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पूर्वमेघ - श्लोक १६ ते २०

महाकवी कालिदास यांच्या मेघदूत काव्याचे मराठी समवृत्त व समश्लोकी भाषांतर.


श्लोक १६ ते २०
(१६) जागोजागीं उठति कदली, हो धरित्री रसाळा ।
जेणें, तूजा रव मधुर तो, ऐकुनीं, मानसाला ॥
जाणारे जे, बिसकिसलयें घेउनीयां फराळ ।
कैलासांती सहचर तुझे होति मागीं, मराळ ॥

(१७) आलिंगोनी तव गिरिसखा घे निरोपा, जयाच्या ।
श्रोणीभागीं विलसति खुणा राममादांबुजांच्या ॥
जेव्हा कालें पडत तुमची गांठ वर्षावसानें ।
सोडावीं तौंप्रणयपिशुनें उष्णबाष्पें जयानें ॥

(१८) ऐकें आधीं तुज कथितसें मार्ग ओ सोइवार ।
संदेशा मी श्रुतिसुखदशा मागुती सांगणार ॥
जेणें जातां, पद गिरिशिरीं ठेवुनी घे विसांवा ।
ताजें पाणी वनतटिनिचें सेवुनी शीण जावा ॥

(१९) तां चावश्यं दिवसगणनातत्परामेकपत्नीमव्यापन्नामविहतगतिर्द्रक्ष्यसि भ्रातृजायाम् ।
आशाबन्ध: कुसुमसद्दशं प्रायशो हयङगनानां
सद्य:पाति प्रणयि ह्रदयं विप्रयोगे रुणद्भि ॥

(२०) कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्यां
तच्छुत्वा ते श्रवणसुभगं गर्जितं मानसोत्का: ।
आ कैलासाद्बिसकिसलयच्छेदपार्थयवन्त:
संपत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसा: सहाया: ॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T12:55:01.2030000

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व्यास (धर्मशास्त्रकार)

  • n. एक धर्मशास्त्रकार, जिसके द्वारा रचित एक स्मृति आनंदाश्रम, पूना, व्यंकटेश्र्वर प्रेस, बंबई एवं जीवानंद स्मृतिसंग्रह में प्रकाशित की गई है । इस ‘स्मृति’ के चार अध्याय, एवं २५० श्र्लोक है । 
  • व्यासस्मृति n. ‘व्यासस्मृति’ में वर्णाश्रमधर्म, नित्यकर्म, स्नानभोजन, दानधर्म आदि व्यवहारविषयक धर्मशास्त्रीय विषयों की चर्चा की गयी है । ‘अपरार्क,’ ‘स्मृतिचंद्रिका’ आदि ग्रंथों में इसके व्यवहारविषयक उद्धरण प्राप्त है । 
  • अन्य ग्रंथ n. ‘व्यासस्मृति’ के अतिरिक्त इसके निम्नलिखित ग्रंथों का निर्देश भी निम्नलिखित स्मृतिग्रंथों में प्राप्त हैं:- १. गद्यव्यास-स्मृतिचंद्रिका; २. वृद्धव्यास-अपरार्क; ३. बृहद्व्यास-मिताक्षरा; ४. लघुव्यास, महाव्यास, दानव्यास-दानसागर। पुराण में यह एवं कृष्ण द्वैपायन व्यास एक ही व्यक्ति होने का निर्देश प्राप्त है [भवि. ब्राह्म. १] । किंतु इस संबंध में निश्र्चित रूप से कहना कठिन है । 
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