पदावली - १११ ते ११७

संत रोहिदास (इ.स. १३७६ - इ.स. १५२७) हे मध्ययुगीन भारतातील हिंदू संत होते. यांच्या गुरूंचे नाव रामानंद स्वामी होते. कबीर यांचे समकालीन होत; तर मीराबाई यांच्या शिष्या होत्या.


१११. हरि को टाँडौ लादे जाइ रे

हरि को टाँडौ लादे जाइ रे।
मैं बनिजारौ रांम कौ॥
रांम नांम धंन पायौ, ताथैं सहजि करौं ब्यौपार रे॥ टेक॥
औघट घाट घनो घनां रे, न्रिगुण बैल हमार।
रांम नांम हम लादियौ, ताथैं विष लाद्यौ संसार रे॥१॥
अनतहि धरती धन धर्यौ रे, अनतहि ढूँढ़न जाइ।
अनत कौ धर्यौ न पाइयैं, ताथैं चाल्यौ मूल गँवाइ रे॥२॥
रैनि गँवाई सोइ करि, द्यौस गँवायो खाइ।
हीरा यहु तन पाइ करि, कौड़ी बदलै जाइ रे॥३॥
साध संगति पूँजी भई रे, बस्त लई न्रिमोल।
सहजि बलदवा लादि करि, चहुँ दिसि टाँडो मेल रे॥४॥
जैसा रंग कसूंभं का रे, तैसा यहु संसार।
रमइया रंग मजीठ का, ताथैं भणैं रैदास बिचार रे॥५॥
(राग केदारौ)

११२. हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति

हरि जपत तेऊ जना पदम कवलास पति तास समतुलि नहीं आन कोऊ।
एक ही एक अनेक होइ बिसथरिओ आन रे आन भरपूरि सोऊ॥ टेक॥
जा कै भागवतु लेखी ऐ अवरु नहीं पेखीऐ तास की जाति आछोप छीपा।
बिआस महि लेखी ऐ सनक महि पेखी ऐ नाम की नामना सपत दीपा॥१॥
जा कै ईदि बकरीदि कुल गऊ रे वधु करहि मानी अहि सेख सहीद पीरा।
जा कै बाप वैसी करी पूत ऐसी सरी तिहू रे लोक परसिध कबीरा॥२॥
जा के कुटंब के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि अजहु बंनारसी आस पासा।
आचार सहित विप्र करहि डंडउति तिन तनै रविदास दासानुदासा॥३॥
(राग मल्हार)

११३. हरि हरि हरि न जपसि रसना

हरि हरि हरि न जपसि रसना।
अवर सभ छाड़ि बचन रचना॥ टेक॥
सुध सागर सुरितरु चिंतामनि कामधैन बसि जाके रे।
चारि पदारथ असट महा सिधि नव निधि करतल ताकै॥१॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अछर माही।
बिआस बीचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही॥२॥
सहज समाधि उपाधि रहत होइ उड़े भागि लिव लागी।
कहि रविदास उदास दास मतित जनम मरन भै भागी॥३॥
(राग मारू)

११४. हरि हरि हरि न जपहि रसना

हरि हरि हरि न जपहि रसना।
अवर सम तिआगि बचन रचना॥ टेक॥
सुख सागरु सुरतर चिंतामनि कामधेनु बसि जाके।
चारि पदारथ असट दसा सिधि नवनिधि करतल ताके॥१॥
नाना खिआन पुरान बेद बिधि चउतीस अखर माँही।
बिआस बिचारि कहिओ परमारथु राम नाम सरि नाही॥२॥
सहज समाधि उपाधि रहत फुनि बड़ै भागि लिव लागी।
कहि रविदास प्रगासु रिदै धरि जनम मरन भै भागी॥३॥
(राग सोरठी)

११५. हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे

हरि हरि हरि हरि हरि हरि हरे।
हरि सिमरत जन गए निसतरि तरे॥ टेक॥
हरि के नाम कबीर उजागर। जनम जनम के काटे कागर॥१॥
निमत नामदेउ दूधु पीआइया। तउ जग जनम संकट नहीं आइआ॥२॥
जनम रविदास राम रंगि राता। इउ गुर परसादि नरक नहीं जाता॥३॥
(राग आसा)

११६. है सब आतम सोयं प्रकास साँचो

है सब आतम सोयं प्रकास साँचो।
निरंतरि निराहार कलपित ये पाँचौं॥ टेक॥
आदि मध्य औसान, येक रस तारतंब नहीं भाई।
थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रहे हरिराई॥१॥
सरवेसुर श्रबपति सब गति, करता हरता सोई।
सिव न असिव न साध अरु सेवक, उभै नहीं होई॥२॥
ध्रम अध्रम मोच्छ नहीं बंधन, जुरा मरण भव नासा।
दृष्टि अदृष्टि गेय अरु -ज्ञाता, येकमेक रैदासा॥३॥
(राग रामकली)

११७. त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन

त्राहि त्राहि त्रिभवन पति पावन।
अतिसै सूल सकल बलि जांवन॥टेक॥
कांम क्रोध लंपट मन मोर,
कैसैं भजन करौं रांम तोर॥१॥
विषम विष्याधि बिहंडनकारी,
असरन सरन सरन भौ हारी॥२॥
देव देव दरबार दुवारै,
रांम रांम रैदास पुकारै॥३॥
(राग धनाश्री)

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Last Updated : September 07, 2026

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