Last Updated : September 22, 2009

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP