ठाकुर प्रसाद - नवम स्कन्ध

ठाकुर प्रसाद म्हणजे समाजाला केलेला उपदेश.


ॐ जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्चार्थेश्वभिज्ञ: स्वराट तेने व्रम्हा ह्रदय आदिकवये मुहयंति यत्सूरय: ।
तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यक्ष त्रिसर्गोऽमृषा धाम्नां स्वेन सदा निरस्तकुहकं सत्यं परम धीमहि

श्रीकृष्णं वंदे जगदगुरुम् ।
जगत गुरु श्रीशंकराचार्याय नम: ।

तस्मात् कारुण्यभावेन रक्ष रक्ष परमेश्वर ।

अहं भक्तपराधीनो म्हास्वतंत्र इव द्विज ।
साधुभिर्ग्रस्तह्रदयो भक्तैर्मत्कजनप्रिय: ॥

भगवान् कहते हैं :---
ये दारागारपुत्राप्तान् प्राणत् वित्तमिमं परम् ।
हिस्वा मां शरणं याता: कथं तांस्त्यक्तुमुत्सहे ॥

मयि निर्बद्धह्रदया: साधव: समदर्शना: ।
वशी कुर्वन्ति मां भक्त्या सत्स्त्रिय: सत्पति: यथा ॥
भक्ता मुझे भक्ति से वश में कर लेते हैं ।
साधवो ह्रदयं महयं साधून ह्रदयं त्वहम् ।

नाम की महिमा भी बहुत बडी है :---
नामलिया उन्होंने जान लिया सकल शास्त्र का भेद ।
बिना नाम नरक में गया पढ - पढ चारों वेद ॥

अंगं गलितं पलितं मुड दशनविहीनं जातं तुंडम् ।
वृद्धो याति गृहित्वा दंडं तदपि न मुंचति आशा पिंडम् ।
भज गोविंदं भज गोविंदं गोविंदं भज मूढमते ॥

मुमुक्षु: मिथुनव्रतिनां संगं त्यजेत् ।

स्त्रीणं स्त्रीसंगिनां संगं त्यजेत् ।

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहि ।
तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौशल्या हितकारी ।
हरषित महतारी मुनिमन हारी अदभुत रूप विचारी ॥
लोचन अभिरामा तनु घनश्यामा निज आयुध भुजचारी ।
भूषन वनमाला नयन विशाला शोभा सिन्धु खरारी ॥
कह दुइ कर जोरी स्तुति तोरी केहि विधि करौं अनन्ता ।
माया गुन ज्ञानातीत अमान अवेद पुरान भनन्ता ॥
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता ।
सो मम हित लागी जन अनुरगी भयौ प्रकट श्रीकन्ता ॥

दोहा

विप्र धेनु सुर संत हित ली ह मनुज अवतार ।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ॥

सियावर रामचन्द्र की जय ।
रघुपति रामचन्द्र की जय ॥

अगुन अरूप अलख अज जोई ।
भगत प्रेम - बस सगुण सो होई ॥

बिनु पद चलै सुनै बिनु काना ।
कर बिनु करम करै विधि नाना ॥
आनन रहित सकल रस भोगी ।
बिनु बानी वक्ता बड जोगी ॥
तन बिनु परस नयन बिनु देखा ।
ग्रहै घ्रान बिनु बास अशेषा ॥
अति सब भाँति अलौकिक करनी ।
महिमा जासु जाइ नहिं बरनी ॥

जेहि इमि गावहिं वेद बुध जाहि धर्हिं मुनि ध्यान ।
सोइ दशरथ सुत भगत हित कोशलपति भगवान ॥

जानिय तबहिं जीव जग जागा ।
जब सब विषय विलास विरागा ॥

गीताजी में कहा गया हैं :---
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ॥

तत्र वेदा अवेदा भवन्ति ।

ऐसो को उदार जग माहीं ।
बिन सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस कौ नाहीं ॥
जो गति योग बिराग जतन करि नहिं पावत मुनिग्यानी ।
सो गति देत गीध शबरी कहं, प्रभु न बहुत जिय जानी ॥
तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो ।
तौ भजु राम काम सब पूरन करहि कृपानिधि तेरो ॥

श्मशानेश्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचा: सहचरा: ।
चिताभस्मालेप: स्रगति नृकरोटीपरिकर: ॥
अमंगल्यं शीलं तव भवतु नामैवखिलं ।
तथाऽपि स्मतृणां वरद परमं मंगलमसि ॥

राम देत नहिं बनइ  गुसाई ।

देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं ।
सौ मुनि देउं निमिष एक माहीं ॥

मनोजवं मारुततुल्य वेगम् जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यम् श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥

अरुन नयन उर बाहु बिसाला ।
नील जलज तनु श्याम तमाला ॥
कटि पट पीत कसे वर भाथा ।
रुचिर चाप सायक दुहुं हाथा ॥
द्वारिका में द्वारिकानाथ खडे हैं ।
डाकोर में रणछोड रायजी खडे हैं ।
स्रीनाथजी में गोवर्धननाथ खडे हैं ।
पंढरपुर में विट्ठलनाथजी खडे हैं ।

धनुष, ज्ञान का स्वरूप है ।
बाण, विवेक - स्वरूप है ।

इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ।

जनक कहते हैं :---
सहज विरागरूप मन मोरा ।
थकित होत जिमि चन्द्र चकोरा ॥

कर्मणैवहि संसिद्धिम् स्थिता जनकाद्य: ।

जय जय गिरवर राजकिशोरी ।
जय महेश मुखचंद चकोरी ॥
देवि पूजि पदकमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होंहिं सुखारे ॥

‘सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ।’

रामी राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ॥
रामानास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्यहं ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु भे भो राम मामुद्धर ॥

वधू लरिकनी पर घर आईं ।
राखेहु नयन पलक की नाईं ॥

रघुकुल रीति सदा चलि आई ।
प्राण जायँ पर वचन न जाई ॥

तापस वेष बिसेषि उदासी ।
चौदह बरिस रामु बनबासी ॥

जिऐ मीन बरु वारि बिहीना ।
मनि बिनु फनिकु जिऐ दु:ख दीना ।
कहुँ सुभाव न छल मन माहीं ।
जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥

कहि न जाई कछु ह्रदय विषादू ।
बड भागी बन, अवध अमागी ।
राखहु नयन पलक की नाईं ।
की तनु पाण कि केवल प्राण ।
पुत्रवती जुवती जग सोई ।
रघुपति भगत जासु सुत होई ॥
लक्ष्मण, मेरी अनुमति है ।
अवध तहाँ जहँ राम निवासू ।
अजहुँ न निकसे प्राण कठोर ।

जिन चरननकी चरनपादुका भरत रहयो लौ लाई ।
सोइ चरन केवट धोय लीन्हें तब हरि नाव चलाई ॥
भज मन रामचरण सुखदायी ।

जासु नाम सुमिरत एक बारा ।
उतरहिं नर भवसिन्धु अपारा ॥
ब्रम्हा जीव बिच माया जैसी ।
मुखस्य दु:खस्य न कोऽपि दाता
सखा परम परमारथु एहू ।
मन क्रम वचन राम पद नेहू ॥
कौ न काहु सुख दु:ख कर दाता ।
निज कृत करम भोग सबु भाता ॥
सोइ जानै जेहि देहु जनाई ।
जानत तुम्हहि तुम्है होइ जाई ॥

में भी वास करेंगे ।
जिनके श्रवण समुद्र समाना । कथ तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥
भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिनके हिय तुम कहं गृह रूरे ॥
काम क्रोढ मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥
जिनके कपट दंभ नहिं माया । तिनके ह्रदय बसहु रघुराया ॥
सबके प्रिय सबके हितकारी । दु:ख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥
कहहिं सत्य प्रिय वचन विचारी । जागत सोबत सरन तुम्हारी ॥
तुमहि छाँडि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिनके उर माँही ॥
जननी सम जानहि परनारी । धनु पराव विष तें विष भारी ॥
जे हरषांहे पर संपति देखी । दुअंखत होहिं पर विपति बिसेखी ॥
जिन्हहिं राम तुम प्रान पियारे । तिन्हके मन सुभ सदन तुम्हारे ॥

स्वामि सखा पितुमातु गुरु, जिन्हके सब तुम्ह तात ।
तिन्हके मनमंदिर बसहु, सीय सहित दौ भ्रात ॥
चित्रकूट के  घाट पर भै संतनकी भीर ।
तुलसिदास चंदन घिसें तिलक करैं रघुवीर ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम्

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम ।
तनु परहरि रघुबर विरह राउ गयौ सुरधाम ॥
जोरि पानि वर मागौं एहू ।
सीय राम पद सहज सनेहू ॥
जग जपु राम, राम जपु जेही ।
अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहहुँ निरबान ।
अनम जनम रति रामप्द, यह बरदान न आन ॥
मोहि लागी लगन हरि दर्शन की ।
जनम जनम रति रामपद, यहि वरदान न आन ।
कार्पण्यदोषोपहतहस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेता ।

जाकर नाम मरत मुख  आवा ।
अधमौ मुकुत होइ श्रुति गावा ॥
सो मम लोचन गोचर प्रागे  ।
राखहुँ देह नाथ केहि खांगें ॥

सुनहु उमा ते लोग अभागी ।
हरि तजि होहिं विषय अनुरागी ॥

रामनाम तो सब कहें, दशरथ कहे न कोइ ॥

अवगुन कबनु नाथ मोहि मारा ।

जनम जनम मुनि जतन कराहीं ।
अंत राम कहि आवत नाहीं ॥

सुर नर मुनि सबकी यह रीती ।
स्वारथ लागि करहिं सब प्रीती ॥

ह्रदय राखि कोशलपुर राजा

जे रामेश्वर दरसनु करिहहिं ।
ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥

राघवं शरणं गत: ।

निर्मल मन जन सो मोहि पावा ।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा ॥

विभीषन शरण आयो, करऽयो लंकाधीश ।
यह सुनी रावण शरण आये तो करहुं कौशलाधीश ॥

ब्रम्हविद ब्रम्हौव भवति ।

श्रीराम जैसा कोई पुत्र नहीं हुआ ।
वसिष्ठ जैसा कोई गुरु नहीं हुआ ।
दशरथ जैसा कोई पिता नहीं हुआ ।
कौशल्या जैसा कोई माता नहीं हुई ।
श्रीराम जैसा कोई पिता नहीं हुआ ।
सीता जैसा कोई पत्नी नहीं हुई ।
भरत जैसा कोई भाई नही हुआ ।
रावण जैसा कोई शत्रु नहीं हुआ ।

बालकांड श्रीराम का चरण है ।
अयोध्याकांड श्रीराम का जंघा है ।
अरण्यकांड श्रीराम का उदर है ।
किष्किंधाकांड श्रीराम का ह्रदय है ।
सुंदरकांड श्रीराम का कंठ है ।
लंकाकांड श्रीराम का मुख है ।
उत्तरकांड श्रीराम का मस्तक है ।
कह हनुमन्त विपति प्रभु सोई ।
जब तब सुमिरन भजन न होई ॥

एहि तन कर फल विषय न भाई ।
स्वर्गहु स्वल्प अन्त दुखदाई ॥
नरतनु पाइ विषय मन देहीं ।
पलटि सुधा ते सठ विष लेहीं ॥

न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति ।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥

जीर्यतो या न जीर्यते ।

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता: ।
तृष्णा न जीर्ण वयमेव जीर्ण: ॥

गीता में कहा गया हैं :---
न मे भक्त: प्रणश्यति ।

न कामयेऽहं गतिंइश्वरात् परामष्टर्द्धियुक्तामपुनर्भवं वा ।
आर्ति प्रपद्येऽखिलदेहमाजामन्त: स्थिंतोयेन भवन्त्यदु:खा: ॥

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ॥

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Last Updated : November 11, 2016

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