नवविधाभक्तिनाम - ॥ समास सातवां - दास्यभक्तिनिरुपणनाम ॥

‘हरिकथा’ ब्रह्मांड को भेदकर पार ले जाने की क्षमता इसमें है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
पीछे हुआ निरुपण । छठवें भक्ति के लक्षण । अब सुनो होकर सावधान । सातवीं भक्ति ॥ १॥
सातवां भजन वह दास्य जानें । पडे हुये जो कार्य वह करें । सदा सन्निध ही रहें । देवद्वार के ॥२॥
वैभव देव का सम्भालें । न्यूनपूर्ण कभी ना पडने दें । चढते बढते बढायें । भजन ईश्वर का ॥३॥
बनवायें भग्न मंदिर । बंधवायें टूटे सरोवर । चलायें बरामदे धर्मशाला और घर । नूतन ही कार्य ॥४॥
नाना रचना जीर्ण जर्जर । उनका करें जीर्णोद्धार । अधूरे कार्य को तत्पर । शुरु करें ॥५॥
गज रथ तुरंग सिंहासन । चौकियां शिबिका सुखासन । मंचक डोलियां विमान । बनवायें नूतन ॥६॥
मेघाडंबर छत्र चंवर । सूर्यपान निशान अपार । नित्य नूतन अति आदर । से सम्हालते रहे ॥७॥
नाना प्रकारों के यान । बैठने के उत्तम स्थान । बहुविध सुवर्णासन । यत्न से बनवाते रहें ॥८॥
पेटी पिटारे कमरें भवन । घडे गागर हौद पानी के बर्तन । ऐसा द्रव्यांश संपूर्ण । अतियत्न से करें ॥९॥
भूईघर तलघर विवर । नाना स्थल गुप्तद्वार । अनर्घ्य वस्तुओं के भांडार । यत्न से बनाते जायें ॥१०॥
अलंकार भूषण दिव्यांबर । नानाविध रत्न मनोहर । नानाविध स्वर्ण पात्र । यत्न से बनातें जाये ॥११॥
पुष्पवाटिका नाना बन । नाना वृक्षों के बन । करें हरे भरे देकर जीवन । वृक्षों को ॥१२॥
नाना पशुओं की शाला । नाना पक्षी चित्रशाला । नाना वाद्य नाट्यशाला । गुणी गायक बहुत सारे ॥१३॥
भोजनशाला रसोईगृह । धर्मशाला सामग्रीगृह । निद्रिस्तों के लिये शयनागृह । विशाल स्थल ॥१४॥
नाना परिमल द्रव्यों के स्थल । नाना खाद्य फलों के स्थल । नाना रसों के नाना स्थल । यत्न से बनाते जायें ॥१५॥
नाना वस्तुओं के नाना स्थान । भग्न हो तो बनायें नूतन । देव के वैभव वचन । कहें कितने प्रकार से ॥ १६॥
सभी जगह अति सादर । और दास्यत्व के लिये भी तत्पर । कार्यभाग का बिसर । होने ही ना दें ॥१७॥
जयंतियां पर्व महोत्सव । मनायें वैभव असंभाव्य । जिन्हें देखकर स्वर्ग के देव । भी होते तटस्थ ॥१८॥
ऐसे वैभव चलायें । और नीच दास्यत्व भी करें । संकट के प्रसंग में सावध रहें । सर्वकाल ॥१९॥
जो जो कुछ चाहिये । वह सब तत्काल ही दीजिये । अत्यंत प्रीति से कीजिये । सकल सेवा ॥२०॥
चरण क्षालन स्नान आचमन । गंधाक्षत वसन भूषण । आसन जीवन नाना सुमन । धूप दीप नैवद्य ॥२१॥
शयन के लिये उत्तम स्थल । रखें जल सुशीतल । ताम्बूल गायन रसाल । करें राग रंग से ॥२२॥
परिमल द्रव्य और फुलेल । नाना सुगंधित तेल । बहुत प्रकार के खाद्य फल । सन्निध ही रखें ॥२३॥
लीप कर साफ करें । उदक पात्र उदक से भरें । वसन प्रक्षालन कर लायें । उत्तमोत्तम ॥२४॥
करें सब की व्यवस्था । करें आगत का अतिथ्य । ऐसी यह जानो सत्य । सातवीं भक्ति ॥२५॥
कहें वचन करुणा के । नाना प्रकार के स्तुति के । अभ्यंतर शांत हो सबके । ऐसे कहें ॥२६॥
ऐसी यह सातवीं भक्ति । निरुपित की यथामति । प्रत्यक्ष अगर ना हो पाती । तो भी चित्त में मानसपूजा करें ॥२७॥
ऐसे दास्य करें देव का । इसी प्रकार से सद्गुरु का । यदि प्रत्यक्ष ना हो तो भी मानस पूजा का । विधान करते जायें ॥२८॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे दास्यभक्तिनिरुपणनाम समास सातवां ॥७॥

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Last Updated : November 30, 2023

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