३१. गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी
गोबिंदे तुम्हारे से समाधि लागी।
उर भुअंग भस्म अंग संतत बैरागी॥ टेक॥
जाके तीन नैन अमृत बैन, सीसा जटाधारी, कोटि कलप ध्यान अलप, मदन अंतकारी॥१॥
जाके लील बरन अकल ब्रह्म, गले रुण्डमाला, प्रेम मगन फिरता नगन, संग सखा बाला॥२॥
अस महेश बिकट भेस, अजहूँ दरस आसा, कैसे राम मिलौं तोहि, गावै रैदासा॥३॥
(राग विलावल)
३२. गौब्यंदे भौ जल ब्याधि अपारा
गौब्यंदे भौ जल ब्याधि अपारा।
तामैं कछू सूझत वार न पारा॥ टेक॥
अगम ग्रेह दूर दूरंतर, बोलि भरोस न देहू।
तेरी भगति परोहन, संत अरोहन, मोहि चढ़ाइ न लेहू॥१॥
लोह की नाव पखांनि बोझा, सुकृत भाव बिहूंनां।
लोभ तरंग मोह भयौ पाला, मीन भयौ मन लीना॥२॥
दीनानाथ सुनहु बीनती, कौंनै हेतु बिलंबे।
रैदास दास संत चरंन, मोहि अब अवलंबन दीजै॥३॥
३३. चमरटा गाँठि न जनई
चमरटा गाँठि न जनई।
लोग गठावै पनही॥टेक॥
आर नहीं जिह तोपउ।
नहीं रांबी ठाउ रोपउ॥१॥
लोग गंठि गंठि खरा बिगूचा।
हउ बिनु गांठे जाइ पहूचा॥२॥
रविदासु जपै राम नामा,
मोहि जम सिउ नाही कामा॥३॥
(राग सोरठी)
३४. चलि मन हरि चटसाल पढ़ाऊँ
चलि मन हरि चटसाल पढ़ाऊँ॥ टेक॥
गुरु की साटि ग्यांन का अखिर, बिसरै तौ सहज समाधि लगाऊँ॥१॥
प्रेम की पाटी सुरति की लेखनी करिहूं, ररौ ममौ लिखि आंक दिखांऊँ॥२॥
इहिं बिधि मुक्ति भये सनकादिक, रिदौ बिदारि प्रकास दिखाऊँ॥३॥
कागद कैवल मति मसि करि नृमल, बिन रसना निसदिन गुण गाऊँ॥४॥
कहै रैदास राम जपि भाई, संत साखि दे बहुरि न आऊँ॥५॥
(राग कानड़ा)
३५. जग मैं बेद बैद मांनी जें
जग मैं बेद बैद मांनी जें।
इनमैं और अंगद कछु औरे, कहौ कवन परिकीजै॥ टेक॥
भौ जल ब्याधि असाधिअ प्रबल अति, परम पंथ न गही जै।
पढ़ैं गुनैं कछू समझि न परई, अनभै पद न लही जै॥१॥
चखि बिहूंन कतार चलत हैं, तिनहूँ अंस भुज दीजै।
कहै रैदास बमेक तत बिन, सब मिलि नरक परी जै॥२॥
(राग सारंग)
३६. जन कूँ तारि तारि तारि तारि बाप रमइया
जन कूँ तारि तारि तारि तारि बाप रमइया।
कठन फंध पर्यौ पंच जमइया॥ टेक॥
तुम बिन देव सकल मुनि ढूँढ़े, कहूँ न पायौ जम पासि छुड़इया॥१॥
हमसे दीन, दयाल न तुमसे, चरन सरन रैदास चमइया॥२॥
(राग धनाश्री)
३७. जब रामनाम कहि गावैगा
जब रामनाम कहि गावैगा,
तब भेद अभेद समावैगा ॥टेक॥
जे सुख ह्वैं या रसके परसे,
सो सुखका कहि गावैगा ॥१॥
गुरु परसाद भई अनुभौ मति,
बिस अमरित सम धावैगा ॥२॥
कह रैदास मेटि आपा-पर,
तब वा ठौरहि पावैगा ॥३॥
३८. जयौ रांम गोब्यंद बीठल बासदेव
जयौ रांम गोब्यंद बीठल बासदेव।
हरि बिश्न बैकुंठ मधुकीटभारी॥
कृश्न केसों रिषीकेस कमलाकंत।
अहो भगवंत त्रिबधि संतापहारी॥ टेक॥
अहो देव संसार तौ गहर गंभीर।
भीतरि भ्रमत दिसि ब दिसि, दिसि कछू न सूझै॥
बिकल ब्याकुल खेंद, प्रणतंत परमहेत।
ग्रसित मति मोहि मारग न सूझै॥
देव इहि औसरि आंन, कौंन संक्या समांन।
देव दीन उधंरन, चरंन सरन तेरी॥
नहीं आंन गति बिपति कौं हरन और।
श्रीपति सुनसि सीख संभाल प्रभु करहु मेरी॥१॥
अहो देव कांम केसरि काल, भुजंग भांमिनी भाल।
लोभ सूकर क्रोध बर बारनूँ॥२॥
ग्रब गैंडा महा मोह टटनीं, बिकट निकट अहंकार आरनूँ।
जल मनोरथ ऊरमीं, तरल तृसना मकर इन्द्री जीव जंत्रक मांही।
समक ब्याकुल नाथ, सत्य बिष्यादिक पंथ, देव देव विश्राम नांही॥३॥
अहो देव सबै असंगति मेर, मधि फूटा भेर।
नांव नवका बड़ैं भागि पायौ।
बिन गुर करणधार डोलै न लागै तीर।
विषै प्रवाह औ गाह जाई।
देव किहि करौं पुकार, कहाँ जाँऊँ।
कासूँ कहूँ, का करूँ अनुग्रह दास की त्रासहारी।
इति ब्रत मांन और अवलंबन नहीं।
तो बिन त्रिबधि नाइक मुरारी॥३॥
अहो देव जेते कयैं अचेत, तू सरबगि मैं न जांनूं।
ग्यांन ध्यांन तेरौ, सत्य सतिम्रिद परपन मन सा मल।
मन क्रम बचन जंमनिका, ग्यान बैराग दिढ़ भगति नाहीं।
मलिन मति रैदास, निखल सेवा अभ्यास।
प्रेम बिन प्रीति सकल संसै न जांहीं॥४॥
(राग धनाश्री)
३९. जिनि थोथरा पिछोरे कोई
जिनि थोथरा पिछोरे कोई।
जो र पिछौरे जिहिं कण होई॥ टेक॥
झूठ रे यहु तन झूठी माया, झूठा हरि बिन जन्म गंवाया॥१॥
झूठा रे मंदिर भोग बिलासा, कहि समझावै जन रैदासा॥२॥ (राग सोरठी)
४०. जिह कुल साधु बैसनो होइ
जिह कुल साधु बैसनो होइ।
बरन अबरन रंकु नहीं ईसरू बिमल बासु जानी ऐ जगि सोइ॥ टेक॥
ब्रहमन बैस सूद अरु ख्यत्री डोम चंडार मलेछ मन सोइ।
होइ पुनीत भगवंत भजन ते आपु तारि तारे कुल दोइ॥१॥
धंनि सु गाउ धंनि सो ठाउ धंनि पुनीत कुटंब सभ लोइ।
जिनि पीआ सार रसु तजे आन रस होइ रस मगन डारे बिखु खोइ॥२॥
पंडित सूर छत्रपति राजा भगत बराबरि अउरु न कोइ।
जैसे पुरैन पात रहै जल समीप भनि रविदास जनमें जगि ओइ॥३॥
(राग विलावल)