नवविधाभक्तिनाम - ॥ समास छठवां - वंदनभक्तिनाम ॥

‘हरिकथा’ ब्रह्मांड को भेदकर पार ले जाने की क्षमता इसमें है ।


॥ श्रीरामसमर्थ ॥
पीछे हुआ निरुपण । पांचवीं भक्ति के लक्षण । अब सुनो हो सावधान । छठवीं भक्ति ॥१॥
छठवीं भक्ति है वंदन । करें ईश्वर को नमन । संत साधु और सज्जन । को नमस्कार करते जायें ॥२॥
सूर्य को करें नमस्कार । देव को करें नमस्कार । सद्गुरु को करें नमस्कार । साष्टांग भाव से ॥३॥
साष्टांग नमस्कार का अधिकार । नाना प्रतिमा देव गुरुवर । अन्यत्र नमन का विचार । अधिकारानुसार करें ॥४॥
छप्पन कोटि वसुमति । उस में रहतें विष्णुमूर्ति । उन्हें करें सप्रीति । साष्टांग नमस्कार ॥५॥
पशुपति श्रीपति और गभस्ति । इनके दर्शन से दोष जाते । वैसे ही नमन करें मारुति । को नित्यनेम से विशेष ॥६॥

॥ श्लोक ॥    
शंकरः शेषशायी च मार्तंडो मारुतिस्तथा ।
एतेषां दर्शनं पुण्य नित्यनेमे विशेषतः ॥ छ ॥


भक्त ज्ञानी और वीतरागी । महानुभाव तपस्वी योगी । सत्पात्र देखकर तत्काल ही । नमस्कार करें ॥७॥
वेदज्ञ शास्त्रज्ञ और सर्वज्ञ । पंडित पुराणिक और विद्वज्जन । याज्ञिक वैदिक पवित्रजन । को नमस्कार करते जायें ॥८॥
जहां दिखते विशेष गुण । वह सद्गुरु का, अधिष्ठान । इस कारण उसे नमन । अत्यादर से करें ॥९॥
गणेश शारदा नाना शक्ति । हरिहरकी अवतार मूर्ति । नाना देवों की क्या करे गिनती । पृथकाकारे ॥१०॥
सर्व देवों को नमस्कार किया । वह एक परमेश्वर को प्राप्त हुआ । एतदर्थ एक वचन कहा गया । वह सुनो ॥११॥

॥ श्लोक ॥    
आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरं ।
सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥

सर्व देवों को इस कारण । करें अत्यादर से नमन । देव को मानने पर अधिष्ठान । परम सुख मिलता ॥१२॥
देव देवों के अधिष्ठान । सत्पात्रों में सद्गुरु का स्थान । करें नमस्कार इस कारण । दोनों को ॥१३॥
नमस्कार से आती लीनता । नमस्कार से विकल्प टूटता । नमस्कार से होती सख्यता । नाना सत्पात्रों से ॥१४॥
नमस्कार से दोष जाते । नमस्कार से अन्याय क्षम्य होते । नमस्कार से टूटे हुये जुड़ते । समाधान पाकर ॥१५॥
शीश से बढकर नहीं दंड । ऐसे बोलते उदंड । इस कारण अखंड । देव भक्त वंदन करें ॥ १६॥
नमस्कार से कृपा उपजती । नमस्कार से प्रसन्नता प्रबल होती । नमस्कार से गुरुदेव की कृपा होती । साधकों पर ॥१७॥
निःशेष करने पर नमस्कार । नष्ट होते दोषों के गिरिवर । और मुख्य परमेश्वर । कृपा करते ॥१८॥
नमस्कार से पतित पावन । नमस्कार से सतों की शरण । नमस्कार से जन्म मरण । की दूरी और दूर होती ॥१९॥
परम अन्याय कर आया । और साष्टांग नमस्कार किया । तो फिर उस अन्याय को क्षमा किया । जायें श्रेष्ठों द्वारा ॥२०॥
इस कारण नमस्कार समान । नहीं अनुसरणीय अन्य । प्राणिमात्रों को करते ही नमन । सद्बुद्धि प्राप्त होती ॥२१॥
नमस्कार को कुछ खर्च ना लगे । नमस्कार को कष्ट लेना न लगे । नमस्कार को कुछ भी ना लगे । उपकरण सामग्री ॥२२॥
नहीं सरल कुछ नमस्कार जैसे । करें नमस्कार अनन्य रूपसे । नाना साधनों के साक्षेप से । क्यों थकें ॥२३॥
साधक भाव से नमस्कार करे । उसकी चिंता साधु को लगे । सुगम पंथ से ले जाकर डाले । जहां का वहां ॥२४॥
इस कारण नमस्कार श्रेष्ठ । नमस्कार से प्रसन्न होते वरिष्ठ । यहां कथन की स्पष्ट । छठवीं भक्ति ॥२५॥
इति श्रीदासबोधे गुरुशिष्यसंवादे वंदनभक्तिनाम समास छठवां ॥६॥

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Last Updated : November 30, 2023

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