१०१. रे मन माछला संसार समंदे
रे मन माछला संसार समंदे, तू चित्र बिचित्र बिचारि रे।
जिहि गालै गिलियाँ ही मरियें, सो संग दूरि निवारि रे॥ टेक॥
जम छैड़ि गणि डोरि छै कंकन, प्र त्रिया गालौ जांणि रे।
होइ रस लुबधि रमैं यू मूरिख, मन पछितावै न्यांणि रे॥१॥
पाप गिल्यौ छै धरम निबौली, तू देखि देखि फल चाखि रे।
पर त्रिया संग भलौ जे होवै, तौ राणां रांवण देखि रे॥२॥
कहै रैदास रतन फल कारणि, गोब्यंद का गुण गाइ रे।
काचौ कुंभ भर्यौ जल जैसैं, दिन दिन घटतौ जाइ रे॥३॥
(राग सोरठी)
१०२. सगल भव के नाइका
सगल भव के नाइका।
इकु छिनु दरसु दिखाइ जी॥ टेक॥
कूप भरिओ जैसे दादिरा, कछु देसु बिदेसु न बूझ।
ऐसे मेरा मन बिखिआ बिमोहिआ, कछु आरा पारु न सूझ॥१॥
मलिन भई मति माधव, तेरी गति लखी न जाइ।
करहु क्रिपा भ्रमु चूकई, मैं सुमति देहु समझाइ॥२॥
जोगीसर पावहि नहीं, तुअ गुण कथन अपार।
प्रेम भगति कै कारणै, कहु रविदास चमार॥३॥
(राग गौड़ी पूर्वी)
१०३. सब कछु करत न कहु कछु कैसैं
सब कछु करत न कहु कछु कैसैं।
गुन बिधि बहुत रहत ससि जैसें॥ टेक॥
द्रपन गगन अनींल अलेप जस, गंध जलध प्रतिब्यंबं देखि तस॥१॥
सब आरंभ अकांम अनेहा, विधि नषेध कीयौ अनकेहा॥२॥
इहि पद कहत सुनत नहीं आवै, कहै रैदास सुकृत को पावै॥३॥
(राग जैतश्री)
१०४. संत ची संगति संत कथा रसु
संत ची संगति संत कथा रसु।
संत प्रेम माझै दीजै देवा देव॥ टेक॥
संत तुझी तनु संगति प्रान।
सतिगुर गिआन जानै संत देवा देव॥१॥
संत आचरण संत चो मारगु।
संत च ओल्हग ओल्हगणी॥२॥
अउर इक मागउ भगति चिंतामणि।
जणी लखावहु असंत पापी सणि॥३॥
रविदास भणै जो जाणै सो जाणु।
संत अनंतहि अंतरु नाही॥४॥
(राग आसा)
१०५. संतौ अनिन भगति यहु नांहीं
संतौ अनिन भगति यहु नांहीं।
जब लग सत रज तम पांचूँ गुण ब्यापत हैं या मांही॥ टेक॥
सोइ आंन अंतर करै हरि सूँ, अपमारग कूँ आंनैं।
कांम क्रोध मद लोभ मोह की, पल पल पूजा ठांनैं॥१॥
सति सनेह इष्ट अंगि लावै, अस्थलि अस्थलि खेलै।
जो कुछ मिलै आंनि अखित ज्यूं, सुत दारा सिरि मेलै॥२॥
हरिजन हरि बिन और न जांनैं, तजै आंन तन त्यागी।
कहै रैदास सोई जन न्रिमल, निसदिन जो अनुरागी॥३॥
१०६. साध का निंदकु कैसे तरै
साध का निंदकु कैसे तरै।
सर पर जानहु नरक ही परै॥ टेक॥
जो ओहु अठिसठि तीरथ न्हावै। जे ओहु दुआदस सिला पूजावै।
जे ओहु कूप तटा देवावै। करै निंद सभ बिरथा जावै॥१॥
जे ओहु ग्रहन करै कुलखेति। अरपै नारि सीगार समेति।
सगली सिंम्रिति स्रवनी सुनै। करै निंद कवनै नही गुनै॥२॥
जो ओहु अनिक प्रसाद करावै। भूमि दान सोभा मंडपि पावै।
अपना बिगारि बिरांना साढै। करै निंद बहु जोनी हाढै॥३॥
निंदा कहा करहु संसारा। निंदक का प्ररगटि पाहारा।
निंदकु सोधि साधि बीचारिआ। कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ॥४॥
(राग गौड़ी)
१०७. सु कछु बिचार्यौ ताथैं
सु कछु बिचार्यौ ताथैं मेरौ मन थिर के रह्यौ।
हरि रंग लागौ ताथैं बरन पलट भयौ॥ टेक॥
जिनि यहु पंथी पंथ चलावा, अगम गवन मैं गमि दिखलावा॥१॥
अबरन बरन कथैं जिनि कोई, घटि घटि ब्यापि रह्यौ हरि सोई॥२॥
जिहि पद सुर नर प्रेम पियासा, सो पद्म रमि रह्यौ जन रैदासा॥३॥
(राग आसा)
१०८. सेई मन संमझि समरंथ सरनांगता
सेई मन संमझि समरंथ सरनांगता।
जाकी आदि अंति मधि कोई न पावै॥
कोटि कारिज सरै, देह गुंन सब जरैं, नैंक जौ नाम पतिव्रत आवै॥ टेक॥
आकार की वोट आकार नहीं उबरै, स्यो बिरंच अरु बिसन तांई।
जास का सेवग तास कौं पाई है, ईस कौं छांड़ि आगै न जाही॥१॥
गुणंमई मूंरति सोई सब भेख मिलि, निग्रुण निज ठौर विश्रांम नांही।
अनेक जूग बंदिगी बिबिध प्रकार करि, अंति गुंण सेई गुंण मैं समांही॥२॥
पाँच तत तीनि गुण जूगति करि करि सांईया, आस बिन होत नहीं करम काया।
पाप पूंनि बीज अंकूर जांमै मरै, उपजि बिनसै तिती श्रब माया॥३॥
क्रितम करता कहैं, परम पद क्यूँ लहैं, भूलि भ्रम मैं पर्यौ लोक सारा।
कहै रैदास जे रांम रमिता भजै, कोई ऐक जन गये उतरि पारा॥४॥
(राग रामगरी)
१०९. सो कत जानै पीर पराई
सो कत जानै पीर पराई।
जाकै अंतरि दरदु न पाई॥ टेक॥
सह की सार सुहागनी जानै। तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै।
तनु मनु देइ न अंतरु राखै। अवरा देखि न सुनै अभाखै॥१॥
दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी। जिनि नाह निरंतहि भगति न कीनी।
पुरसलात का पंथु दुहेला। संग न साथी गवनु इकेला॥२॥
दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ। बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ।
कहि रविदास सरनि प्रभु तेरी। जिय जानहु तिउ करु गति मेरी॥३॥
(राग सूही)
११०. हउ बलि बलि जाउ रमईया कारने
हउ बलि बलि जाउ रमईया कारने।
कारन कवन अबोल॥ टेक॥
हम सरि दीनु दइआलु न तुमसरि। अब पतीआरु किआ कीजै।
बचनी तोर मोर मनु मानैं। जन कउ पूरनु दीजै॥१॥
बहुत जनम बिछुरे थे माधउ, इहु जनमु तुम्हरे लेखे।
कहि रविदास अस लगि जीवउ। चिर भइओ दरसनु देखे॥२॥
(राग धनाश्री)