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॥ अथ दत्तव्याहृति प्रारभ्...

अथ दत्तव्याहृति प्रारभ्यते - ॥ अथ दत्तव्याहृति प्रारभ्...

देवी देवतांची स्तुती करताना म्हणावयाच्या रचना म्हणजेच स्तोत्रे.
A Stotra is a hymn of praise, that praise aspects of Devi and Devtas.


अथ दत्तव्याहृति प्रारभ्यते
॥ अथ दत्तव्याहृति प्रारभ्यते ॥

श्रीगणेशाय नमः ॥
ॐ मिति व्याहरेत् ॥ ॐ नमो भगवते दत्तात्रेयाय, स्मरणमात्रसंतुष्टायेति ॥ महाभयनिवारणायेति, महाज्ञानप्रसादायेति ॥ चिदानन्दात्मने बालोन्मत्तपिशाचवेषायेति, महायोगिने अवधूतायेति, अनसूयानन्दवर्धनायात्रिपुरायेति ॐ मिति व्याहरेत् ॥ भवबन्धविमोचनायेति आमिति व्याहरेत्, साघ्यबन्धनायेति र्‍ही मिति व्याहरेत्, सर्वभूतिदायेति क्रोमिति व्याहरेत्, साध्याकर्षणायेति ऐमिति व्याहरेत्, वाक्प्रदायेति क्लीमिति व्याहरेत्, जगत्रयवशीकरणायेति सौमिति व्याहरेत्, सर्वमनःसंक्षोभनायेति श्रीमिति व्याहरेत्, महासपत्प्रदायेति ग्लौमिति व्याहरेत्, भूमंडलाधिपत्यप्रदायेति द्रामिति व्याहरेत्, चिरजीविनेति वषडिति व्याहरेत्, वशीकुरु वशीकुरु वौषडिति व्याहरेत्, आकर्षयाकर्षय हुमिति व्याहरेत्, विद्वेषय विद्वेषय फडिति व्याहरेत्, मारय मारय नम इति व्याहरेत्, उच्चाटयोच्चाट ठठ इति व्याहरेत्, स्तंभय स्तंभय खेमिति व्याहरेत्, संपन्नय संपन्नय स्वाहेति व्याहरेत्, पोषय पोषय, परमंत्र - परयंत्र - परतंत्राणि छिंधि छिंधि, ग्रहान्निवारय निवारय, व्याधीन्विनाशय विनाशय दुःखान् शमय शमय, दुष्टान्मारय मारय, दारिद्र्य विद्रावय विद्रावय, देहं पोषय पोषय, चित्तं तोषय तोषय, सर्वमन्त्रस्वरूपाय, सर्वयंत्रस्वरूपाय, सर्वतंत्रस्वरूपाय, सर्वोपप्लवरूपायेति ॐ नमः शिवायेति शिद्धाय स्वाहेत्युपपनिषत् ॥अनुष्टुप् छंदः, सदाशिवो ऋषिः दत्तात्रेयो देवता, ॐ बीजं, स्वाहा शक्तिः, द्रां कीलकम् अष्टमुर्तिमन्त्रव्याख्याताभवति, योनित्यमभिधीयते वाय्वग्नि - सोमादित्य - ब्रह्म विष्णु - रुद्राः पूता भवंति, चतुर्वेदषट्शास्त्रेतिहास - पुराणानां पारगो भवति सर्वैर्देवैर्ज्ञातो भवति गायत्र्याः शतसहस्रजपो भवति, महारुद्रशतसहस्रजापी भवति प्रणवानां अयुतकोटिजप्त्वा फलानिभवंति, शतपूर्वाच्छतोत्तरात्पंक्ति पावनात्पूर्तो भवति, ब्रह्महत्यादिपातकैर्मुक्तो भवति, अभक्षभक्षणत्पूतो भवति, तुलापुरुषादिदानप्रतिग्रहपापैर्विमुक्तो भवति, सर्वंमंत्रयोगपारगो भवति, ब्रह्मणा समो भवति, तस्मात सच्छिष्यं भक्तं प्रतिग्राह्योनंतफलमश्नुते जीवन्मुक्तो भवति इत्याह भगवान्नारायणब्रह्मेंत्युपनिषत ॥ ॐ शांतिः शांतिः शांतिः इत्मुत्तरतापि नी ॥ श्रीदत्तात्रेयाय श्रीमदादिगुरुवे नमः ॥ ॐ सहनाववत्विति शांतिः शांतिः शांतिः ॥
इति श्रीदत्तव्याहृतिः समाप्ताः ॥

Translation - भाषांतर
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Last Updated : 2017-03-16T07:08:49.7870000

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भगीरथ

  • n. (सू.इ.) सुविख्यात इक्ष्वाकुवंशीय राजा, जो सम्राट दिलीप का पुत्र था । अपने पितरों के उद्धार करने लिए इसने अनेकानेक प्रयत्न कर गंगा नदी को पृथ्वी पर लाया, एवं इस तरह अपने प्रपितामह असमंजस्, पितामह अंशुमत् एवं पिता दिलीप से चलता आ रहा प्रयत्न सफल किया । इसी कारण आगे चलकर लोगों ने अत्यधिक प्रयत्न के लिए ‘भगीरथ’ नाम को लाक्षणिक रुप में प्रयुक्त करना आरम्भ किया । इसके प्रपितामह असमंजस् के पिता सगर के कुल साठ हजार पुत्र थे, जो कपिल ऋषि के शाप के कारण दग्ध हो गये । बाद को कपिल ऋषि ने अंशुमत् तथा दिलीप से उनके मुक्ति का मार्ग बताते हुए कहा ‘यदि तुम लोग अपने पितरों का उद्धार ही करना चाहते हो, तो गंगा नदी की आराधना कर उसे पृथ्वी पर आने के लिये प्रार्थना करो, तभी तुम्हारे पूर्वजों का निस्तर सम्भव है’। अंशुमत् तथा दिलीप ने तप किया, लेकिन वे सफल न हो सके; उनका प्रयत्न अधूरा ही रहा । तब इसने हिमालय पर जा कर गंगा लाने के लिए घोर तप किया । गंगा इससे प्रसन्न हुयी, तथा पृथ्वी पर उतरने के लिए उसने अपनी अनुमति दे दी । अब समस्या थी कि, गंगा के तीव्र प्रवाह को पृथ्वी पर किस प्रकार उतारा जाय; कारण सम्भव था, पृथ्वी उसके वेग गति से बह जाये । इस कार्य के लिए गंगा ने इसे शंकर की सहायता लेने के लिए कहा । गंगा के कथनानुसार इसने शंकर की आराधना आरम्भ कर दी । पश्चात् शंकर उसकी तपस्या से प्रसन्न हो, गंगा के वेग प्रवाह को जटाओं के द्वारा रोकने के लिए तैयार हो गए । 
  • गंगावतरण n. -बाद में शंकर ने अपनी जटा के एक बाल को तोड कर गंगा को पृथ्वी पर उतारा । गंगा का जो क्षीण प्रवाह सर्वप्रथम पृथ्वी पर आया, उसे ही ‘अलकनंदा’ कहते हैं । बाद में, गंगा ने वेगरुप धारण कर भगीरथ के कथनानुसार, उसी मार्ग का अनुसरण किया, जिस जिस मार्ग से होता हुआ यह गया । अंत में यह कपिलआश्रम के उस स्थान पर गंगा को ले गया, जहॉं इसके पिता शाप से दग्ध हुए थे । वहॉं गंगा के स्पर्शमात्र से सभी पितर शाप से मुक्ति पाकर हमेशा के लिए उद्धरित हो गये [म.व.१०७];[वा.रा.बा.१.४२-४४];[भा.९.९.२-१०];[ वायु.४७.३७, ८८.१६८];[ ब्रह्म.७८];[ विष्णु.४.४.१७] । गंगा को पृथ्वी पर उतारने का श्रेय इसे ही है । इसी लिये गंगा को इसकी कन्या कहा गया है, तथा इसके नाम पर ही उसे ‘भागीरथी’ नाम दिया गया है [ह.वं.१.१५-१६];[ नारद.१.१५];[ ब्रह्मवै.१.१०] । पद्म के अनुसार, गंगा आकाश से उतर कर शंकर की जटाओं में ही उलझ कर रह गयी । तब सगर ने शंकर से प्रार्थना कर, उसे पृथ्वी पर छोडने के लिए निवेदन किया [पद्म.उ.२१] । भगीरथ से सम्बन्धित गंगावतरण की कहाणी में, सगर का नाम जो पद्म पुराण में सम्मिलित किया गया है, वह उचित नहीं प्रतीत होता है । गंगा को पृथ्वी पर लाने के उपरांत यह पूर्ववत फिर राज्य करने लगा । यह धर्मप्रवृत्तिवाला दानशील राजा था । इसने दान में अपनी हंसी नामक कन्या कौत्स ब्राह्मण को दी थी [म.अनु.१२६.२६-२७] । इसने भागीरथी तट पर अनेकानेक घाट बनवाये थे । न जाने कितने यज्ञ कर ब्राह्मणों को हजारों सालंकृत कन्याएँ, एवं अपार धनराशि दक्षिणा के रुप में देकर उन्हें सन्तुष्ट किया था । इसके यज्ञ की महानता इसी में प्रकट है कि, उसमें देवगण भी उपस्थित होते थे [म.द्रो.परि.१. क्र.८] । ब्राह्मणों को अनेकानेक गायों का दान देकर इसने अपनी दानशीलता का परिचय दिया था । अकेले कोहल नामक ब्राह्मण को ही इसने एक लाख गायें दान में दी थी, जिसके कारण उसे उत्तमलोक की प्राप्ति हुयी [म.अनु.१३७.२६-२७, २००.२७] । श्रीकृष्ण ने भी इसकी दानशीलता की सराहना की है [म.शां.२९.६३-७०] । महाभारत में दिये गये गोदानमहात्म्य में भी इसका निर्देश प्राप्त है [म.अनु.७६.२५] । वैदिक वाङ्मय में निर्दिष्ट ‘भगीरथ ऐक्ष्वाक’ एवं यह सम्भवतः एक ही व्यक्ति रहे होंगे । भगीरथ के नाभाग (नभ), तथा श्रुत नामक दो पुत्र थे । इसके उपरांत श्रुत गद्दी पर बैठा । महाभारत में सोलह श्रेष्ठ राजाओं का जो आख्यान नारद ने सृंजय राजा को सुनाया था, उसमें भगीरथ की कथा सम्मिलित है [म.शां.५३-६३] 
  • भगीरथकथा का अन्वयार्थ n. आधुनिक विद्वानों के अनुसार, भगीरथ की यह कथा रुपात्मक है । गंगा पहले तिब्बत में पूर्व से उत्तर की ओर बहती थी, जिससे कि, उत्तरी भारत अक्सर आकालग्रस्त हो जाता था । इसके लिये भगीरथ के सभी पूर्वजों ने प्रयत्न किया कि, किसी प्रकार से गंगा के प्रवाह को घुमाकर दक्षिणीवाहिनी बनाया जाये । किन्तु वह न सफल हो सके । लेकिन भगीरथ अपने प्रयत्नों में सफल रहा, तथा उसने गंगा की धार मोड कर उत्तर भारत को हराभरा प्रदेश बना दिया । सगर के साठ हजार सम्भवतः उसकी प्रजा थी, जिस यह पुत्र के समान ही समझाता था । 
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Category : Hindu - Beliefs
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