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संस्कृत सूची|संस्कृत साहित्य|वेदः|ऋग्वेदः|मण्डल ५|
सूक्तं ७१

मण्डल ५ - सूक्तं ७१

ऋग्वेद फार प्राचीन वेद आहे. यात १० मंडल आणि १०५५२ मंत्र आहेत. ऋग्वेद म्हणजे ऋषींनी देवतांची केलेली प्रार्थना आणि स्तुति.


सूक्तं ७१
आ नो गन्तं रिशादसा वरुण मित्र बर्हणा ।
उपेमं चारुमध्वरम् ॥१॥
विश्वस्य हि प्रचेतसा वरुण मित्र राजथः ।
ईशाना पिप्यतं धियः ॥२॥
उप नः सुतमा गतं वरुण मित्र दाशुषः ।
अस्य सोमस्य पीतये ॥३॥

Translation - भाषांतर
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References : N/A
Last Updated : 2016-11-11T12:47:33.3100000

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शांखायन

  • n. ऋग्वेद का एक अद्वितीय शाखाप्रवर्तक, आचार्य, जो स्वयं के शाखान्तर्गत ‘संहिता’, ‘ब्राह्मण’, ‘आरण्यक’, ‘उपनिषद’ श्रौत्रसूत्र, गृह्यसूत्र आदि ग्रंथों का रचयिता माना जाता है । कुषीतक ऋषि का पुत्र होने के कारण, इसके द्वारा विरचित समस्त वैदिक साहित्य ‘कौपीतकि’ अथवा ‘शांखायन’ नाम से सुविख्यात है । टीकाकार आनतीय के अनुसार, इसे ‘सुयज्ञ’ नामांतर भी प्राप्त था [सां. गृ. ४.१०, ६.१०] । ‘शांखायन आरण्यक’ में भी इसका निर्देश प्राप्त है [शां. आ. १५.१] 
  • शंखायन संहित n. व्यास की ऋक्शिष्यपरंपरान्तर्गत पाँच प्रमुख शाखाएँ मानी जाती थीं, जिनकी नामावलि निम्नप्रकार हैः-- १. शाकल २. बाष्कल ३. आश्र्वलायन ५. शांखायन ६. माण्डुकेय। इन पाँच शाखाओं में से शांखायन शाखा का प्रणयिता यह माना जाता है, जिसकी शांखायन, कौषीतकि आदि विभिन्न उपशाखाएँ थीं। इस शाखा में प्रचलित ‘ऋग्वेद संहिता’ प्रायः सर्वत्र शाकल शाखांतर्गत ऋक्संहिता से मिलती जुलती थीं। वर्तमानकाल में प्राप्त ऋग्वेदसंहिता शाकल शाखा की मानी जाती हे। 
  • शांखायन ब्राह्मण n. ऋग्वेदसंहिता के दो ब्राह्मण ग्रंथ माने जाते हैः---१. ऐतरेय; २. शांखायन अथवा कौषीतकि। ‘कौषीतकि ब्राह्मण में’ कुल ३० अध्याय है, एवं यज्ञ की श्रेष्ठता प्रतिपादन करना, एवं उसकी शास्त्रीय व्याख्या करना इस ग्रंथ का प्रमुख उद्देश्य है । यद्यपि ऐतरेय एवं कौषीतकि ब्राह्मण एक ही ऋग्वेद के हैं, फिर भी, विषय प्रतिपादन के दृष्टि से ये दोनों ग्रन्थ काफ़ी विभिन्न हैं। विषयप्रतिपादन के स्पष्टता के दृष्टि से ‘कौषीतकि ब्राह्मण’ ऐतरेय ब्राह्मण के कतिपय श्रेष्ठ प्रतीत होता हे। इस ब्राह्मण में इसका निर्देश ‘कौषीतकि’ एवं ‘कौषीतक’ एवं ‘कौषीतक’ इन दोनों नाम से प्राप्त है । 
  • शांखायन आरण्यक n. यद्यपि आरण्यक ग्रंथों की संख्या अनेक बतायी गयी है, फिर भी इनमें से केवल आठ ही आरण्यक ग्रन्थ आज उपलब्ध हैं, जिनकी नामावलि निम्न प्रकार हैः---१. ऐतरेय; २. शांखायन; ३. तैत्तिरीय. ४. माध्यंदिन; ५. बृहदारण्यक; ६. जैमिनीयोपनिषदारण्यक ७. छांदोग्यारण्यक। इनमें से ‘कौषीतकि आरण्यक’ में ‘कौषीतक ब्राह्मण’ का ही कई भाग पुनरध्दृत किया गया है, जिनके पंद्रह अध्याय हैं। सायण के अनुसार अरण्यों में पढ़ायें जाने के कारण इन ग्रन्थों को ‘आरण्यक’ नाम प्राप्त हुआ। वनवासी वानप्रस्थियों को यज्ञयागादि कर्मों की दीक्षा देना इन ग्रन्थों का प्रमुख उद्देश्य है । जिस प्रकार गृहस्थाश्रम के यज्ञादि कर्मों का वर्णन ‘ब्राह्मण’ ग्रंन्थों में प्राप्त है, इसी प्रकार वानप्रस्थाश्रम के यज्ञादि विधियों का वर्णन आरण्यक ग्रंथों में प्रतिपादित किया है । उनमें कर्मकांड के साथ, धर्म की अध्यात्मिक व्याख्या भी दी गयी है, एवं इस प्रकार, ज्ञानमार्ग एवं कर्ममार्ग का समन्वय किया गया है । ‘ऐतरेय’ एवं ‘कौषीतकि’ दोनों ग्रंथों के आद्य भाष्यकार सायण एवं शंकराचार्य माने जाते हैं। शांकरभाष्य के सुप्रसिद्ध टीकाकारों में आनंदगिरि, आनंदतीर्थ (आनंदज्ञान), नारायणेंन्द्र सरस्वती एवं कृष्णदास प्रमुख माने जाते है । 
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