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श्रीकृष्ण माधुरी - पद ७६ से ८०

इस पदावलीके संग्रहमें भगवान् श्रीकृष्णके विविध मधुर वर्णन करनेवाले पदोंका संग्रह किया गया है, तथा मुरलीके मादकताका भी सरस वर्णन है ।


७६.
राग कान्हरौ
राजत री बनमाल गरैं हरि आवत बन तैं।
फूलनि सौं लाल पाग, लटकि रही बाम भाग,
सो छबि लखि सानुराग, टरति न मन तैं ॥१॥
मोर मुकुट सिर सिखंड, गोरज मुख मंजु मंड,
नटवर बर वेष धरैं आवत छबि तैं ।
सूरदास प्रभु की छबि ब्रज ललना निरखि थकित
तन मन न्यौछावर करैं, आनँद बहु तै ॥२॥

७७.
राग गौरी
ब्रज कौं, देखि, सखी ! हरि आवत।
कटि तट सुभग पीतपट राजत, अद्भुत भेष बनावत ॥१॥
कुंडल तिलक चिकुर रज मंडित, मुरली मधुर बजावत।
हँसि मुसुकानि, बंक अवलोकनि, मनमथ कोटि लजावत ॥२॥
पीरी, धौरी, धूमरि, गोरी लै लै नाउँ बुलावत।
कबहूँ गान करत अपनी रुचि करतल तार बजावत ॥३॥
कुसुमित दाम मधुप कुल गुंजत, संग सखा मिलि गावत।
कबहुँक नृत्य करत कौतूहल, सप्तक भेद दिखावत ॥४॥
मंद-मंद गति चलत मनोहर, जुबतिनि रस उपजावत।
आनँद कंद जसोधा नंदन सूरदास मन भावत ॥५॥

७८.
कमल मुख सोभित सुंदर बैनु।
मोहन राग बजावत गावत, आवत चारैं धैनु ॥१॥
कुंचित केस सुदेस बदन पै, जनु साज्यौ अलि सेनु।
सहि न सकत मुरली मधु पीवत, चाहत अपनौं ऐनु ॥२॥
भ्रकुटि मनौ कर चाप आप लै भयौ सहायक मैनु।
सूरदास प्रभु अधर सुधा लगि उपज्यौ कठिन कुचैनु ॥३॥

७९.
राग केदारौ
नैननि निरखि हरि कौ रुप।
चित्त दै मुख चितै, माई ! कमल ऐन अनूप ॥१॥
कुटिल केस सुदेस अलिगन, नैन सरद सरोज।
मकर कुंडल किरन की छबि दुरत फिरत मनोज ॥२॥
अरुन अधर, कपोल, नासा, सुभग ईषद हास।
दसन दामिनि, लजत नव ससि, भ्रकुटि मदन बिलास ॥३॥
अंग अंग अनंग जीते, रुचिर उर बनमाल।
सूर सोभा हृदै पूरन देत सुख गोपाल ॥४॥

८०.
हरि कौ बदन रुप निधान ॥
दसन दाडिम-बीज राजत, कमल कोष समान।
नैन पंकज रुचिर द्वै दल, चलन भौंहनि बान ॥१॥
मध्य स्याम सुभाग मानौ अली बैठ्यौ आन।
मुकुट कुंडल किरन करननि, किएँ किरन को हान ॥२॥
नासिका, मृग तिलक ताकत चिबुक चित्त भुलान।
सूर के प्रभु निगम बानी, कौन भाँति बखान ॥३॥

( गोपी कहती है- ) सखी ! गलेमे वनमाला पहिने श्यामसुन्दर वनसे आते हुए बडी शोभा पा रहे है । फूलोंसे सजी लाल पगडी बायी ओर लटक रही है, इस शोभाको प्रेमपूर्वक देखनेके बाद यह मनसे हटती ही नही । मस्तकपर मयूरपिच्छका ) मुकुट है, मुख गायोंके खुरोंसे उडी धूलिसे सुशोभित है, श्रेष्ठ नट-जैसा उत्तम वेष बनाये बडी छटासे आ रहे है । सूरदासजी कहते है- मेरे स्वामीकी ( यह ) शोभा देखकर व्रजकी स्त्रियाँ मुग्ध हो अत्यन्त आनन्दसे ( उनपर ) अपना तन-मन न्यौछावर कर देती है ॥७६॥

( गोपी कहती है- ) ’ सखी ! देख, श्यामसुन्दर व्रज आ रहे है । कमरमे मनोहर पीताम्बर सुशोभित है, विचित्र वेष बना रखा है । कानोंमे कुण्डल है, ललाटपर तिलक है, केश धूलिसे भूषित है और मधुर स्वरमे वंशी बजा रहे है । इनका मुस्कराकर हँसना तथा तिरछे देखना तो करोडो कामदेवोंको लज्जित कर रहा है । ’ पीली ! धौरी ( उजली ) ! धूमरी ( मटमैली ) ! गोरी ( लाल ) ! ’ आदि नाम ले-लेकर गायोंको बुलाते हैं । कभी अपनी रुचिसे गाते और हथेलियोंसे ताल देते है । फूलोंकी मालापर भौरेंका झुंड गुंजार कर रहा है, साथके सखा मिलकर गा रहे है । कभी विनोदसे नाचने लगते है और सातो स्वरोंके ( मन्द्र, मध्य और तार-तीनो ) भेद दिखलाते है । अत्यन्त मनोहर मन्द-मन्द चालसे चलते हुए युवतियोंमे प्रेमका संचार करते है । सूरदासजी कहते है- ( ये ) आनन्दकन्द श्रीयशोदानन्दन मेरे चित्तको अत्यन्त प्रिय लगते है ॥७७॥

कमल-मुखपर सुन्दर वंशी शोभा दे रही है। मनोमुग्धकारी राग बजाते, गाते हुए श्यामसुन्दर गाये चराकर आ रहे है । मुखपर घुँघराले केश ( झूमते हुए ) सुशोभित हो रहे है मानो भौंरेकी सेना सजी हो । वे ( भ्रमर मानो ) यह नही सह पा रहे है कि मुरली ही ( मुखकमलका ) मधु पीती रहे; अपना निवासस्थान ( मुखरुपी कमल ) वे पा लेना चाहते है । भौंहे ऐसी है मानो स्वयं हाथमे धनुष लेकर कामदेव ( अलकरुपी भौंरोंका ) सहायक हो गया है । सूरदासजी कहते है कि मेरे स्वामीकी अधर-सुधाके लिये ( इस प्रतिद्वन्दिताको देखकर ) मेरे मनमे भी ( उसे पानेके लिये ) बडी बेचैनी हो गयी है ॥७८॥

( गोपी कहते है- ) सखी ! हरिके रुपको आँखोसे देख। अरी, ध्यान लगाकर उस मुखको देख, जो अनुपम कलम-कोषके समान है। सुन्दर घुँघराली अलके ऐसी लगती है जैसे भौंरेंका समूह हो; नेत्र शरद-ऋतुमे खिले कमलके समान है तथा मकरके समान कुण्डलोंकी किरणोंकी शोभा देखकर कामदेव भी ( लज्जित होकर ) छिपता फिरता है । लाल-लाल ओठ है, सुन्दर कपोल और मनोहर नासिका है, मन्द-मन्द मुसकराते है । दाँतोंकी कान्ति बिजलीके समान है, जिसे देखकर नवीन चन्द्रमा भी लज्जित होता है और उनकी भृकुटी कामका क्रीडास्थल है । ( उनके ) अंग-अंगने कामदेवको जीत लिया है । सुन्दर वक्षःस्थलपर वनमाला है । सूरदासजी कहते है कि गोपाल अपनी शोभासे हृदयको पूर्ण आनन्द दे रहे है ॥७९॥


श्यामका मुख रुपका खजाना ( कोष ) है । उसमे दन्तावलियाँ इस प्रकार शोभित है, जैसे कमलके कोष ( बीच ) मे अनारके दाने रखे हो । नेत्र कमलकी दो सुन्दर पँखुडियोंके समान है और भौंहोंके साथ उनका चलना बाणकी भाँति है । ( उन ) नेत्रोंके मध्यका सुन्दर श्याम भाग ( पुतलीरुप ) जो है, वह ऐसा लगता है मानो वहाँ भौंरा आकर बैठ गया हो । मुकुट और कानोंके कुण्डलोंने अपनी किरणोंसे सूर्यकी किरणोंको भी तुच्छ बना दिया ( उनको अपनी कान्तिमें लुप्त ही कर दिया ) है । नासिका, कस्तूरीका तिलक तथा ठुड्डीको देखते ही चित्त वही भूल ( ठिठक ) जाता है । ( ऐसे ) सूरदासके स्वामीका वेदकी वाणी भी किस प्रकार वर्णन कर सकती है । ( अर्थात वे वेदोंके लिये भी अवर्णनीय है, तब दूसरा उनके वर्णनमे समर्थ हो कैसे सकता है । ) ॥८०॥


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Last Updated : November 19, 2010

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