नवविधाभक्तिनाम - ॥ समास दूसरा - कीर्तनभजननिरूपणनाम ॥

‘हरिकथा’ ब्रह्मांड को भेदकर पार ले जाने की क्षमता इसमें है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
श्रोताओं ने पूछा भगवद्भजन । वह नवविधा प्रकार से किया कथन । उसमें प्रथम निरूपित श्रवण । दूसरा कीर्तन सुनें ॥१॥
सगुण हरिकथा करें । भगवत्कीर्ति बढ़ायें । अखंड वैखरी से कहलायें । यथायोग्य ॥२॥
बहुत करें कंठस्थ । कंठ में धरें जो ग्रंथगर्भित । भगवत्कथा सतत । करते जायें ॥३॥
अपने सुख स्वार्था । करते ही रहें हरिकथा । हरिकथा बिन सर्वथा । रहें ही नहीं ॥४॥
नित्य नूतन आंस धरें । साक्षेप अत्यंत ही करें । हरिकीर्तन से भरें। ब्रह्मांड सारा ॥५॥
मन को है भाता । जी से अत्यंत मधुरता । सदासर्वदा तत्परता । हरिकीर्तन की ॥६॥
भगवंत को प्रिय कीर्तन । कीर्तन से होये समाधान । बहुत जनों का हरिकीर्तन । उपाय कलियुग में ॥७॥
विविध विचित्र ध्यान । वर्णन करें अलंकार भूषण । ध्यानमूर्ति अंतःकरण । लक्ष्य कर कथा करें ॥८॥
यशकीर्तिप्रतापमहिमा । प्रीति से बखाने परमात्मा । जिससे भगवत्भक्तों की आत्मा । संतुष्ट हो ॥९॥
कथाअन्वय मि शब्द । करतालिका से नामघोष । प्रसंगनुरूप कहें अनेक । बोधकथा सत्यकथा नेमस्त ॥१०॥
ताल मृदंग हरिकीर्तन । संगीत नृत्य तानमान । नाना कथानुसंधान । टूटने ही ना दें ॥११॥
करुणा कीर्तन के प्रवाह से । श्रोताओं के श्रवणपुट में । कथा करें धडाके से । आनंद से भर दें ॥१२॥
कंप रोमांच स्फुरण । प्रेमाश्रुसहित गायन । देवद्वार पर नमन । साष्टांग करें ॥१३॥
पद दोहे श्लोक प्रबंध । धाटी मुद्रा अनेक छंद । वीरभाट विनोद । प्रसंग अनुरूप करें ॥१४॥
नाना नवरसिक श्रृंगारिक । गद्यपद्य के कौतुक । नाना वचन प्रास्ताविक । शास्त्राधार से बोलें ॥१५॥
भक्तिज्ञानवैराग्यलक्षण । नीतिन्यायस्वधर्मरक्षण । साधनमार्ग अध्यात्मनिरूपण । प्रांजल बोलें ॥१६॥
प्रसंगानुसार हरिकथा करें । सगुण में सगुणकीर्ति धरें । निर्गुण प्रसंग से बढाये । अध्यात्मविद्या ॥१७॥
पूर्वपक्ष त्यागकर सिद्धांत । निरुपण करें नियमित । बहुधा बोल अव्यवस्थित । बोलें ही नहीं ॥१८॥
करें वेदपरायण । बोलें जनों से पुराण । माया ब्रह्म के विवरण । यथायोग्य करें ॥१९॥
ब्राह्मण्य की रक्षा करें आदर से । उपासना के भजनद्वार से । गुरुपरंपरा को निर्धार से । विचलित ही ना होने दें ॥२०॥
करें वैराग्यरक्षण । बचायें ज्ञान के लक्षण । परमदक्ष विचक्षण । सब ही संभाले ॥२१॥
कीर्तन सुनते ही संदेह पडे । सत्य समाधान वह उडे । नीतिन्यायसाधन टूटे । ऐसे न बोलें ॥२२॥
सगुणकथा का नाम कीर्तन । अद्वैत याने निरूपण । सगुण की रक्षा कर निर्गुण । बोलते जायें ॥२३॥
रखें वक्तृत्व का अधिकार । अल्पज्ञ को न मिले प्रत्युत्तर । वक्ता चाहिये साचार । अनुभवी ॥२४॥
सकल ही रक्षा कर ज्ञान बोलें । जिससे वेदाज्ञा ना भंग होयें । उत्तम सन्मार्ग मिले । प्राणिमात्रों का ॥२५॥
अस्तु यह सब कर त्यजन । करें गुणानुवाद कीर्तन । इसका नाम भगवद्भजन । दुसरी भक्ति ॥२६॥
कीर्तन से महादोष जाते । कीर्तन से हो उत्तम गति । कीर्तन से भगवद्माप्ति । यदर्थी संदेह नहीं ॥२७॥
कीर्तन से वाचा पवित्र । कीर्तन से हो सत्पात्र । हरिकीर्तन से प्राणिमात्र । सुशील होते ॥२८॥
कीर्तन से बनती अव्यग्रता । कीर्तन से निश्चय मिलता । कीर्तन से संदेह उडता । श्रोता वक्ताओं का ॥२९॥
सदासर्वदा हरिकीर्तन । ब्रह्मसुत करे स्वयम् । इस कारण नारद वही नारायण । कहते हैं ॥३०॥
इस कारण कीर्तन की अगाध महिमा । कीर्तन से संतुष्ट होते परमात्मा । सकल तीर्थ और जगदात्मा । कीर्तन में बसते ॥ ३१॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे कीर्तनभजननिरूपणनाम समास दूसरा ॥२॥

N/A

References : N/A
Last Updated : November 30, 2023

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.
TOP