Dictionaries | References

कृष्ण

See also :
KṚṢṆA (ŚRĪ KṚṢṆA)
वि.  काळा , श्याम , श्यामल , सावळ ;
वि.  कपटी , कारस्थानी .
The name of the eighth incarnation of विष्णु.
Black or dark blue; esp. the color of a surcharged cloud.
 पु. १ विष्णुच्या दशावतारांपैकीं आठवा अवतार ; गोकुळांतील गोपाळकृष्ण ; देवकीपुत्र ; वासुदेव . २ अर्जुनांचें एक नांव - वि . १ काळा ; पाण्यानें बह्रलेल्या मेघासारखा ; सांवळा . २ कपटी . ( सं .)
०करणें   क्रि . काळें करणें ; तोंड फिरविणें ; नाहीसें होणें . सामाशब्दः -
०कनक  पु. काळा धोत्रा .
०कावळा  पु. सोनकावळा ; ज्याची मान पांढरी असते असा कावळा ( श्रीकृष्णानें ह्या कावळ्याच्या मानेला दहीं फांसलें अशीं दंतकथा आहे त्यावरुन ). कृत्य - न . वाईट , कपटाचें , नीच काळेबरें कृत्य . ( सं .)
०गुजरी  स्त्री. एक प्रकारची लुगड्याची जात .
०ग्रंथीं  स्त्री. सोडण्यास कठिण अशी गांठ ( श्रीकृष्णांनें गोकुळांत एका गवळ्याच्या दाढीची व त्यांच्या बायकोच्या वेणीची गांथ बांधली होती त्यावरुन ). ( सं .)
०तालु   तालुका टाळु ताळू - वि . ज्याची टाळु काळी आहे असा ( घोडा ); हें अशुभ चिन्ह मानितात .
०तुळस  स्त्री. काळी तुळस .
०धत्तूर  पु. काळा धोत्रा . ( सं .)
०पक्ष  पु. १ काळोख्या रात्रीचा पंधरवडा ; वद्य पक्ष ; ज्यामध्यें चंद्राच्या कळा उत्तरोत्तर कमी होत जातात तो पक्ष २ ( ल .) उतरती कळा ; क्षय ; र्‍हास . ३ ज्याकडें दोष आहे असा पक्ष , बाजू . ' आस्तिक व नास्तिक , शुक्लपक्ष व कृष्णपक्ष अशा जोडप्यांतील तंटें एक तर स्वल्पजीवि असतात ...' - आगर ३ . २०२ .
०पक्ष   शुक्लपक्ष - पु . १ घत आणि वाढ ; क्षय आणि वृद्दि . २ खोटेपणा व खरेपणा वाईट आणी चांगलें . ०पक्षीं - पुअव . ( ना .) विदुर जातीचें लोक .
०मणी  पु. विवाहित स्त्रियांनी घालावयाचा काळ्या मणांचा गळेसर ( सं .)
०मत   गौरहारी पहा . ०मूग - पु . काळ्या रंगाची मुगाची एक जात .
०मूर्ति  स्त्री. अतिशय काळा माणुस ; काळाकुळकुळीत माणुस .
०मृग   सार - पु . काळवीट . ' शरभापुढें टिकेना सिंहहि मग काय कृष्णासार थिरे । ' - मोद्रोण ११ . ६७ . ( सं .)
०मृत्तिकी  स्त्री. बंदुकीची दारू . वर्ण - पु . काळा रंग .
०वर्ण   काळें होणें ; एखादी वस्तु , मरणानें किम्वा अन्य तर्‍हेंनें दृष्टीआड होणें . ( एखाद्याचा अत्यंत तिरस्कार आला असतां योजितात ). ' त्या गुलामाचें ज्या दिवशीं कृष्णवर्न होईल तेव्हा मी येईन .'
होणें   काळें होणें ; एखादी वस्तु , मरणानें किम्वा अन्य तर्‍हेंनें दृष्टीआड होणें . ( एखाद्याचा अत्यंत तिरस्कार आला असतां योजितात ). ' त्या गुलामाचें ज्या दिवशीं कृष्णवर्न होईल तेव्हा मी येईन .'
०वस्त्र  न. काळें वस्त्र . ( सं .)
०वाळा  पु. काल्या रंगाचा वाळा .
०विलास   क्रिडा - पुस्त्रीअव . १ श्रीकृष्णाच्या गोकुळांतील क्रीडा , खोड्या , लीला , पुंडावा . २ ( ल .) अर्वाच्य खोड्या , खेळ . ३ व्यभिचार ; सुरतविलास .
०सुट वि.  मानेवरील केंस काळे , आवाज मेघनगार्‍याप्रमाणें , गंभीर श्वास , कृष्णसर्पासारखा , गति उत्तम आणि धाडसी असा ( घोडा ) - अश्वप १ . २३ .
n.  (सो. यदु. वृष्णि.) वसुदेव को देवकी से उत्पन्न आठ पुत्रों में कनिष्ठ । इस का जन्म मथुरा में कंस के कारागृह में हुआ [भा. ९.२४.५५,१०.३];[ विष्णु.४. १५,५.३];[ ह. वं. १.३५];[ कूर्म.१.२४];[ गरुड.१.१३९] । विवाह के पश्चात्, श्वशुरगृह में वहन को पहुँचाते समय, देवकीपुत्र द्वारा अपनी हत्या होगी यह जान कर, कंस ने वसुदेवदेवकी को कारागर में रखा । देवकी के सात पुत्रों को क्रम से उसने पटक मारा । कृष्ण आठवॉं पुत्र हैं, जिसका जन्म विक्रम संवत् के अनुसार, भाद्रपद वद्य अष्टमी की मध्यरात्रि में रोहिणी नक्षत्र पर हुआ । वह दिन बुधवार था (निर्णयसिंधु) । वसुदेव उग्रसेन का मंत्री था । उग्रसेन को बंदिस्त कर के कंस राजगद्दी पर बैठा था । अतः कंस पहले से वसुदेव को प्रतिकूल था । वसुदेव के देवकी से उत्पन्न पुत्रों को ही नहीं, वल्कि अन्य स्त्रियों से प्राप्त पुत्रों को भी कंस द्वारा मारे जाने का उल्लेख, भागवत को छोड कर, अन्य पुराणों में मिलता है [वायु. ९६.१७३-१७८] । वसुदेव ने कृष्ण की रक्षा के लिये, गोकुल में नंद के घर पहुँचाया । गोकुल से यशोदा की कन्या ले कर वसुदेव पुनः कारागार में उपस्थित हुआ । कंस ने उस कन्या को भी मारने का यत्न किया, किन्तु वह हाथ से छूट गयी । यहीं कंस को पता लगा कि, वसुदेवसुत पैदा हो कर सुरक्षित स्थान पर पहुँच गया है । नन्दकुलोपाध्याय गर्गमुनि ने गुप्तरुप से कृष्ण का जातक तथा नामकरण संस्कार किया । इसी समय कृष्ण के जीवनकृत्यों क भविष्यकथन भी किया ।
बाललीला n.  प्रथम कंस ने कृष्णवधार्थ पूतना भेजी, जो उसकी बहन वा दाई थी । गोकुल के बालकों को विषयुक्त स्तनपान करा कर मारने का क्रम पूतना ने जारी रखा । कृष्ण को स्तनपान कराने पर, कृष्ण ने उसका पूरा लहू चूस लिया तथा उसके प्राण लिये । तृणावर्त असुर का भी, पत्थर पर पटक कर कृष्ण ने वध किया । उसी समय यशोदा को कृष्ण के मुँह में विश्वरुपदर्शन हुआ । बकासुर, वत्सासुर, अवासुरादि का भी इसने वध किया । कालिया के फूत्कार के कारण, यमुनाजल विषयुक्त हुआ था । उसे भी मर्दन कर कृष्णने भगाया । धेनुकासुर, प्रलंबासुर, अरिष्ट, व्योम तथा केशि का भी कृष्ण ने वध किया । एक समय नन्द को यमुना से डूबते डूबते बचाया । गोकुल का प्रतिवार्षिक ‘इन्द्रोत्सव’ बंद कर के कृष्ण ने वहॉं गोवर्धनउत्सव का आरंभ किया । इससे इन्द्र ने कुपित हो कर गोकुल पर अतिवृष्टि की । कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत का आश्रय ले कर गोकुलवासियों को इस संकट से बचाया । कई पुराणों में कृष्ण बालचरित्र का ही केवल वर्णन है । यह बाललीला पूतनावध से प्रारंभ हो कर केशिवध के पास समाप्त होती है। पूतना, धेनुक, प्रलंब, अघ इन का वध, इन्द्रगर्वहरण, कालियामर्दन, दावाग्निभक्षण, गोवर्धनोद्धार, रासक्रीडा तथा कंसवध ये घटनाएं सब स्थानों में वर्णित हैं, केवल क्रम में भिन्नता है । कहीं संक्षेप में तथा कहीं विस्तार से वर्णन है । विष्णुपुराण में संक्षेप में बाललीला का वर्णन आया है । विशेषतः भागवत, ब्रह्मवैवर्त, हरिवंश एवं गर्गसंहिता में कृष्ण की केवल बाललीलाओं का वर्णन है । कृष्ण का पांडवों से संबंध केवल गर्गसंहिता में ही है । महाभारतवर्णित कृष्णचरित पुराणों में नहीं मिलता । उसका पांडवों को अप्रतिम सहाय, राजकाजकौशल्य और गीता केवल महाभारत में ही अंकित है । बाललीला में राधाकृष्ण-संबंध वर्णन करने की ब्रह्मवैवर्त पुराण की प्रवृत्ति है । यह संबंध आध्यात्मिक माना जाता है । राधाकृष्ण-विवाह ब्रह्मदेवद्वारा संपन्न हुआ था [ब्रह्मवै. ४.१५]
कंसवध n.  कृष्ण की मल्लविद्या की कीर्ति सुन कर, कंस उसे अक्रूरद्वारा मथुरा ले आया । मथुरा में वसुदेव-देवकीं से मिलना कंस को अप्रिय होगा यह अक्रूर द्वारा बताने पर भी, आत्मविश्वास के साथ कृष्ण अपने मातापिता से मिले । शहर में घूमते समय, एक धोबी से कृष्ण ने कपडे लिये, एक माली ने पुष्पहार गले में डाला तथा कुब्जा ने चंदन लेप चढाया । शस्त्रागार में जा कर इसने भव्य धनुष का भंग किया । यह सब देख कर कंस ने चाणूर, मुष्टिक नामक मल्लों को, कृष्ण के साथ मल्लयुद्ध करने के लिये भेजा । मैदान के द्वार पर ही, कंस द्वारा छोडे गये कुवल्यापीड हाथी को कृष्ण ने सहजता से मारा । मल्लयुद्ध में चाणूर तथा तोषलक को मारा । कृष्ण के ये सब पराक्रम देख कर, कंस का मस्तक चकराने लगा । कृष्ण ने उसे सिंहासन से खींच कर उसका वध किया । समुदाय ने कृष्ण की जयध्वनि की । वसुदेवदेवकीं से मिल कर तथा उग्रसेन को गद्दी पर बिठा कर, कृष्ण ने मथुरा में शांति प्रस्थापित की । बलराम ने पूरे समय तक कृष्ण की साथ की ।
शिक्षा n.  नंदादि गोपालों को मथुरा ला कर, तथा सत्कार कर कृष्ण ने उन्हें वापस गोकुल भेजा । यशोदा के सांत्वनार्थ उद्धव को गोकुल भेजा । गर्गमुनि द्वारा उपनयनसंस्कारबद्ध हो कर, रामकृष्ण, काश्यसांदीपनि के यहॉं अध्ययनार्थ अवंति गये । एकपाठी होने से ६४ दिनों में ही इन्हों ने वेदों का तथा धनुर्वेद का अध्ययन किया [ब्रह्म. १९४.२१];[ ह.वं. २. ३३];[ भा. १०.४५. ३६];[ विष्णु. ५.२१] । सांदीपनि ने इन्हें गायत्री मंत्रोपदेश देने का भी उल्लेख है [दे.भा.४.२.१] । इसके उपनयन प्रसंग में देव, नंद, यशोदा तथा विधवा कुन्ती उपस्थित थीं [ब्रह्मवै. ४. १०१] । इस समय कृष्ण की आयु १२ वर्षों की थीं [दे. भा.४. २४] । गुरुदक्षिणा के रुप में सांदीपनि का, मृत पुत्र दत्त कृष्ण ने सजीव कर दिया [पद्म.३. २४६];[ ब्रह्म.१९४.३१] । यहीं पंचजनों का वध कर के, विख्यात पांचजन्य शंख कृष्ण ने प्राप्त किया [भा.१०.४५.४२];[ म. भीं.२३.१६]
विवाह n.  इसने शिशुपाल का पराभव कर के, भीष्मक राजा की कन्या रुक्मिणी का हरण किया । स्यमत्नकमणिप्रसंग में, जांबवती तथा सत्यभामा से इसका विवाह हुआ । इसी समय सत्राजित का वध करनेवाले शतधन्वन् क इसने वध किया । कुछ काल के बाद, कृष्ण कुछ यादवों सह पांडवों से मिलने के लिये इन्द्रप्रस्थ गया । तब चातुर्मासमाप्ति तक पांडवों ने इसे वही रख लिया। उस काल में इसका कालिंदी से विवाह हुआ । बाद में द्वारका जाने पर, मित्रविंदा, सत्या (नाग्नजिती), भद्रा, कैकयी तथा लक्ष्मणा (सुलक्षणा) का स्वपराक्रम से हरण कर के इसने विवाह किया [भा.१०.५८,९०.२९-३०] । इसके अष्टनायिकाओं में सुलक्षणा, नाग्रजिती तथा सुशीला थी । सुमित्रा, शैव्या, सुभीमा, माद्री, कौसल्या, विरजा [पद्म. सृ.१३.१५५-१५६] । अनुविंदा तथा सुनंदा ये भिन्न नाम भी प्राप्त है [पद्म. पा.७०.३३] । इन में कई नाम गुणदर्शक दीखते है । कृष्ण ने नरकासुर का वध किया । उसके कारागृह में सोलह हजार स्त्रियॉं थीं । उन्हें मुक्त कर कृष्ण ने उनसे विवाह किये [भा. १०.५९.३३];[ विष्णु.५.२९.३१] । इस प्रकार उनके उद्धार का श्रेय भीं संपादन किया । एक ही समय अनेक रुप धारण करने का कृष्ण में सामर्थ्य था । नरकासुर का वध कर के लौटते समय, कृष्ण ने इंद्र का पारिजातक वृक्ष तोड दिया । तब क्रोधित हो कर इंद्र ने कृष्ण से युद्ध किया । परंतु इन्द्र का बस नहीं चला । तब कृष्ण ने उससे कहा कि, जबतक मैं पृथ्वी पर हूँ, तब तक यह वृक्ष यहीं रहने दो । बाद में उसे ले जाना [पद्म.३. २४८-२४९] । कृष्ण के कुल अस्सी हजार पुत्र थे [पद्म. सृ. १३] पुत्रों के नाम उनकी माताओं के चरित्र में देखिये । जांबवती को पुत्र प्राप्ति हो इस हेतु से, कृष्ण ने महादेव की तपस्या कर के, उससे वर प्राप्त किया [म.अनु.४६] । एक बार यह अपनी स्त्रियों से क्रीडा कर रहा था । तब नारद के आदेशानुसार जांबवतीपुत्र सांब वहॉं गया । उस समय कृष्ण की पत्नियों ने मद्यपान किया था । अतएव वे उस पर मोहित हो गई । तब कृष्ण ने उन्हें शाप दिया कि, ‘तुम लोग चुरा ली जाओगी । किन्तु दाल्यद्वारा बताये गये व्रत द्वारा तुम्हारा उद्धार होगा’। इसने सांब को शाप दिया कि, तुम कुष्ठरोगी बनोगे [पद्म. सृ.२३];[ स्कंद.७.१.१०१] । मथुरा में यशोदा की कन्या एकानंगा के साथ रामकृष्ण की भेंट हुई । इसके लिये ही कृष्ण ने कंस का वध किया [म.स.१.२१.१४२८-१४३०] । बाणासुर के हजार हाथ भी इसने तोडे [ब्रह्मांड.३.७३.९९-१०२];[ वायु. ८८.९८-१०२] । इसके अश्वों के नाम शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प तथा बलाहक थे [म.आश्व.१.४.३४२४] । पांडवों के राजसूय तथा अश्वमेध में यह उपस्थित था [म.आश्व.८. ९]
जरासंबवध n.  कंसवध के कारण जरासंध क्रुद्ध हुआ । कंस जरासंध का दामद था । उस समय जरासंध सम्राट था । जरासंध के कारागार में हजारों नृप बंदिवान थे । उन्होंने भी कृष्ण के पास अपनी मुक्तता के लिये संदेश भिजवाया था । कृष्ण ने यादवसभा में इस प्रश्न को उठाया । जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया । कई राजा उसके सहायक थे । कृष्ण ने उसका सत्रह बार पराजय किया । कालयवन का भी जरासंध ने सहाय्य लिया । कालयवन ने मथुरा को चारों ओर घेरा डाला । कृष्ण, इस समय अगतिक हो कर भागते भागते, मुचकुंद सोया था वहॉं आया । पीछे कालयवन भी आ पहुँचा । कृष्ण चपलता से ऑखों से ओझ हो गया । मुचकुंद कालयवन द्वारा मारा गया । जरासंध के आक्रमण के भय से कृष्ण मथुरा छोड कर सुदूर द्वारका में आ बसा । वहॉं इसने अपनी नयी राजधानी बसयी । जरासंध ने वहॉं भी आग लगा दी तथा वह लौटा । कृष्ण बच गया । कुछ स्थानों पर प्रवर्षणगिरि की जगह गोमंतक का उल्लेख है । इसी समय इंद्रप्रस्थ से युधिष्ठिर ने दूतद्वारा अपना राजसूय यज्ञ का विचार कृष्ण को कथन कर, उसको पाचारण किया । कृष्ण के सामने प्रश्न निर्माण हुआ कि, किस को अग्रस्थान दे । उद्धव ने, प्रथम इंद्रप्रस्थ जा कर पश्चात् जरासंध के यहॉं जाने की मंत्रणा, कृष्ण को दी । कृष्ण ने स्वयं इंद्रप्रस्थ जा कर, जरासंध के बंदिस्त राजाओं को तुरन्त ही मुक्त करने का आश्वासन दूतद्वारा भेजा । राजसूय यज्ञ के लिये भी, जरासंध जैसे प्रतापी प्रतिस्पर्धा का विनाश आवश्यक था । इसलिये ब्राहण वेष में कृष्ण, अर्जुन तथा भीम जरासंध के पास उपस्थित हुए । वहॉं गदायुद्ध में भीमद्वारा जरासंध का वध हुआ । उसके पुत्र को गद्दी पर बिठा कर, ये सब लौट आये [म.स.१२.२२]
शिशुपालवध n.  करुषाधिप पौंड्रक वासुदेव, तथा करवीराधिप शृगाल यादव का कृष्ण ने वध किया । भीष्म ने राजसूय यज्ञ में कृष्ण को अग्रपूजा का मान दिया । इस कारण शिशुपाल ईर्ष्या से भडक उठा । तब सुदर्शन चक्र से कृष्ण ने शिशुपाल का वध किया । यज्ञसमाप्ति के बाद यह द्वारका गया । बाद में शाल्व, दंतवक्र तथा विदूरथ का भी वध कृष्ण ने किया ।
भारतीययुद्ध n.  पांडव वनवास में थे । उस समय उनके यहॉं कृष्ण गया था । कृष्ण ने कहा, ‘मेरे होते हुए द्यूतक्रीडा असंभव हो जाती थी ।’ कुछ दिन वहीं रह कर, सुभद्रा तथा अभिमन्यु को लेकर यह द्वारका गया [म. व. १४.२४] । पांडव काम्यकवन में थे । कृष्ण सत्यभामा के साथ वहॉं गया था । कुछ दिन वहॉं रह कर द्वारका लौटा [म.व.१८०.२२४] । दुर्योधन के कथनानुसार दुर्वास पांडवों के यहॉं गया था । तब द्रौपदी की सहायता कर कृष्ण ने दुर्वास ऋषि को तुष्ट किया [म.व.परि.१.२५] । अभिमन्यु के विवाहार्थ कृष्ण उपप्लव्य गया था । तब सम्मिलित राजाओं की उपस्थिति में इसने पांडवों के हिस्से का प्रश्न उठाया । दुर्योधन को अमान्य है यह जान कर, इसने उधर जाने का निश्चय क्रिया [म.वि. ६७] । अर्जुन तथा दुर्योधन कृष्ण के समीप युद्धार्थ सहायता मॉंगने गये । दुर्योधन की मॉंग के अनुसार उसे यादव सेना दी । स्वयं अर्जुन के पक्ष में गया । युद्ध में प्रत्यक्ष भाग न लेने की कृष्ण के प्रतिज्ञा थी । फिर भी अर्जुन ने उसे ही मॉंग लिया [म.उ.७] । इस प्रकार युद्ध की तैयारियॉं कौरव-पांडव कर रहे थे । तब युधिष्ठिर ने धृतराष्ट्र के यहॉं कृष्ण को मध्यस्थ के नाते भेजा । किन्तु कुछ लाभ न हुआ । कृष्ण आयेगा, इस लिये धृतराष्ट्र ने हस्तिनापुर से वृकस्थल तक मार्ग सुशोभित किया था [म.उ. ७१.९३] । दुर्योधन ने कृष्ण को भोजन का निमंत्रण दिया । कृष्ण ने उसे अमान्य किया [म.उ. ८९.११] । वहॉं दिय गये भाषण से कौरवों के सब दुष्कृत्य स्पष्ट हुए । सब सदस्यों को पांडवों का पक्ष न्यायसंगत प्रतीत हुआ । भीष्म द्रोणादिक भी कृष्ण के समर्थक बने । भीष्म, द्रोणाचार्य, गांधारी, धृतराष्ट्र, कण्व, नारदादि ने अनेक प्रकार से दुर्योधन को समझाया । किन्तु वह नहीं माना । सभा की शांति नष्ट होते देख, दुःशासन ने दुर्योधन को इशारे से बाहर जाने को कहा । भीष्म ने इस समय ‘क्षत्रियों का विनाश काल समीप हैं,’ यों प्रकट किया । दुर्योधन का कृष्ण को बंदिस्त करने का विचार था, जो सात्यकि ने सभा में प्रकट किया । उल्टे दुर्योधन को ही पांडवों के यहॉं बॉंध कर ले जाने का सामर्थ्य की पर्याप्त निर्भर्त्सना की । कृष्ण ने इस समय अपना उग्र विश्वरुप प्रकट किया । सब भयभीत हुये । कृष्ण शांति से सभागृह के बाहर आया । दुर्योधन के न मानने की बात धृतराष्ट्रद्वारा विदित होते ही कृष्ण ने हस्तिनापुर छोडा [म.उ.१२९] । बाहर आकर कर्ण को उसका पांडवों से भ्रातृसंबंध कथित कर, उसे पांडवपक्ष में आने का आग्रह किया । उसके न मानने पर, कृष्ण उपप्लव्य चला आया । युद्धार्थ तैयारियॉं प्रारंभ हुई [म. उ. १३८-१४१] । कृष्ण ने धृष्टद्युम्न तथा सात्यकि की सहायता से पांडव सेना की बलिष्ठ सिद्धता की [म. उ. १४९-७२] । अर्जुन की प्रार्थना पर कृष्ण ने उसका रथ दोनों सेनाओं के बीच ला कर खडा किया । आप्तजन तथा बॉंधवों के संहार का चित्र सामने देखकर अर्जुन युद्धनिवृत्ति की बातें करने लगा । कृष्ण ने उसे ‘गीता’ सुनाकर, पुनः युद्धार्थ सिद्ध किया [म.भी. २३-४०] । यह दिन मार्गशीर्ष शुद्ध त्रयोदशी था । कृष्ण ने पांडवों को महान् संकटों से बचाया । रथ के अश्वों की सेवा की । उन्हें पानी भी पिलाया [म.द्रो. १७५.१५] । भगदत्त के वैष्णवास्त्र से अर्जुन की रक्षा की [म. द्रो. २८.१७] । अभिमन्युवध के बाद, सुभद्रा का सांत्वन किया [म. द्रो. ५४.९] । भूरिश्रवा को अन्तिमसमय में स्वर्ग की जानकारी दी [म. द्रो. ११८. ९६८] । अंधकार उत्पन्न कर के, जयद्रथवध की प्रतिज्ञापूर्ति, अर्जुन द्वारा करवाई [म.द्रो.१२१] । घटोत्कच को युद्ध में भेज कर, कर्ण की वासवी शक्ति से अर्जुन की रक्षा की [म. द्रो.१५४] । द्रोणवध के लिये, असत्य भाषण की सलाह युधिष्ठिर को दी [म.द्रो. १६४] । गांडीव धनुष्य दूसरे को देने की सलाह युधिष्ठिर से सुनते ही, अर्जुन उस पर तरवार खींच कर दौडा । इस समय उसे कृष्ण ने कौशिक-कथा बताकर इस कृत्य से परावृत्त किया [म.क.४९]; अर्जुन देखिये । रथ को पॉंच अंगुल धरती में गाड कर, कर्ण के सर्पयुक्त बाण से अर्जुन की रक्षा की [म.क.६६.१०८८] । धर्म को शल्यवध करने के लिये कहा [म. श. ६.२४-३८] । भीमद्वारा दुर्योधन की जॉंघ पर गदप्रहार करा के उसका वध करवाया [म.श.५७.३-१०] । इन सब कृत्यों के लिये दुर्योधन ने इसे दोष दिया [म.श.६०] । गांधारी की सांत्वना के लिये धर्म ने कृष्ण को हस्तिनापुर भेजा [म.श.६१.३९] । कृष्ण ने कौरवों के अन्यायपूर्ण व्यवहार उसे बताये । फिर भी गांधारी ने कृष्ण को दुर्मरण का शाप दिया [म.स्त्री.२५] । धृतराष्ट्र भीम से मिलने आया । लोहप्रतिमा उसकी गोद में सरका कर कृष्ण ने भीम की रक्षा की [म.स्त्री.११.१५] । अश्वत्थामा के अस्त्र से उत्तरा के गर्भ रक्षा की [म.सौ.१६.८]; उत्तरा देखिये इसने वसुदेव को भारतीययुद्ध कथा बतायी [म. आश्व. ५९]
यादवी n.  कण्व ऋषि का उपहास करने के कारण इसने सांब को शाप दिया [पद्म. उ. २५२] । इसी सांब को मूसल पैदा हुआ । उसी मूसल से सब यादवों का संहार हुआ । सांब, चारुदेष्ण, प्रद्युम्न तथा अनिद्ध मृत हो गये । पुत्रों की मृत्यु देख कर कृष्ण क्रोधित हुआ । गद का पतन देख कर इसका क्रोध अनिवार्य हुआ । तब बचे हुए सब यादवों का इसने वध किया । इस समय दारुक तथा बभ्रु ने कहा, ‘भगवान्, बचे हुए अधिकांश लोगों की हत्यां तो तुम ने कर ही दी । अब हमें बलराम की खोज करनी चाहिये ।’ क्रुष्ण ने यादवों में किसी का खास प्रतिकार नहीं किया, क्यों कि, कालचक्र अब उलटा चल रहा है, यह उसने देख लिया [म. मौ.४]
निर्णाय n.  कृष्ण का निर्याणसमय समीप आ गया । इसका उद्धव को पता चलते ही उसने कृष्ण की प्रार्थना की, “मुझे भी अपने साथ ले चलिये ।” कृष्ण ने उसे अध्यात्म का बोध किया [भा.११.७-२९] । यह बोध अवधूतगीता वा उद्धवगीता नाम से विख्यात है । अनन्तर द्वारका में दुश्चिह्र प्रकट होने लगे । बलराम ने सागर तट पर देह विसर्जन किया । कृष्ण अश्वत्थ वृक्ष के नीचे, दाहिनी जॉंघ पर बॉया पैर रख कर, चिन्तनावस्था में वृक्ष को चिपक कर बैठा था । इसी समय जरा नामक व्याध ने तलुवे पर मृग समझ कर तीर मारा, जो इसके बायें तलुवें में लगा । यह देखकर व्याध अत्यंत दुःखित हुआ । उसने कृष्ण से क्षमायाचना की । कृष्ण ने उसकी सांत्वना की, तथा उसे आशीर्वाद दिया । कृष्ण का सारथि दारुक वहॉं आया । उसने कृष्ण की वन्दना की । इसी समय कृष्ण का रथ भी गुप्त हो गया । कृष्ण ने दारुक से कहा, “मेरा प्रयाणसमय समीप आ गया है । द्वारका जा कर यह अनिष्ट प्रकर उग्रसेन से कथन करो । द्वारका शीघ्र समुद्र में डूबेगी । अतः सब लोगों को द्वारका से सुदूर जाने को बताओ’ । दारुक से यह वृत्त सुन कर द्वारका में हाहाकार मच गया । देवकी तथा रोहिणी ने देह विसर्जित किये । अष्टनायिकाओं ने कृष्ण के साथ अग्निप्रवेश किया [ब्रह्म. २११-१२] । प्रद्युम्नादिकों की पत्नियों ने भी यही किया । इसी समय अर्जुन भी इन्द्रप्रस्थ से आया । स्त्रियॉं तथा बालकों को लेकर वह इन्द्रप्रस्थ जा रथा था कि, द्वारका समुद्र में डूबी [म.मौ.८.४०]; देवकी तथा बहुलाश्व देखिये । मृत्युकाल में कृष्ण की आयु १२५ से भी अधिक थी [भा.११.६.२५];[ ब्रह्मवे. ४.१२९.१८] । १३५ की आयु में कृष्ण का निर्याण हुआ [भवि.प्रति.१.३.८१] । कृष्ण अर्जुन से ३ महीने ज्येष्ठ था ।
तत्त्वज्ञ कृष्ण n.  कृष्णचरित्र अपूर्व है । जन्म से निर्वाण तक प्रत्येक अवस्था में, इसने असामान्यता प्रकट की । कारागृह में जन्म ले कर, सुरक्षा के लिये गोकुल जाना गोपिकाओं के साथ ग्वालों का कार्य कर के मुरलीधर तथा राधाकृष्ण नाम प्राप्त किये । मल्लविद्या से ख्याति तथा लोकप्रियता संपादित कर के कुश्ती के मैदान में कंस का वध किया । सम्राट जरासंध के साथ मुकाबला करने से हस्तिनापुर के राजकारण में इसका प्रवेश हुआ । जगसंधवध तथा स्वयंबरों में शिशुपालादि बलिष्ठ नृपों को पराजित करने से युद्धकुशलता प्रकट हुई । आध्यात्मिक अधिकार के कारण भीष्म ने इसे राजसूययज्ञ में अग्रपूजा का माने दे कर सम्मानित किया । भारतीययुद्ध में अर्जुन का सारथ्य तथा कुशल संयोजक की इसकी भूमिका थी । युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन युद्धपरावृत्त होने लगा । गीता सुना कर उसे पुनः युद्धप्रवृत्त किया । अन्तसमय उद्धव को ज्ञान दिया । भगवद्नीता तथा उद्धव का उपदेश ये अध्यात्मशास्त्र के अपूर्व ग्रंथ है । कर्म कर के कर्मबंधन से मुक्ति पाने के लिये दोनों ग्रंथों में संकेत है । ज्ञान, भक्ति तथा लोकाचार का अटूट-संबंध प्रतिपादन करने से, कृष्ण का यह बोध अमर हुआ है । विशेषतः इन ग्रंथों ने कृष्ण को पूर्णावतार बना दिया है । द्वैत, विशिष्टाद्वैत, अद्वैत आदि मतप्रतिपादक प्राचीन आचार्यो के भाष्यस्वरुप ग्रंथ भगवद्नीता पर उपलब्ध है । आधुनिक साहित्य में तिलकजी का ‘गीतारहस्य’ ज्ञानमूलक, भक्तिप्रधान, निष्काम कर्मयोग का प्रतिपादक है । महात्मा गांधी का ‘अनासक्तियोग’ ग्रंथ गीताप्रतिपादन के स्पष्टीकरणार्थ ही है । युद्धारंभ में कृष्ण ने अर्जुन से गीता कह कर युद्धप्रवृत्त किया । पश्चात अर्जुन गीतोपदेश भूल गया, तथा पुनः एक बार उसे सुनने की उसने कृष्ण से प्रार्थना की । कृष्ण ने कहा, “मैं भी उस समय विशेष योगावस्था में था । उस समय जो प्रतिपादन किया, वह मैं अब दुहरा नहीं सकता । तथापि उसका कुछ अंश मैं तुम्हें कथन करता हूँ ।" उसी का नाम ‘अनुगीता’ है [म.आश्व. १६-५०] । भगवद्धीता का महत्त्व अनुगीता को प्राप्त नहीं हुआ ।
विश्वरुपदर्शन n.  कृष्णचरित्र में विश्वरुपदर्शन एक महत्त्वपूर्ण भाग है । १. बाललीला में कृष्ण ने, मृत्तिका भक्षण की । कृष्ण ने यशोदाद्वारा किये गये मृत्तिकाभक्षण के आरोप को अस्वीकृत किया । मुँह में विश्वरुपदर्शन हुआ । २. अक्रूर को विश्वरुपदर्शन दिया । ३. हस्तिनापुर में कृष्ण दौत्यकर्म करने गया था । दुर्योधन कृष्ण को बंदिस्त करने को उद्युक्त हुआ । इस समय कृष्ण ने अपना उग्र स्वरुप प्रकट किया, जिसका वर्णन विश्वरुप के समान ही है । ४. भारतीय युद्ध के प्रारंभ में, गीता के ग्यारहवें अध्याय में अर्जुन को अपना विश्वरुप बताया । वहॉं उसका विस्तृत वर्णन है । उसकी भयानकता से अर्जुन भी घबराया । उसने सौम्यरुप धारण करने की कृष्ण से प्रार्थना की । ५. भारतीययुद्ध में कृष्ण की हाथ में शस्त्र धारण न करने की प्रतिज्ञा थी । भीष्म की ठीक इसके विपरीत, कृष्ण को शस्त्र उठाने को विवश करने की प्रतिज्ञा थी । घमासान लडाई में अर्जुन को भीष्म के सामने हारते देख, कृष्ण ने चतुर्भुज रुप धारण कर भीष्म पर धावा बोल दिया । प्रतिज्ञापूर्ति के आनंद में भीष्म ने हाथ जोड कर शस्त्र नीचे रखा । ६. इन्द्रप्रस्थ में अर्जुन को अनुगीता सुना कर द्वारका लौटते समय, मरुभूमि में कृष्ण की उत्तंक ऋषि से भेट हुई । उत्तंक ने कृष्ण के होते हुए, भारतीय युद्ध के भयानक संहार का उत्तरदायित्व इसपर डाल कर, इसकी निर्भत्सना की । उत्तंक की सांत्वना के लिये कृष्ण ने वहॉं भी उसे विश्वरुपदर्शन कराया तथा इच्छित वर दिये [म.आश्व.५४.४] । युद्ध में सब बांधवो का वध होने के कारण युधिष्ठिर अत्यंत अस्वस्थ हुआ । वक्तृत्वपूर्ण भाषण द्वारा युधिष्ठिर का मन कृष्ण ने शांत किया । भीष्म के द्वारा भी कृष्ण ने अनेक प्रकार का ज्ञान धर्म को दिलाया, जो महाभारत के शान्ति एवं अनुशासन पर्व में उपलब्ध है । इस कारण से ही बालकृष्ण, मुरलीधर, गोपालकृष्ण, राधाकृष्ण, भगवान् कृष्ण आदि अनेक अवस्थाओं में इसकी उपासना प्राचीन काल से आजतक प्रचलित है । प्रत्येक अवस्था पर कई रचित ग्रंथ है । अतः यह पूर्णावतार है ।
ऐतिहासिक चर्चा n.  पाणिनि के समय, कृष्ण सन्माननीय माना जाता था । तथापि क्षत्रिय नहीं समझा जाता था । सामान्य क्षत्रियवाचक शब्द से ‘गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ्‍ [पा.सू.४.३.९९] । इस सूत्र से प्रत्यय बताया है । वासुदेव क्षत्रिय न होने क कारण, ‘वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन्’ [पा.सू.४.३.९८] । इसने पुनः पुनः बताया है । यह स्पष्टीकरण पतंजलि ने किया है । इससे स्पष्ट है कि, सोमवंश के क्षत्रिय यादवकुल से कृष्ण का संबंध बाद में जोडा गया । वासुदेव तथा अर्जुन को नरनारायण अवतार मान कर, उपास्य देवताओं में भी सम्मीलित कर लिया गया था । इससे इनका क्षत्रियत्व लुप्त हो कर उससे भी श्रेष्ठ उपाधि इन्हें प्राप्त हो गयी थी । इसलिये पाणिनि को स्वतंत्र सूत्र बनाना पडा । महाभारत में प्राप्त नर-नारायण उपासना का संप्रदाय पाणिनि तथा पतंजलि काल में भी प्रचलित था । नर-नारायण का स्थान कृष्णार्जुन को ही दिया जाता था । ययाति की जरा का स्वीकार न करने के कारण, यदुकुल आक्षिप्त माना जाता था । यह आक्षेप कृष्णावतार से दूर हुआ तथा यदुकुल उज्ज्वल हो गया । ख्रिस्त के पूर्व दो सदी के करीब लिखे गये ‘घोसुम्दी शिलालेख’ में वासुदेवपूजा का निर्देश है ।
कृष्‍ण करणें
काळे करणें
नाहीसे होणें
तोंड लपविणें.
 m  The god कृष्ण.
  Black.

Related Words

कृष्ण   कृष्ण   पंच कृष्ण   बारा कृष्ण   कृष्ण III.   कृष्ण (देवकीपुत्र)   कृष्ण (हारित)   कृष्ण (आंगिरस)   कृष्ण (आत्रेय)   कृष्ण (द्वैपायन)   कृष्ण (पराशर)   कृष्ण II.   कृष्ण IV.   कृष्ण V.   कृष्ण VI.   कृष्‍ण काळा, शंकर निळा आणि राम उजळा   पंच कृष्ण   बारा कृष्ण   कृष्ण (आंगिरस)   कृष्ण (आत्रेय)   कृष्ण (देवकीपुत्र)   कृष्ण (द्वैपायन)   कृष्ण (पराशर)   कृष्ण (हारित)   कृष्ण II.   कृष्ण III.   कृष्ण IV.   कृष्ण V.   कृष्ण VI.   कृष्‍ण काळा, शंकर निळा आणि राम उजळा   कृष्ण II.   कृष्ण III.   कृष्ण IV.   कृष्ण V.   कृष्ण VI.   कृष्ण (आंगिरस)   कृष्ण (आत्रेय)   कृष्‍ण काळा, शंकर निळा आणि राम उजळा   कृष्ण (देवकीपुत्र)   कृष्ण (द्वैपायन)   कृष्ण (पराशर)   कृष्ण (हारित)   पंच कृष्ण   बारा कृष्ण   ईश्वरकृष्ण   कृष्णकिंकर   कृष्णदास   कृष्णा   कृष्णाजी प्रभाकर खाडिलकर   भारती कृष्णतीर्थ   रामकृष्ण   श्रीकृष्ण   श्रीकृष्ण पोवळे   श्रीकृष्णदयार्णव   
: Folder : Page : Word/Phrase : Person
  |  
  |  
: Folder : Page : Word/Phrase : Person

Comments | अभिप्राय

Comments written here will be public after appropriate moderation.
Like us on Facebook to send us a private message.